आदमी किसके सहारे जीता है?      Publish Date : 03/02/2026

                    आदमी किसके सहारे जीता है?

                                                                                                                                                                प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

जीने के लिए एक व्यक्ति की बुनियादी आवश्यकताएं क्या होती हैं? गरीबी और जरूरतों के बीच संघर्ष कर रहे व्यक्ति के सामने आया मौका किसी की मदद का तो क्या थी उसकी प्रतिक्रिया, लियो टालस्टाय की कहानी का अनूदित अंश...

लियो टालस्टाय (1828-1910) एक महान रूसी लेखक और दार्शनिक थे, जिन्हें विश्व साहित्य के सबसे प्रभावशाली लेखकों में से एक माना जाता है। युद्ध और शांति, अन्ना कैरेनिना आदि उनकी प्रसिद्ध कृतियां हैं।

जूते बनाने वाला मोची सीमेन अपनी पत्नी मैट्रीना और बच्चों के साथ एक किसान के घर में रहता था। उसके पास अपना घर और अपनी जमीन नहीं थी। वह अपने परिवार का पेट सिर्फ जूते बनाने के काम की आमदनी से ही पालता था। उसके लिए रोटी महंगी, मगर उसका काम सस्ता था।

वह जो भी कमाता, वह खर्च हो जाता था। उस मोची और उसकी पत्नी के पास सिर्फ एक ही फरवाला कोट था और वह भी बुरी तरह से फट चुका था। मोची फर के एक नए कोट के लिए भेड़ की खाल खरीदने के बारे में दो साल से सोच रहा था।

वसंत का मौसम आने तक मोची ने कुछ बचत भी कर ली थी। उसकी पत्नी के बक्से में कागज के नीचे पांच रूबल दबे पड़े थे और गांव में 20 कोपेक के करीब उसका बकाया भी था। (100 कोपेक = 1 रूबल), एक दिन सुबह-सुबह मोची फर का कोट खरीदने गांव की तरफ गया। उसने अपनी पत्नी का मुलायम नानकीन जैकेट पहना और उसके ऊपर अपना मोटा काफ्तान डाला। उसने अपनी जेब में तीन रूबल डाले। नाश्ता करने के बाद हाथ में एक डंडी ली और चल दिया।

वह सोचने लगा, मुझे किसान से पांच रूबल उघार मिल जाएंगे और उनमें मैं अपने ये तीन रूबल मिलाकर फर के कोट के लिए भेड़ की खाल खरीद लूंगा। यही बात सोचते सोचते मोची गांव तक पहुंच गया और उसने किसान को आवाज दी। किसान घर पर नहीं था। किसान की बीवी ने मोची से वादा किया कि वह किसान को उसकी रकम के साथ उसके पास भेज देगी, मगर उसने खुद कुछ भी नहीं दिया। मोची अब दूसरे किसान के पास पहुंचा, मगर वहां भी किसान ने कसम खाकर कहा कि उसके पास पैसे नहीं हैं, बल्कि उस किसान ने अपने जूतों की मरम्मत के लिए मोची को सिर्फ 20 कोपेक ही दिए।

मोची ने अब भेड़ की खाल उधार पर खरीदने का मन बनाया, पर बेचने वाला इसके लिए तैयार नहीं था। उसने कहा, 'रकम लाओ और जो चाहो वह ले लो। हमें पता है, कर्जा वसूलने का मतलब क्या है।'

इस तरह मोची को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। उसे सिर्फ जूते की मरम्मत करने के लिए 20 कोपेक और साथ में एक जोड़ी जूता तथा उस पर लगाने के लिए चमड़े का टुकड़ा ही मिला। मोची बहुत दुखी हुआ और उसने अपने वे सारे 20 कोपेक शराब पीने में खर्च कर दिए तथा फर के कोट के बिना ही घर की तरफ चल पड़ा। सुबह काफी ठंड थी पर चूंकि अब वह थोड़ी शराब पी चुका था, इसलिए उसे बिना फर के कोट के ही थोड़ी. गरमाहट लग रही थी।

अब मोची अपने हाथ की छड़ी से जमे हुए कीचड़ के दूहे को मारता और दूसरे हाथ में उस मरम्मत वाले जूते को लहराता हुआ, खुद से बातें करता हुआ चला जा रहा था। मोची बड़बड़ाया, 'मैं कोट के बिना ही गरमाहट महसूस कर रहा हूं। मैं शराब पी चुका हूं और यह अब मेरी नसों में बह रही है। मुझे अब किसी भेड़ की खाल की जरूरत नहीं है। मैं अपनी तकलीफ भूल चुका हूं। वाह, क्या आदमी हूं मैं। मुझे कोई परवाह नहीं है।

मैं बिना फरवाले कोट के ही रह सकता हूं। मुझे उसकी हमेशा जरूरत नहीं है। सिर्फ एक हूं ही तकलीफ है कि वह बूढ़ी औरत दुखी हो जाएगी। यह वाकई शर्म की बात है। मैं उस आदमी के लिए काम करता हूं और वह मुझे बुरी तरह से काम में लगाए रहता है। जरा रुको। क्यों। वह मुझे एक बार में दो डाइम ही देता है। इन दो डाइम से क्या हो सकता है? बस, एक ड्रिंक और सब खत्म। मैं इच्छाओं से परेशान हूं। किसान के पास घर है, जानवर है और जो मेरे पास है वह सब कुछ किसान का ही है। उसके पास अपना अनाज है, जबकि मुझे अनाज खरीदना पड़ता है।

मैं अपनी मर्जी से जो चाहूं वह कर सकता हूं, पर मुझे रोटी के लिए हर सप्ताह तीन रूबल खर्च करने पड़ते हैं। मेरे घर पहुंचते ही रोटी खत्म हो जाती है और मुझे फिर से डेढ़ रूबल का इंतजाम करना पड़ता है।'

मोची अब चलते-चलते सड़क के मोड़ पर बने एक छोटे गिरजाघर के पास तक आ गया और वहां उसने नजदीक ही कुछ सफेद सी चीज देखी। उस समय कुछ धुंधलका सा था और मोची के बहुत ही गौर से देखने की कोशिश के बावजूद उस सफेद सी चीज का अनुमान नहीं लगा वह पाया। उसने सोचा, वहां कोई पत्थर तो था नहीं। वह गाय है क्या? मगर यह गाय की तरह नजर नहीं आ रहा है। यह आदमी के सिर की तरह दिख रहा है और इसके पीछे कुछ सफेद सा है, लेकिन वहां एक आदमी कर क्या रहा है?

मोची अब काफी नजदीक पहुंच चुका था, जहां से वह साफ देख भी सकता था। वह दृश्य कितना अजीब सा था। यह तो वाकई एक आदमी है। पता नहीं, जिंदा है या मर गया। वह आदमी बिलकुल नंगा गिरजाघर की दीवार के सहारे बैठा था, जरा सा भी हिल डुल नहीं रहा था। मोची बुरी तरह से डर गया। उसने मन में सोचा, लगता है, किसी ने इस आदमी को मार डाला है और इसके कपड़े उतारकर इसे यहां फेंक दिया है। बिना उसके पास पहुंचे मुझे कुछ भी पता नहीं चलेगा।

मोची तेजी से आगे बढ़ा मगर गिरजाघर का चक्कर काटकर निकल गया। हालांकि जैसे ही वह गिरजाघर से आगे निकला, उसने मुड़कर पीछे देखा। उसने देखा कि वह आदमी उस इमारत से कुछ हटकर एक तरफ झुक रहा था और ऐसा लग रहा था कि वह मोची को चूर रहा था। मोची अब पहले से भी अधिक डर गया और सोचने लगा कि मुझे इसके पास जाना चाहिए कि नहीं? अगर मैं इसके पास जाता हूं तो कुछ भी बुरा घट सकता है। कौन जानता है कि वह किस तरह का आदमी है। यदि मैं इसके पास जाऊंगा तो क्या पता वह उछल कर मेरा गला दबा दे। मैं इससे बचकर भाग भी नहीं पाऊंगा और अगर यह मेरा गला नहीं दबाता है तब भी यह मेरे लिए परेशानी पैदा कर सकता है। चूंकि यह बिलकुल नंगा है, में इसके लिए कर क्या सकता हूं? मैं अपने कपड़े उसे दे नहीं सकता हूं। हे भगवान्। मुझे बचाओ।

मोची ने तेजी से अपने कदम आगे बढ़ाए। जब उसके विवेक ने उस पर चोट करना शुरू किया, तब तक वह गिरजाघर से काफी आगे निकल चुका था। मोची आगे जाकर सड़क पर रुक गया। उसने खुद से कहा, 'सीमेन, यह तुम क्या कर रहे हो? एक आदमी तकलीफों से मर रहा है और तुम उसे छोड़कर भाग रहे हो। तुम्हारा साहस भी खत्म हो गया? क्या तुम डर गए कि वह तुमसे तुम्हारा सारा धन छीन लेगा? यह ठीक नहीं है, सीमेन।' सीमेन वापस मुड़ा और उस आदमी के पास गया।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।