मवेशियों के सामान्य रोग या आम बीमारियाँ      Publish Date : 18/11/2025

               मवेशियों के सामान्य रोग या आम बीमारियाँ

                                                                                                                                                       प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 डी. के. सिंह

संक्रामक रोगों के अलावा बहुत सारे साधारण रोग भी हैं जो पशुओं की उत्पादन क्षमता को कम कर देते है। ये रोग अधिक भयानक नहीं होते, लेकिन समय पर इलाज नहीं कराने पर काफी खतरनाक सिद्ध हो सकते हैं। प्रस्तुत लेख में कुछ साधारण बीमारियों के लक्षण और प्राथमिक चिकित्सा के उपाय बताए जा रहे है, जिनका लाभ पशु-पालक उठाकर अपने पशुओं की सेहत का ख्याल रख सकते हैं।

अफरा

हरा और रसीला चारा, भींगा चारा या दलहनी चारा अधिक मात्रा में खा लेने के कारण पशु को कभी-कभी पेट पर अफरा आने की समस्या हो जाती है। खासकर, रसदार चारा जल्दी-जल्दी खाकर अधिक मात्रा में पीने से भी यह समस्या पैदा हो सकती है। बछड़ा-बछड़ी के अधिक मात्रा में दूध पी लेने के कारण भी यह बीमारी हो सकती है। पाचन शक्ति कमजोर हो जाने पर मवेशी को इस समस्या से ग्रसित होने की आशंका अधिक रहती है।

अफारा के लक्षणः

1. पशु का एकाएक पेट फूल जाता है। ज्यादातर रोगी पशु का बायाँ पेट पहले फूलता है। पेट को थपथपाने पर ढोल की तरह (ढप-ढप) की आवाज आती है।

2. समस्या से ग्रस्त पशु कराहने लगता है और अपने फूले हुए पेट की ओर बराबर देखता है।

3. इससे पशु को साँस लेने में भी परेशानी होने लगती है।

4. समस्या के बढ़ जाने पर पशु चारा और दाना आदि खाना छोड़ देता है।

5. इस समस्या में पशु की बेचैनी बढ़ जाती है।

6. प्रभावित पशु झुक कर खड़ा होता है और अगल-बगल झांकता रहता है।

7. रोग की अत्यधिक तीव्र अवस्था में पशु बार-बार लेटता और खड़ा होता रहता है।

8. पशु कभी-कभी जीभ बाहर लटकाकर हांफता हुआ भी नजर आता है।

9. पीछे के पैरों को बार पटकता है।

10. समस्या का तुरंत समाधान नहीं करने पर रोगी पशु मर भी सकता है।

रोग की चिकित्सा

1. पशु के बाएं पेट पर दबाव डालकर मालिश करनी चाहिए।

2. उस पर ठंडा पानी डालें और तारपीन का तेल पकाकर लगाएँ।

3. पशु के मुहं को खुला रखने की व्यवस्था करें। इसके लिए जीभी को मुंह से बाहर निकालकर जबड़ों के बीज कोई साफ और चिकनी लकड़ी रखी जा सकती है।

4. रोग की प्रारंभिक अवस्था में पशु को इधर-उधर घुमाने से भी लाभ प्राप्त होता है।

5. पशु को पशुचिकित्सक से परामर्श लेकर तारपीन का तेल आधा से एक छटाक, छ: छटाक टीसी के तेल में मिलाकर पिलाया जा सकता है। उसके बाद 200 ग्राम मैगसल्फ़ और दो सौ ग्राम नमक एक बड़े बोतल पानी में मिलाकर जुलाब देना चाहिए।

6. पशु को लकड़ी के कोयले को चूरा, आम का पुराना आचार, काला नमक, अदरख, हींग और सरसों जैसी चीज पशुचिकित्सक के परामर्श से खिलायी जा सकती है।

7. पशु को स्वस्थ होने पर उसे थोड़ा-थोड़ा पानी दिया जा सकता है, लेकिन किसी प्रकार का चारा नहीं खिलाया जाना चाहिए।

8. पशु चिकित्सक की सेवाएँ तुरंत प्राप्त करनी चाहिए।

दुग्ध-ज्वर

दुधारू गाय, भैंस या बकरी इस रोग के चपेट में आती है। अधिक दुधारू पशु को ही यह बीमारी अपना शिकार अक्सर ही बनाती है। बच्चा देने के 24 घंटे के अदंर दुग्ध-ज्वर की समस्या के लक्षण दिखई देते हैं।

रोग के लक्षणः

1. पशु बेचैन हो जाता है।

2. पशु कांपने और लड़खड़ाने लगता है। पशु की मांसपेसियों में कंपन होता है, जिसके कारण पशु खड़ा रहने में असमर्थ रहता है।

3. पशु की पलके झूकी-झूकी और आंखे निस्तेज सी दिखाई देती है।

4. पशु का मुंह सूख होता है।

5. शरीर का तापमान सामान्य रहता है या उससे कम हो जाता है।

6. पशु सीने के सहारे जमीन पर बैठता है और गर्दन शरीर को एक ओर मोड़ लेता है।

7. ज्यादातर पीड़ित पशु इसी अवस्था में देखे जाते हैं।

8. तीव्र अवस्था में पशु बेहोश हो जाता है और गिर जाता है। चिकित्सा नहीं करने पर पशु 24 घंटे के अंदर मर भी सकता है।

चिकित्सा

1. पशु के थन को गीले कपड़े से पोंछ कर उसमें साफ कपड़ा इस प्रकार बांध दें कि जिससे थन में मिट्टी न लगे।

2. थन में हवा भरने से लाभ होता है।

3. ठीक होने के बाद 2-3 दिनों तक थन को पूरी तरह खाली नहीं करें।

4. पशु को जल्दी और आसानी से पचने वाली खुराक दें।

5. पशु चिकित्सक का परामर्श लेना नहीं भूलें।

दस्त और मरोड़

                                                                

इस रोग के दो कारण हैं, पशु को अचानक ठंडा लग जाना और पेट में कीटाणुओं का होना। इस रोग में आंत में सुजन आ जाती है।

लक्षण

1. पशु को पतला और पानी जैसे दस्त होता है।

2. पशु के पेट में मरोड़ होती है।

3. आंव के साथ खून गिरता है।

चिकित्सा

1. आसानी से पचने वाला आहार जैसे माड़, उबला हुआ दूध, बेल का गुदा आदि पशु को खिलाना चाहिए।

2. इस हालत में पशु  का चारा, पानी कम देना चाहिए।

3. बछड़ा-बछड़ी को कम दूध पीने देना चाहिए।

4. अविलम्ब पशु चिकित्सा की सेवाएँ प्राप्त करनी चाहिए।

जेर का अंदर रह जाना

पशु के व्याने के बाद चार-पांच घंटों के अंदर ही जेर का बाहर निकल जाना बहुत जरूरी है। लेकिन कभी-कभी जेर अंदर ही रह जाती है जिसका कुपरिणाम मवेशी को भुगतना पड़ता है। खास कर गर्मी में अगर जेर छः घंटे तक नहीं निकले तो इसका नतीजा काफी बुरा हो सकता है। इससे मवेशी के बाँझ हो जाने आंशका भी बनी रहती है। जेर रह जाने के कारण गर्भाशय में सूजन आ जाती है और खून भी विकृत हो जाता है।

लक्षण

1. बीमार गाय या भैंस बेचैन हो जाती है।

2. झिल्ली का एक हिस्सा योनिमुख से बाहर निकल जाता है।

3. बदबूदार पानी निकलने लगता है, जिसका रंग चाकलेटी होता है।

4. दूध भी फट जाता है।

चिकित्सा

1. पशु के शरीर के पिछले भाग को गर्म पानी से धोना चाहिए। धोते समय इस बात का ख्याल रखें कि जेर में हाथ न लगे।

2. जेर को निकालने के लिए किसी प्रकार का जोर नहीं लागाया चाहिए।

3. पशु चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।

योनि का प्रदाह

यह रोग गाय-भैंस के व्याने के कुछ दिन बाद होता है। इससे भी दुधारू मवेशियों को काफी नुकसान पहुंचता है। प्रायः जेर का कुछ हिस्सा अंदर रह जाने के करण यह रोग होता है।

लक्षण

1. मवेशी का तापमान थोड़ा बढ़ जाता है।

2. पशु के योनि मार्ग से दुर्गन्धयुक्त पीब की तरह पदार्थ गिरता रहता है। बैठे रहने की अवस्था में तरल पदार्थ गिरता है।

3. पशु की बेचैनी बहुत अधिक बढ़ जाती है।

4. दूध कम हो जाता है या ठीक से शुरू ही नहीं हो पाता है।

चिकित्सा

1. गूनगूने पानी में थोड़ा सा डेटोल या पोटाश मिलकर रबर की नली की सहायता से गर्भाशय की धुलाई कर देनी चाहिए।

2. पशु चिकित्सक की सहायता लेनी चाहिए।

नोटः पशु को इस रोग से बचाने के लिए सावधानी बरतनी जरूरी है, अन्यथा पशु के बाँझ होने की आशंका रहती है।

निमोनिया

पानी में लगातार भींगते रहने या सर्दी के मौसम में खुले स्थान में बांधे जाने वाले मवेशी को निमोनिया रोग हो जाता है। अधिक बाल वाले पशुओं को यदि धोने के बाद ठीक से पोछा न जाए तो उन्हें भी यह रोग हो सकता है।

लक्षण

1. पशु के शरीर का तापमान बढ़ जाता है।

2. पशु को सांस लेने में कठिनाई होती है।

3. पशु की नाक से पानी बहता है।

4. पशु की भूख कम हो जाती है।

5. पैदावार कम हो जाती है।

6. पशु कमजोर हो जाता है।

चिकित्सा

1. बीमार मवेशी को साफ तथा गर्म स्थान पर रखना चाहिए।

2. उबलते पानी में तारपीन का तेल डालकर उससे उठने वाली भाप पशुओं को सूँघाने से लाभ होता है।

3. पशु के पांजर में सरसों तेल में कपूर मिलकर मालिश करनी चाहिए।

4. पशु चिकित्सा के परामर्श से इलाज की व्यवस्था करना आवश्यक है।

घाव

पशुओं को घाव हो जाना एक आम बात है। चरने के लिए बाड़ा तपने के सिलसिले में तार, काँटों या झड़ी से काटकर अथवा किसी दुसरे प्रकार की चोट लग जाने से मवेशी को घाव हो जाता है। हल का फाल लग जाने से भी बैल को घाव हो जाता है और किसानों की खेती-बाड़ी चौपट हो जाती है। बैल के कंधों पर पालों की रगड़ से भी सूजन और घाव हो जाता है। ऐसे सामान्य घाव और सूजन को निम्नांकित तरीके से इलाज करना चाहिए।

चिकित्सा

1. सहने लायक गर्म पानी में लाल पोटाश या फिनाइल मिलाकर घाव की धुलाई करनी चाहिए।

2. अगर घाव में कीड़े हो तो तारपीन के तेल में भिंगोई हुई पट्टी बांध देनी चाहिए।

3. मुंह के घाव को, फिटकरी के पानी से धोकर छोआ और बोरिक एसिड का घोल लगाने से भी लाभ होता है।

4. शरीर के घाव पर नारियल के तेल में (भाग तारपीन का तेल और थोड़ा सी कपूर मिलाकर लगाना चाहिए।

परजीवी जन्य रोग

बाह्य एवं आन्तरिक परजीवियों के कारण भी मवेशियों को कई प्रकार की बीमारियाँ परेशानी करती है। इनके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए पशु चिकित्सालय से पुस्तिका लेकर उसे पढ़ना चाहिए।

बछड़ों का रोग

निम्नांकित रोग खास कर कम उम्र के बछड़ों को परेशान करते हैं।

नाभि रोग

लक्षण

1. नाभि के आस-पास सूजन हो जाती है, जिसको छूने पर रोगी बछड़े को दर्द होता है।

2. बाद में सूजा हुआ स्थान मुलायम हो जाता है तथा उस स्थान को दबाने से खून मिला हुआ पीव निकलता है।

3. रोगी बछड़ा सुस्त हो जाता है।

4. हल्का बुखार रहता है।

चिकित्सा

1. सूजे हुए भाग को दिन में दो बार गर्म पानी से सेंकना चाहिए।

2. घाव का मुहं खुल जाने पर उसे अच्छी तरह साफ कर उसमें एंटीबायोटिक पाउडर भर देना चाहिए। इस उपचार को जब तक घाव भर न जाए तब तक चालू रखना चाहिए।

3. पशु चिकित्सा की सलाह लेनी चाहिए।

कब्जियत

बछड़ों के पैदा होने के बाद अगर मल नहीं निकले तो कब्जियत हो सकती है।

चिकित्सा

1. 50 ग्राम पाराफिन लिक्विड (तरल) 200 ग्राम गर्म दूध में मिलाकर देना चाहिए।

2. साबुन के घोल का एनिमा देना भी लाभदायक होता है।

सफ़ेद दस्त

यह रोग बछड़ों को जन्म से तीन सप्ताह के अंदर तक हो सकता है। यह रोग छोटे-छोटे कीटाणुओं के कारण होता है। गंदे बथान में रहने वाले बछड़े या कमजोर बछड़े इस रोग का शिकार बनते हैं।

लक्षण

1. बछड़ों का पिछला भाग दस्त से लथ-पथ रहता है।

2. बछड़ा सुस्त हो जाता है।

3. बछड़ा खाना-पीना भी छोड़ देता है।

4. बछड़े के शरीर का तापमान कम हो जाता है।

5. बछड़े की आंखे अदंर की ओर धंस जाती है।

चिकित्सा

1. निकट के पशु चिकित्सा के परामर्श से इलाज करानी चाहिए।

कौक्सिड़ोसिस

यह रोग कौक्सिड़ोसिस नामक एक विशेष प्रकार के कीटाणु को शरीर के भीतर प्रवेश कर जाने के कारण होता है।

लक्षण

1. रोग की साधारण अवस्था में दस्त के साथ थोड़ा-थोड़ा खून आता है।

2. रोग की तीव्र अवस्था में बछड़ा खाना पीना छोड़ देता है।

3. कुथन के साथ पैखाना होता है जिसमें खून का कतरा आता है।

4. बछड़ों कमजोर होकर किसी दूसरी बीमारी का शिकार भी बन सकता है।

चिकित्सा

1. जितना जल्द हो सके पशु चिकित्सक को बुलाकर इलाज शुरू कर देना चाहिए।

रतौंधी

                                                         

यह रोग साधारणतः बछड़ों को ही होता है। संध्या होने के बाद से सूरज निकलने के पहले तक रोग ग्रस्त बछड़ा करीब-करीब अन्धा बना रहता है। फलतः उसने अपना चारा खा सकने में भी कठिनाई होती है। दुसरे बछड़ों या पशु से टकराव भी हो जाता है।

चिकित्सा

1. इन्हें कुछ दिन तक 20 सें 30 बूँद तक कॉड लिवर ऑइल दूध के साथ खिलाया जा सकता है।

2. पशु चिकित्सक से परामर्श लिया जाना जरूरी है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।