
पशुओं के प्रमुख रोग - रोकथाम एवं उपचार Publish Date : 04/11/2025
पशुओं के प्रमुख रोग - रोकथाम एवं उपचार
प्रोफेसर डी. के. सिंह एवं अन्य
मवेशी या अन्य पशुधन के बीमार हो जाने पर उनका इलाज करने के स्थान पर उन्हें तंदुरूस्त बनाये रखने की व्यवस्था करना अधिक अच्छा है। इसके सम्बन्ध में एक कहावत प्रसिद्व है- “समय से पहले चेते किसान। पशुधन के लिए साफ-सुथरा और हवादार घर-स्थान, सन्तुलित खान-पान तथा उचित देख भाल का इंतजाम करने पर उनके रोगग्रस्त होने का खतरा किसी हद तक टल जाता है। रोगों का प्रकोप कमजोर मवेशियों पर अधिक होता है। उनकी खुराक ठीक रखने पर उनके भीतर रोगों से बचाव करने की ताकत पैदा हो जाती है। बधान की सफाई परजीवी से फैलने वाले रोगों और छूत की बीमारियों से मवेशियों का रक्षा करती है। सतर्क रहकर पशुधन की देख-भाल करने वाले पशुपालक बीमार पशु को झुंड से अलग कर अन्य पशुओं को बीमार होने से बचा सकते हैं। इसलिए पशुपालकों और किसानों को निम्नांकित बातों पर ध्यान देना चाहिए-
1. पशुधन या मवेशी को प्रतिदिन ठीक समय पर भर पेट पौष्टिक चार-दाना दिया जाए। उनकी खुराक में सूखा चारा के साथ हरा चारा, खली-दाना और थोड़ा- सा नमक शामिल करना जरूरी है।
2. साफ बर्तन में ताजा पानी भरकर मवेशी को आवश्यकतानुसार पीने का पानी दें।
3. मवेशी का बंधान साफ और ऊँची जगह पर बनाए। मवेशियों का आवास इस प्रकार बनाएं कि उसमें सूरज की रौशनी और हवा पहुँचने की पूरी-पूरी व्यवस्था हो। आवास में प्रत्येक मवेशी के लिए पर्याप्त स्थान होना चाहिए।
4. इसके साथ ही बंधान की नियमित सफाई और समय-समय पर रोगाणुनाशक दवाएँ जैसे फिनाइल या दूसरी दवा के घोल से उसकी धुलाई करना भी आवश्यक है।
5. मवेशियों या दुसरे पशुधन के खिलाने की नाद ऊँची जगह पर गाड़ी जाए। नाद के नीचे कीचड़ नहीं बनने दें।
6. मवेशियों के आवास से गोबर और पशु- मूत्र जितना जल्दी हो सके खाद के गड्ढे में दबा देने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
7. पशुशाला को प्रतिदिन साफ कर उसका कूड़ा-करकट को खाद के गड्ढे में डालकर दबा देना चाहिए।
8. मवेशियों को प्रतिदिन टहलने और उनके घूमने-फिरने की उचित व्यवस्था को बना कर रखें।
9. मवेशियों के शरीर की सफाई पर पूरा-पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए।
10. मवेशियों साथ लाड़-प्यार भरा व्यवाहर किया जाना चाहिए।
11. मवेशियों में फैलनेवाले अधिकतर संक्रामक रोग (छूत की बीमारियाँ) एंडेमिक यानी स्थानिक होते हैं। ये बीमारियाँ एक बार जिस स्थान पर जिस समय फैलती है, उसी स्थान पर और उसी समय बार-बार फ़ैला करती है। इसलिए समय से पहले ही मवेशियों को टीका लगवाने की व्यवस्था करना भी जरूरी काम है। टीका पशुपालन विभाग की ओर से उपलब्ध रहने पर नाम मात्र का शुल्क लंकर लगाया जाता है। खुरपका-मुहंपका का टीका प्रत्येक वर्ष पशु स्वास्थ्य रक्षा पखवाड़ा के अंतर्गत मुफ्त लगाया जाता है।
मवेशियों के प्रमुख रोग
मवेशियों के कई तरह के रोग फैलते हैं। मोटे तौर पर इन्हें निमनंकित तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है-
क. संक्रामक रोग या छूत की बीमारियाँ।
ख. सामान्य रोग या आम बीमारियाँ।
ग. परजीवी जन्य रोग।
संक्रमक रोग (छूत की बीमारियाँ):
संक्रामक रोग संसर्ग या छूआ-छूत से एक मवेशी से अनेक मवेशी से अनेक मवेशियों में फ़ैल जाता हैं। किसानों को इस बात का अनुभव है कि ये छूत की बीमारियाँ आमतौर पर महामारी का रूप ले लेती है। संक्रामक रोग प्रायः विषाणुओं द्वारा फैलाये जाते हैं, लेकिन अलग-अलग रोग में इनके प्रसार के रास्ते अलग-अलग होते हैं। उदहारणतः खुरपका रोग के विषाणु बीमार पशु की लार से गिरते रहते हैं तथा गौत पानी में घुस कर उसे दूषित बना देते हैं। इस गौत पानी के जरिए स्वस्थ पशु इसके शिकार हो जाते हैं। अन्य संक्रामक रोग के जीवाणु भी गौत पानी मृत के चमड़े या छींक से गिरने वाले पानी के द्वारा एक पशु से अनेक पशुओं को रोग ग्रस्त बनाते हैं। इसलिए यदि गांव या पड़ोस के गाँव में कोई संक्रामक रोग फ़ैल जाए तो मवेशियों के बचाव के लिए निम्नाकिंत उपाय कारगर होते हैं:
1. सबसे पहले रोग के फैलने की सूचना अपने हल्के के पशुधन सहायक या ब्लॉक (प्रखंड) के पशुपालन पदाधिकारी को देनी चाहिए, क्योंकि वे इसकी रोग-थाम का इंतजाम तुरंत करते हुए बचाव का उपाय बता सकते हैं।
2. अगर पड़ोस के गाँव में बीमारी फैली हो तो उस गाँव से मवेशियों या पशुपालकों का आवागमन बंद कर देना चाहिए।
3. सार्वजनिक तालाब या आहार में मवेशियों को पानी पिलाना बंद कर दिया जाए।
4. सार्वजनिक चारागाह में पशुओं को भेजना तुरंत बंद कर देना चाहिए।
5. इस रोग के आक्रांत पशु को अन्य स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए।
6. संक्रामक रोग से मरे हुए पशु को जहाँ-तहाँ फेकना खतरे से खाली नहीं। साथ ही उसकी खाल उतारना भी खतरनाक होता है। मृत पशु को जला देना चाहिए या 5-6 फुट गड्ढा खोद कर चूना के साथ गाड़ (विधिपूर्वक) देना चाहिए।
7. जिस स्थान पर बीमार पशु रखा गया हो या कोई पशु मरा हो तो उस स्थान को फिनाइल की घोल से अच्छी तरह धो देना चाहिए या साफ-सुथरा कर, वहाँ चूना छिड़क देना चाहिए, ताकि रोग के जीवाणु या विषाणु मर जाएँ।
8. खाल की खरीद और बिक्री करने वाले लोग भी इस रोग को एक गाँव से दुसरे गाँव तक ले जा सकते हैं। ऐसे समय में इसकी खरीद और बिक्री को बंद कर देना चाहिए।
1. गलघोंटू
यह बीमारी गाय-भैंस को ज्यादा परेशानी करती है। भेड़ तथा सुअरों को भी यह बीमारी लग जाती है। इसका प्रकोप अधिकतर बरसात में होता है।
लक्षणः शरीर का तापमान बढ़ जाता है और पशु सुस्त हो जाता है। रोगी पशु का गला सूज जाता है जिससे खाना निगलने में कठिनाई होती है। इसलिए पशु खाना-पीना छोड़ देता है। सूजन गर्म रहती है तथा उसमें दर्द होता है। पशु को साँस लेने में तकलीफ होती है, किसी-किसी पशु को कब्जियत और उसके बाद पतला दस्त भी होने लगता है। बीमार पशु 6 से 24 घंटे के भीतर मर जाता है। पशु के मुंह से लार गिरती है।
चिकित्साः संक्रामक रोग से बचाव और रोग की थाम के सभी तरीके अपनाना आवश्यक है। रोगी पशु की तुरंत समुचित इलाज करना चाहिए। बरसात के पहले ही निरोधक का टीका लगवा कर मवेशी को सुरक्षित कर लेना लाभदायक है। इसके मुफ्त टीकाकरण की व्यवस्था विभाग द्वारा की गई है।
2. जहरवाद (ब्लैक क्वार्टर):
यह रोग भी ज्यादातर बरसात में फैलता है। इसकी विशेषता यह है कि यह खास कर छः महीने से 18 महीने के स्वस्थ बछड़ों को ही अपना शिकार बनाता है। इसको सूजवा के नाम से भी पुकारा जाता है।
लक्षणः इस रोग से आक्रांत पशु का पिछला पुट्ठा सूज जाता है। पशु लंगड़ाने लगता है। किसी किसी पशु का अगला पैर भी सूज जाता है। सूजन धीरे-धीरे शरीर के दूसरे भाग में भी फ़ैल सकती है। सूजन में काफी पीड़ा होती है तथा उसे दबाने पर कूड़कूडाहट की आवाज होती है। शरीर का तापमान 104 से 106 डिग्री रहता है। बाद में सूजन सड़ जाती है तथा उस स्थान पर सड़ा हुआ घाव हो जाता है।
चिकित्साः संक्रामक रोग से बचाव और रोकथाम के तरीके, अपनाए जाने चाहिए। पशु चिकित्सा के परार्मश से रोग ग्रस्त पशुओं की इलाज करवाना चाहिए। बरसात के पहले सभी स्वस्थ पशुओं को इस रोग का निरोधक टीका लगवा देना चाहिए।
इ. प्लीहा या पिलबढ़वा (एंथ्रेक्स)
यह भी एक भयानक संक्रामक रोग है। इस रोग से आक्रांत पशु की शीघ्र ही मृत्यु हो जाती है। इस रोग के शिकार मवेशी के अलावे भेड़, बकरी और घोड़े भी होते हैं।
लक्षण: तेज बुखार 106 डिग्री से 107 डिग्री तक। मृत्यु के बाद नाक, पेशाब और पैखाना के रास्ते खून बहने लगता है। आक्रांत पशु शरीर के विभिन्न अंगों पर सूजन आ जाती है। प्लीहा काफी बढ़ जाती है तथा पेट फूल जाता है।
चिकित्साः संक्रामक रोगों की रोक-थाम उनसे बचाव के तरीके अपनाए तथा पशु चिकित्सक की सेवाएँ प्राप्त करें। यह रोग भी स्थानिक होता है। इसीलिए समय रहते पशुओं को टीका लगवा देने पर पशु के बीमार होने का खतरा नहीं रहता है।
ई. खुरपका‘मुहंपका (फूट एंड माउथ डिजीज़):
यह रोग बहुत ही छूआछूत वाला रोग है और इसका संक्रामण बहुत तेजी से फैलता है। यद्यपि इससे आक्रांत पशु के मरने की संभावना बहुत ही कम रहती है तथापि इस रोग से पशु पालकों को को काफी नुकसान होता है क्योंकि पशु कमजोर हो जाता है तथा उसकी कार्यक्षमता और उत्पादन काफी दिनों तक के लिए कम हो जाती है। यह बीमारी गाय, बैल और भैंस के अलावा भेड़ों को भी अपना शिकार बनाती है।
लक्षण: बुखार हो जाना, भोजन से अरुची, पैदावार कम जाना, मुहं और खुर में पहले छोटे-छोटे दाने निकलना और बाद में पाक कर घाव हो जाना आदि इस रोग के लक्षण हैं।
चिकित्सा: संक्रामक रोग की रोक-थाम के लिए बताए गए सभी उपायों पर अमल करें। मुहं के छालों को फिटकरी के 2 प्रतिशत घोल सा साफ किया जा सकता है। पैर के घाव को फिनाइल के घोल से धो देना चाहिए। पैर में तुलसी अथवा नीम के पत्ते का लेप भी फायदेमंद साबित हुआ है। गाँव में खुरपका मुंहपका फूटपाथ बनाकर उसमें से होकर आक्रांत पशुओं को गुजरने का मौका देना चाहिए। घावों को मक्खी से बचाना अनिवार्य है।
बचावः पशु को साल में दो बार छः माह के अंतर पर रोग निरोधक टीका लगवाना चाहिए।
3. पशु यक्ष्मा (टी. बी.):
मनुष्य के स्वस्थ्य के रक्षा के लिए भी इस रोग से काफी सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि यह रोग पशुओं का संसर्ग में रहने वाले या दूध इस्तेमाल करने वाले मनुष्य को भी अपने चपेट में ले सकता है।
लक्षणः पशु कमजोर और सुस्त हो जाता है। कभी-कभी नाक से खून निकलता है, सूखी खाँसी भी हो सकती है। खाने के रुचि कम हो जाती है तथा उसके फेफड़ों में सूजन हो जाती है।
चिकित्साः संक्रामक रोगों से बचाव का प्रबंध करना चाहिए। संदेह होने पर पशु जाँच कराने के बाद उसे एकदम अलग रखने का इंतजाम करें। बीमारी मवेशी को यथाशीघ्र गो-सदन में भेज देना ही इसका उचित उपाय है, क्योंकी यह एक असाध्य रोग है।
थनैला

दुधारू मवेशियों को यह रोग दो कारणों से होता है। पहला कारण है थन पर चोट लगना या थन का काट जाना और दूसरा कारण है संक्रामक जीवाणुओं का थन में प्रवेश कर जाना। पशु को गंदे दलदली स्थान पर बांधने तथा दूहने वाले की असावधानी के कारण थन में जीवाणु प्रवेश कर जाते हैं। अनियमित रूप से दूध दूहना भी थनैल रोग को निमंत्रण देना है साधारणतः अधिक दूध देने वाली गाय-भैंस इसका शिकार बनती है।
लक्षणः थन गर्म और लाल हो जाना, उसमें सूजन होना, शरीर का तापमान बढ़ जाना, भूख न लगना, दूध का उत्पादन कम हो जाना, दूध का रंग बदल जाना तथा दूध में जमावट हो जाना इस रोग के खास लक्षण हैं।
चिकित्साः पशु को हल्का और सुपाच्य आहार देना चाहिए। सूजे स्थान को सेंकना चाहिए। पशूचिकित्सक की राय से एंटीवायोटिक दवा या मलहम का इस्तेमाल करना चाहिए। थनैला से आक्रांत मवेशी को सबसे अंत में दुहना चाहिए।
संक्रामक गर्भपातः
यह बीमारी आमतौर पर गाय-भैंस को ही होती है। हालांकि कभी-कभार भेंड और बकरी भी इससे आक्रांत हो जाती हैं।
लक्षणः पहले पशु को बेचैनी जाती है और बच्चा पैदा होने के सभी लक्षण दिखाई देने लगते हैं। मवेशी के योनिमुख से तरल पदार्थ बहने लगता है। आमतौर पर पांचवे, छठे महीने यह लक्षण दिखाई देने लगते हैं और गर्भपात हो जाता है। प्रायः जैर अंदर ही रह जाता है।
चिकित्साः सफाई का पूरा इंतजाम करें। बीमार पशुओं को अलग कर देना चाहिए। गर्भपात के बाद पिछला भाग गुनगुने पानी से धोकर पोंछ देना चाहिए। गर्भपात के भ्रूण को जला देना चाहिए। जिसे स्थान पर गर्भपात हो, उसे रोगाणुनाशक दवा के घोल से धोना चाहिए। पशु चिकित्सक को बुलाकर उनकी सेवाएँ प्राप्त करनी चाहिए।
नोटः 6 से 8 महीने के पशु को इस रोग (ब्रूसोलेसिस) का टीका लगवा देने से इस रोग का खतरा कम रहता है।
लेखकः प्रोफेसर डी. के. सिंह, पशु चिकित्सा महाविद्यालय, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
