
आज के समाज का सच Publish Date : 05/01/2026
आज के समाज का सच
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

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बिक रहा है पानी, पवन बिक न जाए, बिक रही है धरती, गगन बिक न जाए।
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चाँद पर भी बिकने लगी है जमीं, डर है कि सूरज की तपन बिक न जाए।
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हर जगह बिकने लगी है स्वार्थ नीति, डर है कि कहीं धर्म बिक न जाए।
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हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता, कहीं इन्हीं के हाथों वतन बिक न जाए।
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देकर दहेज खरीदा गया है अब दूल्हे को, कहीं उसी के हाथों दुल्हन बिक न जाए।
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सरे आम बिकने लगे अब तो सांसद, डर है कि कहीं संसद भवन बिक न जाए।
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आदमी मरा तो भी आँखें खुली हुई हैं, डरता है मुर्दा, कहीं कफन बिक न जाए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
