
बदलाव के साथ Publish Date : 07/03/2026
बदलाव के साथ
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही प्रकृति में बदलाव की शुरुआत भी हो गई है। सूर्य की मुखरता के साथ सर्दी रजाई समेटने की तैयारी करने लगी है। जब बदलते मौसम के साथ शरीर का तालमेल बिठाने के लिए हम सब भी अपने को बदल लेते हैं, तो करियर को चमकदार बनाने के लिए बदलते समय की जरूरतों के अनुसार खुद को क्यों नहीं बदल सकते? कितना जरूरी है बदलाव के साथ-साथ बदलना, बता रहे हैं प्रोफेसर आर. एस. सेंगर-
दिल्ली के रोहन मार्केटिंग के पेशे में हैं। क्लाइंट मीटिंग के लिए दिनभर बाइक से पूरे एनसीआर में घूमते रहते हैं। पिछले सप्ताह तक उन्हें सर्दी बहुत सता रही थी। बाइक पर हवा और सर्दी से बचने के लिए हर तरह से पहन-ओढ़कर निकलते थे। कभी-कभी तो इतनी सर्दी होती थी कि घर से निकलने का मन भी नहीं होता था। पर पिछले कुछ दिनों से सूरज इतनी तेजी से चमक रहा है, उन्हें पसीने छूटने लगे हैं। ठंड की वापसी की आशंका में में कुछ दिन तो वह भारी-भरकम कपड़े बर्दाश्त करते रहे, लेकिन कई दिन से ऐसा होने पर उनका सन जवाब दे गया और उन्होंने सिर्फ एक स्वेटर में निकलना तय कर लिया।
यहां तो रोहन ने मौसम के अनुसार बदलाव कर लिया, लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू भी है, वह यह कि रोहन जिस कंपनी में काम करते हैं, वहां उनसे अपेक्षाएं बदल गई हैं। उनसे कहा गया कि संस्थान के बड़े नाम को देखते हुए जरूरतमंद कंपनियां हमसे सर्विस लेने तो अपने आप आ जाती हैं, ऐसे में क्लाइंट मीटिंग के नाम पर समय जाया न करते हुए कुछ अलग तरह का काम करते हुए कंपनी के लिए रेवेन्यू जुटाएं। उनसे और उनके अन्य समकक्षों को निर्देशित किया गया कि वे संस्थान के नाम पर इवेंट आर्गेनाइज करें और वहां अलग-अलग क्लाइंट के स्टॉल स्पांसर कराएं।
अब एक तरह का काम करते-करते कंफर्ट जोन में पहुंच चुके रोहन को इससे उलझन हो रही है। वह खुद को इस काम में सहज नहीं महसूस कर पा रहे हैं, जबकि उनके कई समकक्षों ने इस बदलाव को आसानी से स्वीकार करते हुए उसके मुताबिक काम करना आरंभ कर दिया है और रिजल्ट भी देने लगे हैं। उधर, रोहन के मन में संस्थान बदलने के ख्याल तक आने लगे हैं। इसी बीच एक करीबी मित्र ने रोहन की उलझन को देखते हुए उसे शांति से समझाया। यह भी बताया कि तुम काम कर रहे हो, नया काम भी उसी का एक्सटेंशन है और किसी भी संस्थान में रहने पर एक न एक दिन यह स्थिति तो आनी ही है। फिर क्यों न बदलती परिस्थित्तियों के अनुसार ही खुद को ढाला जाए। खुद उस मित्र का काम इसका उदाहरण था। सोच-विचार करने पर रोहन को भी मित्र की बात ही ठीक लगी और अगले दिन से वह पूरे उत्साह से अपने नए काम में जुट गए।
सीखें प्रकृति से
हम सीखना चाहें, तो प्रकृति से बहुत कुछ सीख सकते हैं। कैसे प्रकृति में बदलाव होने के साथ सब कुछ बदलने लगता है। यहां तक कि हम खुद को भी जाड़ा, गर्मी, बरसात के अनुसार खुद को अनुकूलितकर लेते हैं। जाड़े में जहां गर्म कपड़े पहनकर और गर्म तासीर वाली चीजें खाकर खुद को ठीक रखते हैं, वहीं गर्मी-लू में हल्के कपड़े पहनकर, ठंडी जगहों पर रहकर और लस्सी- दही, खीरा-खरबूजा आदि के जरिए खुद को अनुकूलित करते हैं। पर बेहतर करियर और अपनी पहचान बनाना भी आज के समय की बड़ी चुनौती है। ऐसा तभी हो सकता है, जब हम बदलते वक्त की जरूरतों को समझें और बदलाव को स्वीकार करने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार रखें।
एआइ और रोबोटिक्स?
आइटी, आइटीईएस सहित कई क्षेत्रों के एंप्लाई हाल के दिनों में ऑटोमेशन, एआइ और रोबोटिक्स को लेकर आशंकित हैं। लेकिन उत्साही युवा इससे चिंतित होने की बजाय सकारात्मक नजरिए से आगे की ओर देख रहे हैं। इस बारे में टोरंटो में रहने वाले और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के मास्टर भारतीय मूल के 14 वर्षीय तन्मय बक्षी का भी स्पष्ट कहना है कि एआइ से जॉब जाने की बात बेबुनियाद है।
इससे जॉब समाप्त होने की बजाय शिफ्ट होंगे। हम एआइ के जरिए कहीं ज्यादा क्वालिटी वर्क कर पाएंगे। ऐसे में मेडिकल, एजुकेशन जैसे कई क्षेत्रों में क्रांति लाई जा सकती है। ऐसे में इन नई तकनीकों से डरने की बजाय इन्हें सीखने और लगातार अपडेट होने की जरूरत है। इस जरूरत को समझते हुए तमाम कंपनियां अपने स्टाफ को एआइ जैसी तकनीक में नए सिरे से प्रशिक्षण दिला रही हैं। वैसे देश के शिक्षण संस्थानों को भी नई तकनीकों में अपने स्टूडेंट्स को प्रशिक्षित करने की दिशा में कारगर पहल करने की जरूरत है, ताकि युवा कैंपस में ही नई तकनीकों में खुद को सक्षम बना सकें।
सोच में लाएं बदलाव
नई तकनीकों से आंखें मूंदने और पुरानी चीजों को सुविधाजनक मानते रहने की बजाय बदलाव के प्रति सकारात्मक नजरिया रखने की जरूरत है। इसके लिए खुद को लचीला बनाएं। हर अच्छे बदलाव को स्वीकार करने और उसके अनुसार नई चीजें सीखने के लिए अपने मन को तैयार करें।
न पालें मुगालता
बदलते मार्केट के अनुसार हर कंपनी अपनी स्ट्रेटेजी बदलती है और इस स्ट्रेटेजी के अनुसार ही वहां के स्टाफ को अपनी कार्यकुशलता दिखानी होती है। इसमें जो फिट नहीं बैठता, वह पीछे छूट जाता है। यह मुगालता कभी न पालें कि आपके बिना कंपनी कुछ नहीं कर पाएगी या उसे आगे बढ़ने में मुश्किलें होंगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
