केंद्रीय बलों में आइपीएस की तैनाती का सवाल      Publish Date : 04/05/2026

   केंद्रीय बलों में आइपीएस की तैनाती का सवाल

                                                                                                                                  प्रो0 आर. एस. सेंगर

इन दिनों केंद्रीय संसद की ओर से पारित केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक बहुत चर्चा में है। इस विधेयक का उद्देश्य आइपीएस अधिकारियों की केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) में प्रतिनियुक्ति पर तैनाती का नियमितीकरण करना है। इसमें यह प्रविधान है कि पुलिस महानिरीक्षक स्तर के 50 प्रतिशत पद आइपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे। इसी प्रकार अतिरिक्त महानिदेशक स्तर के न्यूनतम 67 प्रतिशत पद आइपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे। जहां तक विशेष महानिदेशक एवं महानिदेशक के पदों का प्रश्न है, समस्त अर्थात सौ प्रतिशत पद आइपीएस अधिकारियों के लिए प्रतिनियुक्ति हेतु आरक्षित रहेंगे। चूंकि उप-महानिरीक्षक एवं कनिष्ठ स्तर के पदों के संबंध में विधेयक मौन है, इसलिए यही लगता है कि इन पदों के संबंध में नियम पूर्व अनुसार ही लागू रहेंगे। प्रस्तावित नियम पांच प्रकार के केंद्रीय बलों क्रमशः सीआरपीएफ, बीएसएफ, आइटीबीपी, सीआइएसएफ और सशस्त्र सीमा बल पर लागू होंगे। दशकों से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में आइपीएस अधिकारी तैनात रहकर अपना योगदान देते आ रहे हैं। केंद्रीय बलों की मुख्य भूमिका आंतरिक सुरक्षा, सीमा सुरक्षा और औद्योगिक सुरक्षा है। ये बल राज्य पुलिस बलों की सहायता के लिए तैनात किए जाते हैं। केंद्र और राज्यों के बलों में बेहतर समन्वय के लिए जरूरी है कि केंद्रीय बलों में आइपीएस अधिकारी तैनात रहें।

भारत में संघीय प्रणाली लागू है। संविधान के अनुच्छेद 312 के तहत अखिल भारतीय सेवाओं का प्रविधान इसी उद्देश्य से किया गया था ताकि केंद्र और राज्यों में वे अपनी जिम्मेदारियों का निष्पादन कर सकें। केंद्रीयं सशस्त्र बल माओवाद प्रभावित इलाकों, जम्मू और उत्तर-पूर्वी राज्यों में आतंकवाद से निपटने के लिए राज्यों की सहायता के लिए तैनात हैं। उक्त विधेयक को सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के संबंध में मई 2025 में दिए गए निर्णय के खिलाफ समझा जा रहा है। मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विसेज मानते हुए कुछ वित्तीय लाभ देने के आदेश दिए गए थे और केंद्रीय बलों के अधिकारियों की पदोन्नति के अवसरों को बढ़ाने के लिए पुलिस महानिरीक्षक स्तर तक प्रतिनियुक्ति को आगामी दो साल में धीरे-धीरे कम करने के लिए कहा गया था। सुप्रीम कोर्ट के इस. आदेश के आधार पर केंद्रीय बलों के सेवानिवृत्त अधिकारियों ने यह मांग रख दी कि उनकी सर्विसेज संगठित प्रकार की होने से प्रतिनियुक्ति को समाप्त किया जाए और उन्हीं के अधिकारी उनके बलों को नेतृत्व प्रदान करें। केंद्रीय बलों के कुछ अधिकारियों ने भी प्रतिनियुक्ति के खिलाफ मोर्चा सा खोल दिया। यह किसी भी अनुशासित कश्मीरबल को शोभा नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट ने 2025 के अपने आदेश में कहा था कि केंद्रीय बलों के काडर की समीक्षा की जाए और उनके भर्ती नियमों और सेवा शर्तों में आवश्यक बदलाव किया जाए। इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय बलों को एक संगठित ग्रुप मानते हुए यह नहीं कहा था कि आइपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति न की जाए। इसके बजाय सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि केंद्र एवं राज्यों में. बेहतर तालमेल के लिए आइपीएस अफसरों को प्रतिनियुक्ति पर इन बलों में तैनात करना एक नीतिगत निर्णय है, जो सरकार को लेना है। केंद्रीय बलों को आइपीएस अफसरों द्वारा नेतृत्व प्रदान करने और वरिष्ठ पदों पर तैनात होने पर न तो सुप्रीम कोर्ट ने कुछ कहा और न ही यह विवाद का मुद्दा था। इसलिए महानिदेशक सहित वरिष्ठपदों पर तैनाती के मुद्दे पर किसी बहस का प्रश्न नहीं उठता। वैसे भी राज्यों में आपरेशन संबंधी गतिविधियों के समन्वय के लिए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक या विशेष पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी तैनात रहते हैं। आइपीएस अधिकारी अति कठिन राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के माध्यम से सर्विस में दाखिल होते हैं। उनके विशिष्ट प्रशिक्षण और मैदानी अनुभव के कारण उनकी केंद्रीय सशस्त्र बलों में तैनाती एक उचित निर्णय है। अखिल भारतीय सेवाओं के जनक और स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा भारतीय पुलिस सेवा का गठन इस उद्देश्य से किया गया था, ताकि संघीय प्रणाली सुचारु रूप से चल सके। आइपीएस अफसरों ने बीते दशकों में सरदार पटेल के सपनों को साकार किया है। उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन अफसरों ने केंद्रीय बलों को सींचा है और उन्हें सक्षम नेतृत्व प्रदान किया है। जहां तक महानिरीक्षक स्तर तकप्रतिनियुक्ति को कम करने का प्रश्न है, यह सरकार का एक नीतिगत निर्णय है और सुप्रीम कोर्ट का इसमें दखल देना उचित प्रतीत नहीं होता। न्यायपालिका का क्षेत्राधिकार कानून की व्याख्या करना है, न की नीति बनाना या उसमें हस्तक्षेप करना, जब तक कि वह संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करे या वह मनमानी हो। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि कोर्ट को नीतिगत निर्णय में दखल देने की आवश्यकता नहीं है और न ही वह अपने को अपीलीय प्राधिकार के रूप में रख सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने ‘इंडियन एक्स-सर्विसमैन मूवमेंट बनाम यूनियन आफ इंडिया’ (2022) मामले में भारत सरकार की ‘वन रैंक-वन पेंशन’ सिद्धांत को नीतिगत निर्णय कहते हुए उसमें दखल देने से मना किया था। अतः केंद्र को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में आइपीएस अफसरों को प्रतिनियुक्ति पर आपरेशनल और फंक्शनल आवश्यकता के अनुसार तैनात करने का अधिकार एक नीतिगत निर्णय है।

संसद में केंद्रीय मंत्री द्वारा बताया गया कि केंद्रीय पुलिस बलों के अफसरों के पदोन्नति के चार अवसर लगभग सुनिश्चित हैं। इसके अलावा उनकी बड़ी संख्या में एक साथ भर्ती करने के बजाय प्रत्येक वर्ष भर्ती कर पदोन्नति के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। इस प्रकार केंद्र सरकार द्वारा उपरोक्त विधेयक द्वारा आइपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के संबंध में समस्त पुराने विवादों को समाप्त करने के उद्देश्य से यह एक स्वागत योग्य कदम है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।