सेना में अधिकारी बनने का अवसर      Publish Date : 20/10/2025

                     सेना में अधिकारी बनने का अवसर

                                                                                                                                                                                           प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

“यदि आप ग्रेजुएट हैं और डिफेंस में अधिकारी बनना चाहते हैं, तो सीडीएस के माध्यम से एंट्री कर सकते हैं। कैसे होती है परीक्षा और किस तरह की तैयारी है जरूरी”-

सीडीएस परीक्षा के माध्यम से व्यक्ति को डिफेंस में अधिकारी बनने का मौका मिलता है। यही कारण है कि इस सर्विस का युवाओं में काफी क्रेज है। यदि आपका सपना डिफेंस में अधिकारी बनकर देश की रक्षा करने का है, तो आपके लिए सुनहरा अवसर है। हाल ही में संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी ने कम्बाइंड डिफेंस सर्विसेज एग्जामिनेशन की की घोषणा की है।

इसके अंतर्गत इंडियन मिलिट्री एकेडमी के 250, नेवल एकेडमी के 40, एयर फोर्स एकेडमी के 32, ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (चेन्नई 91वां एसएससी कोर्स) के 175 और ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (चेन्नई 9 वां एसएससी वुमेन) के 25 सीटों के ऐंडमिशन के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। आवेदन ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से कर सकते हैं।

उम्र सीमा

                                                                      

इंडियन मिलिट्री सर्विस की परीक्षा के लिए वे अविवाहित उम्मीदवार ही योग्य हैं, जिनका जन्म 2 जनवरी 1988 से पहले और 1 जनवरी 1993 के बाद न हुआ हो, जबकि नेवल एकडेमी की परीक्षा के लिए कैंडिडेट्स का जन्म जनवरी 1990 से पहले और 1 जनवरी, 1993 के बाद नहीं हुआ हो। एयरफोर्स एकेडमी की परीक्षा में शामिल होने के लिए आपका जन्म 2 जनवरी, 1989 से पहले और 1 जनवरी, 1993 के बाद नहीं होना चाहिए।

शैक्षणिक योग्यता

इंडियन मिलिट्री एकेडमी की परीक्षा में शामिल होने के लिए मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी से किसी भी विषय में खातक होना जरूरी है। वहीं नेवॅल एकेडमी के लिए इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री जरूरी है, जबकि एयरफोर्स एकेडमी की परीक्षा के लिए ग्रेजुएट होने के साथ ही बारहवीं में गणित और भौतिकी विषय अवश्य पड़ा हो।

परीक्षा का स्वरूप

इंडियन मिलिट्री, नेवॅल और एयरफोर्स एके डमी की लिखित परीक्षा तीन चरणों में होगी। पहला पेपर अंग्रेजी, दूसरे पेपर में जनरल नॉलेज तथा तीसरा पेपर एलिमेंट्री मैथमेटिक्स का होगा। प्रत्येक पेपर के लिए दो घंटे का समय दिया जाएगा और प्रत्येक के सौ अंक होंगे। दूसरे शब्दों में कुल 6 घंटे में तीन सौ अंकों के तीन पेपर होंगे। लिखित परीक्षा में सफल होने के बाद इंटेलिजेंस और पर्सनैल्टी टेस्ट लिया जाएगा।

सिलेबस स्कैन

इस परीक्षा के लिए एलिमेंट्री मैथ्स का स्तर मैट्रिक लेवल का होगा। वहीं अंग्रेजी की परीक्षा के लिए क्वेश्चंश को कुछ इस तरह से डिजाइन किया जाता है, जिससे छात्रों के अंग्रेजी भाषा की पकड़ को जांचा और परखा जा सके। जनरल नॉलेज के पेपर में पूछे जाने वाले प्रश्न प्रायः समकालीन घटनाओं पर आधारित होते हैं। इसके अलावा, इंसमें राजनीति विज्ञान, भारतीय इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र तथा साइंस से जुड़े प्रश्न भी पूछे जाते हैं। एलिमेंट्री मैथमेटिक्स के पेपर में अर्थमेटिक्स, अल्जेना, ट्रिगोनोमेट्री, जिओमेट्री और स्टेटिस्टिक्स से जुड़े प्रश्न होते हैं।

कैसे करें तैयारी

सीडीएस परीक्षा की तैयारी के लिए आप सबसे पहले पूर्व के प्रश्नों का गहन अध्ययन करें। इससे आपको प्रश्नों के पूछने का ढंग तथा उसका स्तर पता लग जाएगा। एलिमैट्री मैथ्स की तैयारी के लिए आप प्रामाणिक पुस्तकों को लेकर पर्याप्त अभ्यास करें। गणित के सवाल से संबंधित महत्वपूर्ण सूत्रों को याद रखें तथा सवाल को हल करने के लिए छोटे-छोटे ट्रिक भी सीखें।

इस तरह के ट्रिक से परीक्षा हॉल में समय की बचत होगी। वैसे तो मैथ्स कीतैयारी के लिए अनेक पुस्तक बाजार में उपलब्ध हैं, लेकिन यदि आप चाहें, तो आर. एस. अग्रवाल की पुस्तकों का गहन अध्ययन कर सकते हैं। जनरल अवेयरनेस की तैयारी के लिए बारहवीं तक की एनसीईआरटी करी पुस्तकों के अलावा जागरण वार्षिकी डाइजेस्ट को अवश्य पढ़ें। इंडियन पॉलिटी के लिए सुभाष कश्यप के साथ ही डीडी बसु को अवश्य पढ़ें। यदि आप पिछले वर्षों के प्रश्नों की देखेंगे, तो पाएंगे कि इतिहास में स्वतंत्रता संघर्ष से रिलेटेड प्रश्न अधिक पूछे जाते हैं।

                                                            

इस कारण आप इस पर विशेष ध्यान दें। इसके लिए विपिन चंद्रा की पुस्तक को अवश्य पढ़ें। परीक्षा में पूछे जानेवाले सभी विषयों को पढ़ने के बाद आप यह निर्धारित करें कि इनमें से किस विषय की तैयारी के लिए अधिक समय देना जरूरी है। यदि आप अपनी जरूरत के अनुसार सभी विषयों की तैयारी के लिए समय निर्धारित कर लेते हैं, तो अपनी तैयारी को योजना के अनुसार मूर्त रूप देने की कोशिश करें। आपकी तैयारी सही दिशा में होगी, तो अपने आप आगे बढ़ते चले जाएंगे।

इंटरव्यू है अहम

यह परीक्षा सबसे कठिन मानी जाती है। इस परीक्षों में इस तरह के टेस्ट लिए जाते हैं कि व्यक्तित्व का सही तरीके से मूल्यांकन हो जाता है। इसके अंतर्गत ऑफिसर्स लाइक क्वालिटी के साथ हो लीडरशिप क्षमता, प्रॉब्लम सॉल्विंग कैपेसिटी को परखा जाता है। इसके अंतर्गत वर्बल और नॉन वर्बल तरीके के प्रश्न पूछे जाते हैं। इसके अलावा, ग्रुप डिस्कशन, ग्रुप प्लॉनिंग, आउटडोर ग्रुप टास्क के साथ किसी खास विषय पर बोलने के लिए भी कहा जाता है। इस टैस्ट का मुख्य उद्देश्य छात्रों को बौद्धिक और मानसिक क्षमता को परखना होता है। कठिन प्रश्न पूछने पर भी अपनी तरह से सर्वश्रेष्ठ उत्तर देने की कोशिश करें। अधिक जानकारी के लिए आप www.upsc.gov.in साइट लॉगऑन कर सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।

 

नवीनतम प्रौद्योगिकियां AI, उद्योग 4.0, और ऑटोमेशन

प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं अन्य

जैसी नई प्रौद्योगिकियों को पेश करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, ताकि एमएसएमई को नवाचार करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए आवश्यक टूल मिल सकें।

मानव संसाधनः नई प्रौद्योगिकियों में प्रशिक्षण, कौशल संवर्धन कार्यक्रमों और प्रमाणपत्रों के माध्यम से कार्यबल का विकास किया जाएगा। इसका उद्देश्य वर्तमान कौशल स्तर और भविष्य की जरूरतों के बीच के अंतर को पाटना है।

इंफ्रास्ट्रक्चरः डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाएगा ताकि एमएसएमई को उच्च गुणवत्ता वाले तकनीकी प्लेटफॉर्म, विश्वसनीय इंटरनेट, और आवश्यक डिजिटल दूल मिल सकें।

वित्त/क्रेडिट तक पहुँचः एमएसएमई को नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने और बढ़ाने के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करने में आसानी होगी, जिसमें सरकारी योजनाओं, रियायती ऋणों और वित्तीय संस्थाओं के माध्यम से मदद की जाएगी।

बाजारः एमएसएमई को बाजारों तक पहुँचने, उद्योग नेताओं के साथ सहयोग करने और उनके उत्पादों को स्थानीय और वैश्विक स्तर पर विस्तारित करने के लिए प्लेटफ़ॉर्म प्रदान किया जाएगा।

ज्ञान सृजनः उद्योग, अकादमी और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग के माध्यम से नवाचार को बढ़ावा दिया जाएगा ताकि एमएसएमई के लिए नया ज्ञान और समाधान उपलब्ध हो सके।

यह समाधान एमएसएमई के तकनीकी उन्नयन, अनुसंधान, प्रशिक्षण और नए बाजारों तक पहुँचने के लिए आवश्यक टूल, संसाधन और ज्ञान प्रदान करने के लिए तैयार किए गए है।

प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण

एमएसएमई के सामने एक प्रमुख चुनौती तकनीकी नवाचारों का व्यावसायीकरण और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य प्रौद्योगिकियों को अपनाना है। इसके बिना, सर्वश्रेष्ठ तकनीकी उन्नति भी अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँच सकती। इसका ध्यान यह सुनिश्चित करने पर है कि प्रौद्योगिकी का व्यावसायीकरण एमएसएमई के लिए एक प्राथमिकता बन जाए, ताकि वे इन प्रौद्योगिकियों को सुलभ और सस्ते तरीके से अपना सकें।

एमएसएमई के लिए नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने और अनुकूलित करने की क्षमता दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा के लिए महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करना कि तकनीकी नवाचारों का केवल विकास ही नहीं बल्कि सफलतापूर्वक कार्यान्वयन हो और एमएसएमई पारिस्थितिकी तंत्र में उनका पैमाना भी बढ़े, भारत की विनिर्माण और आर्थिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण होगा। इन प्रयासों से एमएसएमई को आधुनिक तकनीकों को अपनाने, उत्पादकता में सुधार करने और वैश्विक बाजारों में प्रवेश करने के लिए आवश्यक उपकरण, संसाधन और ज्ञान प्रदान किया जाएगा।

नई तकनीकों की पहचानः उद्योग/क्षेत्र विशेष तकनीकों की पहचान करना और उनका मूल्यांकन करना और उन प्रमाणित तकनीकों के बारे में प्रमाण-आधारित जानकारी प्रदान करना जो भारतीय एमएसएमई संदर्भ में अनुकूलित की जा सकती है। विभिन्न हितधारकों, जिनमें उद्योग और अकादमिक संस्थान शामिल हैं, से भागीदारी प्राप्त करना और तकनीकों की पहचान करना जो स्थानीय रूप से टिकाऊ तरीके से अपनाई जा सकती हैं।

क्षेत्र विशेष प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए रोडमैप

एक बार जब क्षेत्र/उद्योग विशेष तकनीकों की पहचान हो जाती है, तो एक रणनीतिक योजना तैयार की जानी चाहिए, जिसमें संबंधित क्षेत्र उद्योग द्वारा वर्तमान तकनीकी अपनाने के स्तर और नई तकनीकों को अपनाने के लिए आवश्यकताओं को स्पष्ट किया जाए। योजना में निम्नलिखित पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा जैसे कि संशोधन, अनुकूलन/स्वीकृति ढांचा, प्रोटोटाइप विकास, उत्पादकता और लागत के संदर्भ में मूल्यवृद्धि ताकि संशोधित तकनीक को व्यापक व्यावसायिक स्तर पर अपनाना सुनिश्चित हो सके।

कौशल/मानव विकासः तकनीकों के वाणिज्यीकरण पर ध्यान केंद्रित करने के अलावा, मौजूदा श्रमिकों और नए श्रमिकों में संबंधित कौशल का विकास या उन्नयन आवश्यक है।

नए प्रशिक्षण पाठ्यक्रमः उद्योग/क्षेत्र की पहचानी गई तकनीकी जरूरतों के अनुसार पाठ्यक्रम का विकास करना। विकसित पाठ्यक्रम में प्रशिक्षण पाठ्यक्रम, सिलेबस, पाठ योजना, प्रशिक्षक मैनुअल, छात्र मैनुअल, अभ्यास मैनुअल, प्रश्न बैंक, परीक्षा/प्रमाणीकरण प्रणाली आदि शामिल होने चाहिए, जिनमें AI, मशीन लर्निंग, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग जैसी उभरती तकनीकें शामिल हैं।

प्रशिक्षकों का प्रशिक्षणः नए पाठ्यक्रमों के निर्माण और मौजूदा पाठ्यक्रमों के पुनः डिजाइन से एक नए प्रकार के प्रशिक्षकों की आवश्यकता होगी, जो नए पाठ्यक्रमों को प्रशिक्षित करने के लिए आवश्यक जानकारी और ज्ञान से लैस होंगे। इसके अतिरिक्त, यह प्रशिक्षक नए पाठ्यक्रमों पर प्रशिक्षण देने के लिए आवश्यक उपकरणों और प्रशिक्षण सामग्री के विकास में भी सहायता करेंगे।

वित्त/क्रेडिट तक पहुँच नई तकनीकों को अपनाने के

लिए एमएसएमई को समय पर और पर्याप्त क्रेडिट तक पहुँच की आवश्यकता होती है। वर्तमान परिदृश्य में, केंद्रीय और राज्य सरकारों के कई प्रयासों के बावजूद, एमएसएमई को समय पर और पर्याप्त क्रेडिट प्राप्त करने में चुनौती का सामना करना पड़ता है। तकनीक को अपनाने को बढ़ावा देने के लिए, ऋण संस्थानों द्वारा नए वित्तीय उत्पाद और जोखिम मूल्यांकन तकनीकें विकसित की जानी चाहिए।

सहायता प्राप्त ब्याज दरें तकनीकी अपनाने के लिए विशेष रूप से लक्षित ऋणों पर ब्याज दरों को कम करने से एमएसएमई के लिए क्रेडिट अधिक किफायती बन सकता है। कम ब्याज दरें उधारी की लागत को घटाती है, जिससे एमएसएमई के लिए तकनीकी निवेश को वित्तपोषित करना आसान हो जाता है।

प्रौद्योगिकी विशिष्ट ऋण उत्पादः वित्तीय संस्थान तकनीकी अपनाने के लिए एमएसएमई की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विशेष ऋण उत्पाद डिजाइन कर सकते है। इन उत्पादों में लचीली भुगतान शर्तें, लंबी ऋण अवधि, और एमएसएमई के निवेश चक्र और नकद प्रवाह के अनुरूप विश्राम अवधि हो सकती है।

बाजार स्थानः यह महत्वपूर्ण है कि देश भर में चल रहे प्रयासों के समन्वय को बढ़ावा दिया जाए और नवप्रवर्तको, प्रौद्योगिकी प्रदाताओं और एमएसएमई के लिए एक सामान्य मंच प्रदान किया जाए ताकि मौजूदा और उभरती तकनीकों के क्षेत्रों में बाजार लिंकिंग को बढ़ावा दिया जा सके।

ग्राहक-विक्रेताः क्षेत्रीय और क्लस्टर स्तर पर प्रमुख क्षेत्रों के लिए बैठकें और प्रदर्शनी का आयोजन। एमएसएमई को प्रदर्शन देने और संभावित खरीदारों, नवप्रवर्तकों और प्रौद्योगिकी प्रदाताओं तक पहुँच प्रदान करने के अलावा, इन कार्यक्रमों का उपयोग उन उद्यमों को दिखाने और प्रचारित करने के लिए भी किया जा सकता है जिन्होंने अपने उत्पादों उत्पादकता और लाभप्रदता में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी समाधानों को अपनाया है।

OEM-MSME लिंकेज: OEMS के साथ दीर्घकालिक संबंध स्थापित करना एमएसएमई के लिए एक प्रमुख चुनौती है। इसका मुख्य कारण एमएसएमई के बीच OEM विक्रेता मान्यता मानदंडों के बारे में जागरूकता का अभाव है। OEMS और एंकर उद्योग इकाइयों की आवश्यकताओं को समझने और एमएसएमई से गुणवत्ता मानक आवश्यकताओं को साप्ट रूप से दस्तावेज करने के लिए, मंत्रालय और उद्योग सथी को पहचाने गए OEMs/एंकर इकाइयों के साथ मिलकर त्रैमासिक/अर्ध-वार्षिक उद्योग संवाद आयोजित करने की आवश्यकता है।

ज्ञान सृजनः केंद्रीय और राज्य स्तर की सरकारों ने उद्यमों के लाभ के लिए कई पहल की है, लेकिन कई उद्यम इन पहलों से लाभ नहीं उठा पा रहे हैं क्योंकि उन्हें इन पहलों के बारे में सीमित जानकारी या कोई जानकारी नहीं है। हालांकि कई कार्यक्रमों और कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है ताकि आवश्यक जानकारी का प्रचार-प्रसार किया जा सके लेकिन प्रयास अक्सर असंयोजित रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप जानकारी की नकल या विषमता हो जाती है। इसी प्रकार की चुनौती मशीनों के रखरखाव, प्रौद्योगिकी और वित्त तक पहुँचने के दौरान भी दिखाई देती है।

उभरती प्रौद्योगिकियों को तेजी से लागू करने और एमएसएमई के लिए समाधान ढूंढ़ने के लिए एक प्लेटफॉर्म बनाना। यह प्लेटफॉर्म एमएसएमई को नई प्रौद्योगिकियों को जल्दी से अपनाने में मदद करेगा। इसे UDYAMI भारत पोर्टल से जोड़ा जाएगा, जो एमएसएमई के लिए सभी सेवाओं का वन स्टाप समाधान होगा। इस पोर्टल पर प्रौद्योगिकी प्रदाता (जो नई तकनीक पेश करते है) और प्रौद्योगिकी को अपनाने वाले एमएसएमई दोनों आपस में जुड़ सकते हैं। यह पोर्टल एमएसएमई के लिए उन प्रौद्योगिकियों की पहचान और विकास करेगा जो उनके लिए खास जरूरतों के हिसाब से होंगी। इसके अलावा, यह पोर्टल अनुसंधान और शैक्षिक संस्थानों के लिए एक साझेदारी का मंच बनेगा, जहां वे एमएसएमई की समस्याओं के लिए वैज्ञानिक समाधान विकसित करेंगे। इसका उद्देश्य यह है कि अनुसंधान को एक ठोस लाभ में बदला जाए, जो एमएसएमई की प्रतिस्पर्धा को बढ़ाए।

संक्षेप में, भारत में एमएसएमई के विकास के लिए प्रौद्योगिकी अपनाना जरूरी ही नहीं बल्कि अपरिहार्य है। हालांकि उच्च लागत, जागरूकता की कमी और सीमित बुनियादी ढांचे जैसी चुनौतियां मौजूद है तथापि इस दिशा में सरकार द्वारा की जा रही पहल और सस्ती एवं सुलभ प्रौद्योगिकियों की बढ़ती उपलब्धता एमएसएमई के लिए आधुनिकीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम बनने के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है। प्रौद्योगिकी को अपनाने से एमएसएमई को उत्पादकता में सुधार, लागत घटाने, उत्पाद गुणवत्ता में वृद्धि और बाजार में अपनी उपस्थिति बढ़ाने में मदद मिल सकती है, जो अंततः भारत के आर्थिक विकास में योगदान करेगा।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।