प्राकृतिक खेतीः वर्तमान समय की मांग      Publish Date : 20/06/2026

     प्राकृतिक खेतीः वर्तमान समय की मांग

                                                                                   प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

प्राकृतिक से प्राप्त होने वाले विभिन्न लाभः

उपज में सुधारः प्राकृतिक कृषि करने वाले किसानों ने पारम्परिक कृषि के बाद समान पैदावार प्राप्त होने की सूचना दी है। हालांकि कई मामलों में, रासायनिक तरीके से पैदा की गई फसल अधिक पैदावार प्राप्त होने की सूचना भी मिली है।

मानव स्वास्थ्य का बेहतर संतुलन करती हैः चूंकि प्राकृतिक कृषि में किसी भी सियेंथेटिक रसायन का उपयोग नहीं किया जाता है, इसलिए स्वास्थ्य के लिए जोखिम और खतरे काफी हद तक कम हो जाते हैं। भोजन में पोषक तत्वों का घनत्व अधिक होता है और इसलिए यह बेहतर स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है।

पर्यावरण संरक्षणः प्राकृतिक कृषि बेहतर मृदा जीव विज्ञान, बेहतर कृषि जैव विविधता और बहुत कम कार्बन और नाइट्रोजन फुटप्रिूंट के साथ पानी का अधिक विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चत् करती है।

किसानों की आय में वृद्धिः प्राकृतिक कृषि का उद्देश्य लागत में कमी, कम जोखिम, समान पैदावार, अंतरफसल से आय के कारण किसानों की शुद्ध आय में वृद्वि करके कृषि को अधिक व्यवहार्य और महत्वाकांक्षी बनाना है।

रोजगार सृजनः प्राकृतिक कृषि इनपुट उद्यमों, अन्य सुविधाजन, स्थानीय क्षेत्रों में विपणन आदि के कारण रोजगार के अवसरों का सृजन करती है। प्राकृतिक कृषि से प्राप्त अवशेषों का निवेश किया जाता है, जिससे प्राकृतिक खेती में लागत लगभग शून्य ही आती है।

पानी की खपत में कमीः विभिन्न फसलों के साथ काम करके जो एक-दूसरे की मदद करती हैं और वाष्पीकरण के माध्यम से अनावश्यक पानी की हानि को रोकने के लिए मिट्टी को कवर करती हैं, प्राकृतिक कृषि ‘प्रति बूंद पानी, अधिक फसल’ के सिद्वांत का पालन करती है।

उत्पादन की न्यूनतम लागतः प्राकृतिक कृषि का उद्देश्य किसानों को खेत, प्राकृतिक और घरेलू संसाधनों का उपयोग करके आवश्यक जैविक इनपुट तैयार करने के लिए प्रोत्साहित करके उत्पादन लागत में भारी कटौती करना है।

सिएंथेटिक रासायनिक आदानों के अनुप्रयोग को समाप्त करनाः

                                

सिएंथेटिक उर्वरकों, विशेष रूप से यूरिया, कीटनाशकों, शाकनाशी, खरपतवारनाशी आदि का अत्याधिक उपयोग करने से मिट्टी की जैविक संरचना और मिट्टी की उर्वरा-शक्ति लगभग समाप्त प्रायः हो चुकी है, जिसके बाद मिट्टी के कार्बनिक कार्बन और उर्वरता को नुकसान होता है।

मृदा के स्वास्थ्य को पुनर्जीवन प्रदान करनाः प्राकृतिक कृषि का सबसे तात्कालिक प्रभाव मिट्टी की जैव संरचना पर पड़ता है, सूक्ष्म जीवों और केंचुओं जैसे अन्य जीवित जीवों पर और मिट्टी का स्वास्थ्य पूरी तरह से उसमें रहने वाले जीवों पर निर्भर करता है।

पशुधन के लिए लाभः कृषि प्रणाली में पशुधन का एकीकरण प्राकृतिक कृषि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने में मदद करता है। जीवामृत और बीजामृत जैसे पर्यावरण अनुकूल जैव-इनपुट गाय के गोबर और मूत्र और अन्य प्राकृतिक उत्पादों से तैयार किए जाते हैं, जिससे वातावरण पर भी इनका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः वर्तमान के समय की मांग के अनुसार हमें अधिक से अधिक प्राकृतिक खेती को ही प्राथमिकता देनी चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।