
साझा प्रयासों से कचरा प्रबंधन Publish Date : 05/05/2026
साझा प्रयासों से कचरा प्रबंधन
प्रो0 आर. एस. सेंगर
भारत में शहरी कचरे की चुनौती का समाधान संदर्भ के अनुकूल उपायों और साझा जिम्मेदारियों के संतुलन से ही संभव है। धुंध ने एक बार फिर उत्तर भारत को जकड़ लिया है, लेकिन वायु प्रदूषण की यह कहानी इस बार थोड़ी अलग है। अवसर वायु प्रदूषण के लिए पराली जलाना सुर्खियों में रहता है, लेकिन एक अनुमान के अनुसार, खुले में कचरा जलाना, वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में से एक बन सकता है, जो शहरों के पीएम 2.5 स्तर में लगभग 10 प्रतिशत का योगदान करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या और भी अधिक है। पार्टिकुलेट मैटर डाइऑक्सिन और फ्यूरान जैसे हानिकारक उत्सर्जन के जरिये सीधे स्वास्थ्य पर असर डालते हैं।
पिछले दो दशकों में, देश में निकलने वाले कचरे की मात्रा लगभग दोगुनी हो चुकी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2021-22 में देश भर में निकले 620 लाख टन शहरी ठोस कचरे में से केवल 54 फीसदी कचरे का निस्तारण हो पाया, जबकि 24 प्रतिशत कचरा लैंडफिल में चला गया और 22 प्रतिशत कचरे का कोई हिसाव नहीं मिल पाया। इसे ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने कई कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिनमें सबसे उल्लेखनीय स्वच्छ भारत मिंशन है, जिसका लक्ष्य 2026 तक सभी शहरों को कचरा मुक्त बनाना है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वॉयरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के अध्ययन के अनुसार, ठोस कचरा प्रबंधन में 'सभी समस्याओं के लिए एक जैसे समाधान' मॉडल प्रभावी नहीं है, क्योंकि शहरों के कचरे के प्रकार, भौगोलिक स्थितियां, संस्थागत क्षमता और नागरिकों के व्यवहार में भिन्नता होती है। ऐसे में, यह त्रिग्रयामी दृष्टिकोण शहरों को तेजी से कदम उठाने में मदद कर सकता है।

शहरों को कचरे की मात्रा के साथ उसके प्रवाह पहला, स्थानीय शहरी निकायों (यूएलबी) को आंकड़े व निगरानी को प्राथमिकता देनी चाहिए। मौजूदा सामान्य अनुमान-आधारित दृष्टिकोण उपयुक्त योजनाएं, तैयार करने में बाधा डालती है।. और बदलते स्वरूप का भी नियमित आकलन करना चाहिए। अपडेट किए गए आंकड़ों की सूची रुझानों को पहचानने, स्थानीय स्तर पर उपयुक्त सुविधाएं तैयार करने, और प्रभाव आकलन के साथ उत्सर्जन का अनुमान लगाने में मदद कर सकती है। इंदौर और सूरत जैसे शहर पहले से अपने एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल सेंटर के जरिये रियल-टाइम में कचरे की निगरानी कर रहे हैं और अपने ठोस कचरा प्रबंधन तंत्र को सुधार रहे हैं।
दूसरा, स्कूल, होटल और मॉल जैसे थोक कचरा उत्पादकों को सही ढंग से नियंत्रित करना चाहिए। शहरों में कुल कचरे में 30-40 प्रतिशत भागीदारी इन्हीं की हो सकती है। म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के तहत जैविक कचरे का प्रबंधन इन्हें स्वयं करना होता है, पर अधिकांश नगर पालिकाओं को इसे लागू करने में कठिनाई होती है। यूएलवी को इनकी सूची बनानी चाहिए और सुविधा केंद्रों के माध्यम से - इनसे संपर्क करना चाहिए। संपत्ति कर में छूट या पुणे जैसे शहरों की मान्यता योजना जैसी पहलें भी की जानी चाहिए, ताकि कचरे का प्रसंस्करण उसके उत्पत्ति स्थल पर ही किया जा सके। तीसरा, यूएलबी को मिशन लाइफस्टाइल फॉर एन्वॉयरनमेंट (लाइफ) के तहत 'जीरो वेस्ट' - धोम के अनुरूप वार्षिक कचरा कटौती लक्ष्य तय करना चाहिए।

भारत में शहरी कचरे की चुनौती का समाधान संदर्भानुकूल उपायों और साझा जिम्मेदारियों के संतुलन से ही संभव है। जहां एक ओर शहरी स्थानीय निकायों को योजना निर्माण, वित्त जुटाने और नियमों के प्रवर्तन में मजबूती लानी होगी, वहीं नागरिकों को कचरे की छंटाई और जिम्मेदारीपूर्ण - निपटान में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
