
औशधीय पौधे तीखुर की खेती, और इसके उपयोग एवं लाभ Publish Date : 26/09/2025
औशधीय पौधे तीखुर की खेती, और इसके उपयोग एवं लाभ
पोफेसर आर. एस. सेंगर एवं अन्य
तीखुर का वानस्पतिक नाम: Curcuma angustifolia) है और यह हल्दी जाति का एक पादप है जिसकी जड़ का सार सफेद चूर्ण के रूप में प्राप्त होता है और यह खीर, हलुआ आदि बनाने के काम आता है। यह भारतीय उपमहाद्वीप का देशज पादप है। यह पादप अपने औषधीय गुणों के कारण प्रसिद्व है और पश्चिमी जगत में में भी अब इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। इसी क्रम में एक विदेशज तीखुर भी आता है जिसे अरारोट कहते हैं।
तीखुर एक औषधीय पौधा होता हैं जिसका उपयोग विभिन्न रोगो के उपचार के लिए किया जाता हैं। तीखुर का वानस्पतिक नाम कर्कुमा अंगस्टिफोलिया (Curcuma angustifolia) है।

तीखुर को संस्कृत में ट्वाक्सिरा और हिंदी में तीखुर कहा जाता है। यह हल्दी की तरह दिखने वाला औषधीय पौधा होता है, जिसे सफेद हल्दी भी कहते हैं।
तीखुर के कंदों से कपूर जैसी खुशबू आती है, जिसके चलते इसे जंगलों में पहचानना आसान होता है।
तीखुर क्या है?
तीखुर एक बिना तने वाला कंदीय पौधा है। इसकी जड़ें मांसल और सिरों पर हल्के भूरे रंग के कंदों से युक्त होती हैं।
इसकी भालाकार पत्तियां 30-40 सेंटीमीटर लंबी और नुकीली होती हैं। इसके पीले फूल गुलाबी सहपत्रों से घिरे होते हैं।
तीखुर की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी

तीखुर मुख्य रूप से मध्य भारत, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, और हिमालयी क्षेत्रों में उगाया जाता है। तीखुर की खेती के लिए मुख्य रूप से रेतीली दोमट मिट्टी और 25-35°C तापमान की आवश्यकता होती है।
अक्टूबर-नवंबर में तीखुर की पत्तियां सूखने लगती हैं, जबकि अप्रैल-मई में इसके पौधे को पहचानना मुश्किल हो जाता है।
तीखुर के औषधीय उपयोग
- तीखुर का कंद पौष्टिक और रक्तशोधक है।
- तीखुर में स्टार्च, आयरन, सोडियम, कैल्शियम, विटामिन ए और सी उपलब्ध होते हैं।
- तीखुर का उपयोग मिठाइयों, शर्बत, फलाहारी खाद्य पदार्थों और आयुर्वेदिक दवाओं किया जाता है।
- यह कमजोरी, बुखार, अपच, जलन, पीलिया, पथरी और अल्सर जैसी समस्याओं में लाभकारी सिद्व होता है।
तीखुर की खेती की विधि
मिट्टी की तैयारी
- तीखुर की खेती करने के लिए मई में खेत की जुताई करें और 10-15 टन गोबर की खाद खेत में डालें।
कंदों की रोपाई करने की विधि
- तीखुर के अंकुरित कंदों को जून-जुलाई में 30 से.मी. की दूरी पर लगाया जाना चाहिए।
- कंदों को जीवित कलियों सहित छोटे टुकड़ों में काटकर नालियों के बीच की मिट्टी में रोपें।
सिंचाई और देखभाल
- रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई करें।
- मानसून में वर्षा न होने पर उचित समय पर सिंचाई करते रहें।
- बरसात के बाद हर 20-25 दिन में खरपतवार हटाएं।
कटाई और संग्रहण
- तीखुर की फसल 7-8 महीने में तैयार हो जाती है।
- फरवरी-मार्च में, जब पत्तियां सूख जाएं, तो कंदों को निकाल लें।
- कंदों को धोकर छाया में सुखाएं और सुरक्षित रखें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
