
करियर चुनने से पहले काउंसलिंग जरूरी Publish Date : 09/01/2026
करियर चुनने से पहले काउंसलिंग जरूरी
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
“करियर की प्लानिंग में काउंसलिंग अहम भूमिका निभाती है। इससे छात्र का लक्ष्य स्पष्ट होता है और उसकी मंजिल आसान हो जाती है। काउंसलर छात्रों के दिमाग को फिल्टर करते हुए उनके अंदर चल रहे भटकाव को दूर करने का काम करते हैं। इससे छात्रों का लक्ष्य स्पष्ट होता है और वे गलत करियर चुनने से बच जाते हैं। काउंसलिंग क्यों जरूरी है और इसके क्या-क्या फायदे हैं। आज हम आपको बता रहे हैं”।
दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं के छात्र पढ़ाई के साथ-साथ अपने करियर को लेकर भी चिंता की स्थिति में रहते हैं। इन सब के बीच उन्हें रिजल्ट को लेकर भी मैनेज करना होता है कि कम अंक आने पर वोकेशनल कोर्स कहां तक उचित है। इन स्थितियों में बच्चों को सबसे अच्छा गाइड कर सकते हैं काउंसलर्स। काउंसलिंग को लेकर छात्रों के मन में कई तरह का भ्रम होता है। उन्हें लगता है कि इस प्रक्रिया के दौरान उनका टेस्ट लिया जाएगा और उत्तर न बता पाने की स्थिति में उनकी खिंचाई होगी या बेइज्जती होगी, जबकि हकीकत में होता कुछ और है।
इसमें सबसे पहले छात्र से उसके मन की बात जानने की कोशिश की जाती है कि उसकी रुचि किस विषय में है, वह आगे क्या करना चाहता है, उसकी सोच किस तरह की है, उसकी विश्लेषणात्मक क्षमता कैसी है और वह कितनी फीस पर पाने में सक्षम है। कई बार बातचीत से काउंसलर किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाते तो वे बच्चे का एप्टिट्यूड टेस्ट लेते हैं। काउंसलर उसकी बातों और रुचि की गंभीरता से आकलन करते है और उसके बाद ही किसी निष्कर्ष तक पहुंचते है।
करियर काउंसलर्स बच्चों के दोस्त बनकर उनकी प्रतिभा का आकलन करते हैं और फिर उन्हें गाइड करते हैं। इसलिए जब भी आप अपने करियर के चारे में सोचें तो उससे पहले एक बार करियर काउंसलर से जरूर बात कर लें।
रोडमैप बनाते हैं काउंसलर्स

तेजी से सामने आती संभावनाओं के बीच छात्र अपने लिए विकल्प चुनने में खुद को असहज समझने लगते हैं। उन्हें यह दूर सालता है कि कोर्स वा कॉलेज चुनने के लिए उठाया गया उनका कदम आगे चाल कर गलत न साबित हो जाए। कुछ हद तक उनकी परेशानी जायज भी है, क्योंकि अमूमन 17-18 साल की उम्र तक बच्चे इतने परिपक्व नहीं होते कि वे यह तय कर सकें कि उनके लिए कौन-सा प्लेटफॉर्म उपयुक्त होगा।
पेरेन्ट्स यदि सक्रिय हैं तो उनकी परेशानी का इलाज निकल आता है, अन्यथा वह भंवर जाल में उलझते चले जाते हैं। यह दिक्कत न आए, इसके लिए यह जरूरी हो जाता है कि छात्र बोर्ड की परीक्षाएं खत्म होते ही निश्चिंत न हो जाएं, बल्कि जो भी खाली समय मिलता है, उसमें अपने लिए सही कोर्स, कोचिंग सेंटर अथवा कॉलेज का चयन करें।
अपने इस काम को वे काउंसलर्स, टीचर्स, इंटरनेट एवं पत्र-पत्रिकाओं के जरिए आसान बना सकते हैं। खुलकर उनसे अपने मन की बात करें और जिस भी क्षेत्र में आपकी दिलचस्पी हो उसके बारे में बताएं।
भविष्य आपका है दोस्त का नहीं
छात्रों के बीच प्रतिस्पर्धा का दौर भी खूब चलता है। यदि कोई मित्र बारहवीं में मैथ्स के बाद आगे चल कर अपने लिए मैकेनिकल इंजीनियरिंग में संभावनाएं देखता है तो उसका दूसरा साथी भी उसी नाव पर सवार होना चाहता है, यह जानते हुए भी कि वह सिविल इंजीनियरिंग में बेहतर कर सकता है। कई बार दोस्तों के बहकावे में आकर भी छात्र अपनी अभिरुचि को खूंटी पर टांग देते हैं। इसके पीछे उनकी भावनात्मक कमजोरी होती है। वे भावनात्मक रूप से फैसला लेते हैं।
आपके दोस्त का मजबूत पक्ष मैकेनिकल हो सकता है, पर आप भी उसमें पारंगत हों, यह जरूरी नहीं। आप उसी को आधार बना कर आगे बढ़ें, जिसमें आपकी पकड़ हो। ऐसा करके आप सफलतापूर्वक अपने मुकाम तक पहुंच सकेंगे। किसी भी क्षेत्र में करियर बनाने ने के फैसले से पहले अपना आकलन करें और सोचें कि आप किस क्षेत्र में बेहतर कर सकते हैं।
ऐसे करें दुविधा कम

अमूमन लोगों को लगता है कि काउंसलर्स काउंसलिंग करने के बहुत ज्यादा पैसे लेते होंगे, लेकिन इससे बचने के लिए कुछ आसान रास्ते भी हैं। छात्र चाहे तो इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन काउंसलिंग करा सकते हैं। यदि छात्र फोन अथवा इंटरनेट के जरिए काउंसलिंग करा रहा है तो उसका खर्चा इंटरनेट या फोन के खर्च तक ही सीमित होता है।
इसी के साथ विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में काउंसलिंग से जुड़े कॉलम आते हैं, चाहें तो वहां पत्र या ईमेल भेज कर अपनी दुविधा को कम खर्च में समाप्त कर सकते हैं। कई ऐसी वेबसाइट्स भी हैं, जहां आप ऑनलाइन पेमेंट करके चैट के जरिए काउंसलिंग करा सकते हैं।
अभिभावकों की भी होती है काउंसलिंग
अधिकतर मां-बाप अपने बच्चों को उनकी मर्जी के बिना उन्हें अपनी मन मर्जी के मुताबिक कोर्स करने के लिए कहते हैं। ऐसे में काउंसलर उन्हें भी राय देते हैं। उन्हें उनके बच्चे के अच्छे-बुरे के बारे में समझाते हैं।
बच्चे भी करते हैं काउंसलिंग
परीक्षा के बाद छात्र की जो भी ख्वाहिशें हैं, उनसे पेरेन्ट्स को भली-भांति अवगत होना जरूरी है। अब यह छात्र पर निर्भर करता है कि वह अपने पेरेन्ट्स को भरोसे में लेने के लिए किस तरह उनकी काउंसलिंग करता है। यदि किसी कोर्स अथवा कॉलेज पर आप और आपके पिता में मतभेद है तो उनके साथ बैठ कर उस पर अपनी सोच व मजबूत विन्दुओं से उन्हें अवगत कराएं। हो सकता है उन्हें आपकी बात सही लगे और वे आपके फैसले का समर्थन करें।
अक्सर पेरेन्ट्स की यह कमजोरी होती है कि जो कुछ वह अपने समय में हासिल नहीं कर पाए होते, वह बच्चे के माध्यम से पाना चाहते हैं। इन्हीं मनोभावों को लेकर वे बच्चे पर अपनी पसंद थोपते हैं। आप उनका भरोसा बनाए रखते हुए उन्हें मनोस्थिति से बाहर ला सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
