
अब हवा की सेहत रखी जाएगी नजर पर Publish Date : 07/09/2026
अब हवा की सेहत रखी जाएगी नजर पर
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
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सीएसआईआर- एम्प्री ने वायु गुणवत्ता निगरानी को बेहतर बनाने के लिए बनाया है नया सोडार सिस्टम।
देश में वायु गुणवत्ता की निगरानी अब और ज्यादा सटीक और वैज्ञानिक तरीके से हो सकेगी, क्योंकि भोपाल स्थित सीएसआईआर-एम्प्री (प्रगत पदार्थ तथा प्रक्रम अनुसंधान संस्थान) ने अत्याधुनिक सोडार सिस्टम विकसित किया है। यह तकनीक वायुमंडलीय परत की ऊंचाई, मौसम और प्रदूषण की स्थिति को मापती है और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुरोध पर तैयार की गई है। संस्थान के निदेशक डॉ. बल्लाडा भास्कर ने बताया कि इस सिस्टम का सॉफ्टवेयर भी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जरूरतों के मुताबिक डिजाइन किया गया है।
इसमें मौसम से जुड़े पैरामीटर भी जोड़े गए हैं ताकि एटमोस्फेरिक बाउंड्री लेयर की तुलना बेहतर ढंग से की जा सके। फिलहाल यह प्रणाली नौ राज्यों के दस स्थानों पर लगाई जा चुकी है, जिनमें दिल्ली, महाराष्ट्र समेत कई राज्य शामिल हैं। इसका उपयोग सरकारी एजेंसियों के साथ-साथ प्राइवेट इंडस्ट्रीज़ भी कर रही हैं।
वायुमंडलीय सीमा परत की ऊंचाई मापता है सोडार
वैज्ञानिक डॉ. कीर्ति सोनी ने बताया कि सीएसआईआर-एम्प्री द्वारा बनाए साउंड डिटेक्शन एंड रेंजिंग सिस्टम टेक्नोलॉजी (सोडार) वायुमंडलीय सीमा परत (एबीएल) की ऊंचाई मापता है। यह सिस्टम राडार की तरह ही काम करता है, बस रेडियो तरंग की जगह ध्वनि (साउंड) तरंग का उपयोग किया जाता है। एटमॉस्फेयरिक बाउंड्री लेयर वायुमंडल की सबसे निचली परत है, जो पृथ्वी की सतह से सटी हुई है और जो मौसम के बदलाव लिए जिम्मेदार है।
यह ट्रोपोस्फीयर का सबसे निचला हिस्सा है और आमतौर पर इसका ऊपरी हिस्सा सतह से कुछ किलोमीटर ऊपर होता है। एबीएल की ऊंचाई दिन के समय और स्थान के अनुसार बदलती रहती है। वायुमंडलीय सीमा परत की ऊंचाई विभिन्न कारकों पर निर्भर करती है, जैसे कि दिन का समय, मौसम, और सतह का प्रकार। सामान्यतः इसकी ऊंचाई 50 मीटर से कुछ किलोमीटर तक हो सकती है। एबीएल की ऊंचाई और संरचना मौसम के लिए महत्वपूर्ण है। एबीएल की ऊंचाई और संरचना को समझना जलवायु मॉडलिंग और मौसम पूर्वानुमान में महत्वपूर्ण है। सोडार ईकोग्राम संरचना से वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अन्य पर्यावरण समस्याओं को समझने में मदद मिलती है।
मौसम पूर्वानुमान में होता है इस्तेमाल
सोडार सिस्टम का उपयोग किसी भी क्षेत्र की पॉल्यूशन लोडिंग कैपेसिटी या कैरिंग कैपेसिटी पता करने में किया जाता है। इंडस्ट्रियल वर्किंग समय डिसाइड करने के लिए सोडार टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाता है। यह एक ऐसा उपकरण है जो इंडस्ट्री में लगने वाली चिमनी की ऊंचाई क्या होगी बताने में मदद करता है। सोडार सिस्टम के द्वारा जेनरेटेड एबीएलडाटा और एबीएल संरचना का उपयोग जलवायु मॉडलिंग और मौसम पूर्वानुमान में किया जाता है।
वायुमंडलीय प्रदूषकों के फैलाव के बारे में जानकारी
पृथ्वी की सतह से जो भी प्रदूषण उत्सर्जन होता है, जैसे कि सल्फर डाईआक्साइड, कार्बन डाईआक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, पलटकुलेट मैटर और अन्य सभी वायुमंडलीय सीमा परत में ही इकट्ठा होते है। सोडार सिस्टम इन सभी प्रदूषकों की ओवरऑल लोडिंग बताता है। सोडार सिस्टम द्वारा मापी गई वायुमंडलीय सीमा परत से वेंटिलेशन गुणांक (वीसी) की गणना की जाती है। वेंटिलेशन गुणांक एक महत्वपूर्ण चर है जो सीमा परत की ऊंचाई और सतही वायु गति द्वारा निचले वायुमंडल में वायुमंडलीय प्रदूषकों के फैलाव और निर्माण के बारे में जानकारी प्रदान करता है।
सोडार प्रणाली वायुमंडलीय पैरामीटर, जैसे कि ऊंचाई, इन्वर्जन और स्थिरता का पता लगाने और मापने के लिए ध्वनिक स्पंदनों का उपयोग करती है। इन मापदंडों का विश्लेषण करके, शोधकर्ता वायुमंडल में प्रदूषकों के फैलाव और प्रसार को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। प्रभावी वायु गुणवत्ता प्रबंधन रणनीतियों को विकसित करने के लिए यह जानकारी महत्वपूर्ण है।
प्रदूषण को कम करने के नीतिगत निर्णयों को लेने के लिए सूचित करता है-
सोडार मिक्सिंग हाइट को ट्रैक करने में मदद करता है, जो प्रदूषक फैलाव और प्रसार को समझने के लिए आवश्यक है। सोडार द्वारा उत्पन्न डाटा वायु गुणवत्ता में सुधार और प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से नीतिगत निर्णयों को लेने के लिए सूचित करता है। सीएसआईआर-एम्प्री द्वारा विकसित सोडार तकनीक वायु गुणवत्ता निगरानी की दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण है। वायुमंडलीय मापदंडों में वास्तविक समय की जानकारी प्रदान करके, यह अभिनव प्रणाली शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और नियामक अधिकारियों को वायु गुणवत्ता के प्रबंधन और प्रदूषण को कम करने के लिए अधिक प्रभावी रणनीति विकसित करने में मदद करती है।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।