
रोबोटिक्स क्रांति के दुष्प्रभाव Publish Date : 13/09/2026
रोबोटिक्स क्रांति के दुष्प्रभाव
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं इं0 कार्तिकेय सिंह
सम्मानित साथियों,
यह एक बेहद गंभीर और विचारणीय विषय है कि आधुनिक युग में तकनीक और रोबोटिक्स जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, इससे मुझ राकेश सिंह सेंगर की यह चिंता पूरी तरह से स्वाभाविक और तार्किक है।
क्या रोबोटिक्स क्रांति हमें मानसिक और शारीरिक रूप से अपंग बना रही है या बना सकती है-
वर्तमान समय में इंसान जिस तेजी के साथ मशीनों के ऊपर निर्भर होता जा रहा है, इसे देखकर ऐसा लगता है कि वह दिन अब दूर नही है जब कि ााने की प्लेट से रोटी का टुकड़ा उठाकर मुंह में रखने के लिए भी हमें किसी रोबोट की जरूरत पड़ेगी।
लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इस अत्यधिक आराम का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव होगा।
‘ठहरा हुआ पानी भी सड़ जाता है मित्रों’ प्रकृति ने मानव को एक अद्भुत शरीर और बुद्धि दी है, इस शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हमें शारीरिक परिश्रम और पर्याप्त ‘रक्त संचार’ (Blood Circulation) का होना बहुत ही अनिवार्य होता है।
जब हम हिलना-डुलना ही बंद कर देंगे, तो हमारे अंग भी अपनी कार्यक्षमता को खत्म करने लगेंगे और हमारी यह निष्क्रियता हमें बीमारियों का घर बना देगी। ऐसे में गम्भीर रूप से विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या सिर्फ ‘मानसिक विकास’ हमें स्वस्थ रख सकता है? बिलकुल नही अल्कि विज्ञान इस बात का गवाह है कि केवल मानसिक कार्य या दिमागी विकास हमारे शरीर को कभी भी पूरी तरह से स्वस्थ नही रख सकता।
एक स्वस्थ दिमाग के लिए स्वस्थ शरीर (Healthy Body) का होना भी उतना ही जरूरी है। शारीरिक श्रम से ‘हैप्पी हॉर्मोंस’ (Endorphins) का स्राव होता हैं, जो कि तनाव दूर करने में सक्षम होते हैं। सिर्फ बैठे रहने और सोचने से हमारा मानसिक तनाव और मोटापा ही बढ़ेगा। प्रकृति का नियम है - Use it or Lose it यानि आप अपने शरीर के जिस अंग का उपयोग नही करोगे, वह निष्क्रिय होकर नष्ट हो जाएगा, इसका सबसे अच्छा उदाहरण मानव की पूँछ है, जिसका मानव ने उपयोग नहीं किया और वह धीरे-धीरे विलुप्त हो गई।
समय रहते संभलना बहुत जरूरी है
इसलिए यह सत्य है कि किसी भी तकनीक का उपयोग अपनी सुविधा के लिए करना चाहिए, न कि खुद को उसका गुलाम बनाने के लिए। किसी भी रोबोट से काम तो जरूर करवाएं, लेकिन अपने शरीर को योग, व्यायाम और प्राकृतिक श्रम से वंचित न रखें। तो आइए, हम सभी प्रोफेसर राकेश सिंह सेंगर के इस संदेश को आगे बढ़ाएं और समाज को तकनीक के इस ‘आलसी जाल’ बाहर आने के लिए सचेत करें।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।