
महाशिवरात्री के पर्व पर विशेष Publish Date : 10/08/2026
महाशिवरात्री के पर्व पर विशेष
लोक आस्था और प्रकृति का अनुपम संगम हैं भगवान शिव। भारतीय संस्कृति और दर्शन में भगवान शंकर केवल एक देवता ही नहीं बल्कि वह संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रतीक हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार शिवलिंग में त्रिदेवों का वास माना गया है। शिवलिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और शीर्ष पर स्वयं शिव विराजमान होते हैं। यही कारण है कि जल चढ़ाने की परंपरा सम्पूर्ण सृष्टि को तृप्त करने का भाव रखती है।
शिव का संबंध अनादि काल से है। हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त हुई ‘पशुपति मोहर’ इस बात का प्रमाण है कि सिंधु सरस्वती संस्कृति से लेकर आज के जनजातीय समाज तक शिव की पूजा अबाध रूप से चली आ रही है। वे जनजातियों, आर्यों और सकल लोक समाज के साझा देव हैं।
कला और मूर्तिकला में भी शिव का विराट स्वरूप स्पष्ट रूप से झलकता है। पूर्व मध्य प्रदेश जो कि अब छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित ताला गाँव में अद्वितीय मूर्तियों में शिव के स्वरूप के माध्यम से पूरी प्रकृति और जीवजगत को दर्शाया गया है। जहां वासुकी नाग का फन, मेंढ़क के जैसी आँखें, मोर के समान कान, छिपकली के जैसी नाक, मछलियों के जैसी मुछें तथा ठोड़ी से केकड़े, हाथ मगरमच्छ से निकलते और पैर हाथी के जैसे हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि शिव ही ‘पशुपति’ हैं।
दक्षिण भारत से लेकर एलोरा तक उनके अनेक रूप चित्रित हैं। एलोरा की प्रसिद्ध रावणानुग्रह मूर्ति इसका एक सुंदर उदाहरण है, जहां कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास करने वाले रावण का मान मर्दन भगवान शिव ने केवल अपने पैर के मात्र एक अंगूठे से ही कर दिया था।