अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति का महापर्व      Publish Date : 24/10/2025

               अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति का महापर्व

                                                                                                                                                                        प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं मुकेश शर्मा

भाई दूज, भाई-बहन के स्नेह और रक्षा के प्रतीक के रूप में मानाया जाने वाला पर्व है। इस दिन यमुना के जल में स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य देने वाले लोगों को स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।

वर्तमान श्री श्वेतवाराह कल्प में अकाल मृत्यु से मुक्ति प्राप्त करने का महापर्व कर्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितिया तिथि ‘‘भाई-दूज’’ को यम द्वितिया के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन बहनें शिव-पवर्ती एवं मृत्यु के देवता यमदेव की पूजा अर्चना कर अपने भाईयों के माथे पर चंदन, अक्षत अथवा रोली आदि का तिलक लगाकर उनकी आरती उतारती हैं। इसके साथ ही उनके दहिने हाथ पर कलावा बाँधकर गंध, अक्षत और पुष्प आदि के साथ आशिर्वाद देते हुए उनके उत्तम स्वास्थ्य और कार्य व्यापार आदि में उनकी सफलता की कामना करती हैं।

सनातन धर्म में यह एक ऐसा पर्व है, जिसमें बहने अपने भाईयों को अकाल मृत्यु से मुक्ति दिला सकती हैं। केवल इतना ही नहीं, बहने इस दिन अपने भाईयों को शनिदेव की साढ़ेसाती, ढैय्या के साथ ही उनकी अन्य मारक दशाओं के कुप्रभावों से भी बचा सकती हैं।

                                                        

भाई भी इस दिन अपनी बहनों को उपहार स्वरूप वस्त्र और आभूषण इत्यादि देकर उनके प्रति अपने स्नेह का प्रदर्शन करते हैं। इस दिन बहने संध्या के समय, अपने भाईयों की लम्बी आयु के प्रति कामना करते हुए यमदेव को प्रसन्न करने के उद्देश्य से अपने घर के दरवाजे पर चार बत्तियों वाला दिया दक्षिण दिशा की ओर मुख करके प्रज्जवलित करती हैं।

सनातन धर्म को मानने वाले समस्त लोग इस दिन दक्षिण दिशा की ओर मुख कर चौमुखा दीपक प्रज्जवलित कर मंत्र ‘‘ऊँ दीपो ज्योतिः परब्रहम दीपो ज्योतिः जनार्दनः। दीपो हरतु में पापं पूजा दीप नमोस्तुते’’ का उचारण करना चाहिए और इसके साथ ही तीन बार ऊँ यमदेवाय नमः मंत्र का भी तीन बार उच्चारण कर मृत्यु के देवता यम को प्रणाम करना चाहिए।

इस महापर्व के सन्दर्भ में एक पौराणिक कथा का वर्णन प्राप्त होता है जो कि इस प्रकार से है- यमुना जी को अपने भाई यमदेव के प्रति अपार स्नेह था। वह अपने भाई यम से बार-बार निवेदन करती रहती थी कि वह उनके घर पर आएं और वहां आकर भोजन ग्रहण करें। परन्तु यमराज अपने काम की व्यस्तता के कारण यमुना के निमंत्रण को अक्सर टाल देते थे।

इस प्रकार से काफी समय व्यतीत हो जाने के बाद एक दिन यमदेव को अपनी बहन यमुना की बहुत याद आई और उन्होंनें अपने दूतों से बहन यमुना को ढूँढने के लिए कहा, लेकिन दूत यमुना जी को तलाश करने में सफल नहीं हुए। इसके बाद यमराज स्वयं ही गोलोक गए और वहाँ विश्राम घाट पर उनकी भेंट यमुना जी से हो गई। अपने भाई यामराज को देखेते ही यमी जी भावविभोर हो उनका आदर सत्कार करने ली और उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया।

                                                              

इससे प्रसन्न होकर यमराज ने अपनी बहन यमी से कहा कि वह जो चाहे वर मांग ले, इस यमी ने जनकल्याण की भावना से यमराज से कहा कि भैय्या मुझे यह वरदान दो कि जो भी व्यक्ति मेरे जल में स्नान करेगा, उसे यमपूरी में कठोर यातना न सहनी पड़े। जनकल्याण के प्रति आपनी बहन यमुना जी की व्याकुलता को देखकर यमदेव ने कहा ‘‘एवमस्तु’’ यानि कि ऐसा ही हो।

इसके साथ ही उन्होने कहा कि जो लोग तुम्हारा तिरस्कार करेंगे, तुम्हें बार-बार अपमानित करेंगे मैं उन्हें यमपाश में बाँधकर यमपुरी ले जाउँगा और फिर भी यदि वह तुम्हारे जल में स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य अपर्ति करेंगे तो उसे स्वर्गलोक में स्थान प्राप्त होगा। जिस दिन यह सब घटित हुआ वह दिन कर्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितिया तिथि थी इसके बाद से यह दिन भाई दूज के रूप में मनाया जाने लगा।

मतस्य पुराण के अनुसार, भाई दूज के दिन मृत्यु के देवता ‘‘यमराज’’ को प्रसन्न करने के लिए उनका षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। ब्रजमण्ड़ल में इस दिन बहनें अपने भाईयों के साथ यमुना नदि में स्नान करती हैं। इस प्रकार से यमुना में स्नानदि करने के बाद यमुना के तट पर ही भाई-बहन का एक साथ भोजन करना बहुत ही कल्याणकारी माना जाता है।      

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।