सितंबर के महीने में होने वाली बारिश के प्रभाव      Publish Date : 29/09/2026

सितंबर के महीने में होने वाली बारिश के प्रभाव

                                                                                                              प्रो0 आर. एस. सेंगर

हाल ही में सितंबर के महीने में अचानक हो रही बारिश और बाढ़ के कारण सभी लोग चिंतित हैं, क्योंकि ये घटनाएँ खाद्य सुरक्षा के संकट को बढ़ा सकती हैं।

समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में देश के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होगी। बंगाल की खाड़ी छोटे चक्रवात अर्नब और उससे उपजे प्रभाव के चलते उत्तर प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड, बिहार, हिमाचल प्रदेश समेत देश के एक दर्जन से अधिक राज्यों में जो भारी बारिश हुई है, उसने आम लोगों के समक्ष तो समस्याएं पैदा कर ही दी हैं। फसलों को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। कुछ राज्यों में लोगों की जान भी चली गई है। अत्यधिक बारिश के कारण नदियां उफना गईं और इसके चलते बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है।

मौसम में एकाएक यह अप्रत्याशित बदलाव इसलिए भी आया है क्योंकि पश्चिमी विक्षोभ चक्रवाती सिस्टम से मिल गया है। यह पहली बार नहीं हुआ है जब देश के कुछ हिस्सों में कम समय में अत्यधिक बारिश हुई हो और उसके चलते जनजीवन में बाधा पड़ी हो। पिछले कुछ वर्षों से ऐसा रह रह कर होने लगा है, इसका प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन है। वैसे तो जलवायु परिवर्तन और उसके दुष्प्रभावों को लेकर एक लंबे समय से चिंता जताई जा रही है, लेकिन समस्या यह है कि विश्व समुदाय इस चुनौती का सामना करने के लिए अपेक्षित एकजुटता दिखाने के लिए तैयार नहीं है। यह स्थिति तब है जब यह माना जा रहा है कि वायुमंडल के बढ़ते तापमान को रोकने का लक्ष्य पीछे छूटता चला जा रहा है।

कहना कठिन है कि विश्व समुदाय जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए कब कमर कसेगा और इस पर निर्णय लेगा। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक केंद्र और राज्य सरकारों को जलवायु परिवर्तन के रूप में अत्यधिक बारिश जैसी आपदाओं का जो सामना करना पड़ रहा है उसके लिए पर्याप्त तैयारी रखने के प्रबंध करने होंगे, विशेष रूप से राज सरकारों को क्योंकि अक्सर यह देखने में आता है कि वे आपदाओं से निपटने में अपनी तैयारी या पर्याप्त प्रबंधन के बजाय केंद्र सरकार से मिलने वाली मदद की ओर ही अधिक ताकती रहती है।

यह देखने में आ रहा है कि अत्यधिक बारिश और उसके चलते बाढ़ के कारण जान माल को भी काफी नुकसान होता है। वह कई बार बुनियादी ढांचे की कमजोरी के चलते भी होता है। अब जब इसकी आशंका बढ़ती जा रही है कि मौसम में अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिलते रहेंगे, तब फिर अत्यधिक बारिश से निपटने के ठोस उपाय करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। इससे भी निपटने के उपाय करने होंगे क्योंकि एक और जहां देश के अनेक राज्यों को भारी वर्षा का सामना करना पड़ रहा है, वहीं देश के कुछ हिस्सों और विशेष रूप से महाराष्ट्र में सूखे का संकट उभर रहा है।

यह ध्यान रहे कि चाहे अतिवृष्टि हो या अल्पवृष्टि, दोनों ही खाद्य सुरक्षा को संकट में डालने का काम करती है और खाद्य सुरक्षा के समक्ष संकट पैदा होने से अर्थव्यवस्था की चुनौतियां बढ़ती हैं। इस समय इस बारिश से खरीफ की फसल तो प्रभावित हुई है। साथ ही साथ बारिश हो जाने के कारण रबी की फसल भी प्रभावित हो सकती है। खासतौर से तिलहन की फसल की बुआई का समय शुरू होने वाला था और बारिश हो जाने के कारण बुआई देरी शुरू हो पाएगी, जिससे उत्पादकता और उत्पादन पर प्रभाव पड़ेगा

बारिश से खरीफ फसलों पर बढ़ा खतरा, रबी की तैयारी को मिलेगी नमी

मेरठ और आसपास के क्षेत्रों में शनिवार को हुई बारिश का असर खरीफ और आगामी रबी दोनों फसलों पर देखने को मिल सकता है। मौसम विभाग ने 26 सितंबर को मेरठ के लिए भारी बारिश, गरज-चमक और तेज हवाओं की चेतावनी जारी की थी तथा 27 सितंबर को भी बारिश की संभावना जताई है।

इस समय खेतों में खड़ी धान, गन्ना, मक्का, बाजरा, उड़द और मूंग जैसी खरीफ फसलों के लिए अधिक बारिश चिंता का कारण बन सकती है। पके या पकने की अवस्था में पहुंच चुके धान और मोटे अनाज में तेज हवा के साथ बारिश से पौधे गिरने, दानों की गुणवत्ता प्रभावित होने तथा कटाई में देरी का खतरा रहता है। दलहनी फसलों में लगातार नमी रहने से फलियों और दानों में फफूंद लगने तथा सड़न की संभावना बढ़ सकती है। गन्ने के खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहने से जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती और पौधों की वृद्धि तथा स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। अधिक वर्षा की स्थिति में खेत से अतिरिक्त पानी निकालना सबसे जरूरी है।

दूसरी ओर, यह बारिश आगामी रबी सीजन के लिए लाभकारी मिट्टी की नमी उपलब्ध करा सकती है। सरसों, गेहूं, आलू और अन्य रबी फसलों की खेत तैयारी में इसका लाभ मिलेगा और शुरुआती सिंचाई की आवश्यकता कम हो सकती है। हालांकि खेत में पानी जमा रहने की स्थिति में बुवाई या खेत की तैयारी जल्दबाजी में नहीं करनी चाहिए। मिट्टी जब उचित अवस्था में आ जाए तभी जुताई और बुवाई करना बेहतर होगा।

किसान खेतों में जल निकासी की व्यवस्था रखें, फिलहाल सिंचाई और रासायनिक छिड़काव रोकें तथा मौसम साफ होने के बाद ही अगली कृषि क्रिया करें।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।