वर्तमान समय में कूटनीति का महत्वपूर्ण यंत्र बनती एआई      Publish Date : 29/04/2026

वर्तमान समय में कूटनीति का महत्वपूर्ण यंत्र बनती एआई

                                                                                    प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं इं0 कार्तिकेय

हाल ही में नई दिल्ली में ‘एआई इम्पैक्ट समिट’की शुरुआत हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया। यह कितना बड़ा आयोजन है, इसका अंदाजा इसी से बात से लगाया जा सकता है कि तकरीबन 20 देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष इसमें शिरकत कर रहे हैं। कई टेक कंपनियों के सीईओ व हजारों एआई कंपनियों के प्रतिनिधि भी इसमें अपनी भागीदारी निभा रहे हैं। 20 फरवरी तक चलने वाले इस आयोजन में एआई के समावेशी उपयोग और उसके प्रभाव को व्यापक बनाने पर विस्तार से चर्चाएं की जाएंगी।

एआई का, विशेषकर चार-पांच वर्षों में हमारे जीवन पर कितना प्रभाव पड़ा है, यह प्रधानमंत्री मोदी के ट्वीट से जाहिर हो जाता है।

सोमवार को ‘एक्स’ पर उन्होंने लिखा, मानव-केंद्रित विकास में एआई के इस्तेमाल को लेकर भारत खासा प्रतिबद्ध है। निस्संदेह, यह ऐसी तकनीक है, जो विश्व और हमारे समाज के स्वरूप को बदलने में सक्षम है। यहां तक कि हमारी रोजाना की जिंदगी पर भी यह काफी असर डालने वाली है। ऐसे में, स्वाभाविक ही तमाम देश एआई को प्राथमिकता देने लगे हैं। अगर एआई की दौड़ में वे पीछे छूट गए, तो उनको खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। नतीजतन, कूटनीति में एक अहम औजार के तौर पर एआई इस्तेमाल होने लगी है। एआई सम्मेलन में (पिछले सम्मेलनों में भी) इतने बड़े पैमाने पर वैश्विक नेताओं की भागीदारी से इसकी तस्दीक भी होती है।

                            

पहले के समय में कूटनीतिक मुलाकातें होती थीं। राष्ट्राध्यक्ष एक-दूसरे से मिलते थे और अपने-अपने हित साधा करते थे। बाद में, ‘आर्थिक कूटनीति’ का दौर आया, फिर ऊर्जा, कोविड-19 के बाद ‘हेल्थ’, और अब एआई कूटनीति का जमाना है। इस तरह, बीते वर्षों में कूटनीति के हमने कई खंड देखे हैं, जो में एक-दूसरे से जुड़े हुए भी हैं। नई दिल्ली में आयोजित एआई सम्मेलन इसी की अगली कड़ी है, जिससे संकेत मिलता है कि कूटनीति में एआई का प्रभाव और बढ़ने वाला है। इस बार के सम्मेलन की थीम ‘पीपुल, प्लैनेट और प्रोग्रेस’ निर्धारित की गई है। संभवतः यह प्रधानमंत्री मोदी के विजन के अनुरूप ही है, जो एआई को इस कदर व्यापक बनाने की बात कहते रहे हैं कि समाज के हाशिये पर खड़ा व्यक्ति भी इससे लाभान्वित हो सके।

एआई सम्मेलन के के माध्यम से भारत को एआई में ‘वैश्विक प्रतिभा’ के रूप में पेश किया जा रहा है। यह बताने की कोशिश हो रही है कि हमारा देश एआई के हर पहलू को स्वीकार करता है और सच्चाई भी यही है। अभी कुछ ही देश हैं, जो एआई में अग्रणी हैं। हमसे उन्नत एआई सिर्फ अमेरिका और चीन के पास है। कुछ यूरोपीय देश, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन आदि भी इसमें अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। इसीलिए, वैश्विक कूटनीतिक मंच इन्हीं देशों के आसपास सजने लगा है। तमाम सरकारें यह आपस में समझने लगी हैं कि आने वाला समय एआई या नई तकनीक का है, इसीलिए वैश्विक नेतृत्व के रूप में खुद को स्थापित करने के लिए वे उन मुल्कों के साथ रिश्ते जोड़ने लगी हैं, जो नई तकनीक के धनी हैं।

कूटनीतिक दुनिया, एआई के विभिन्न आयामों से जुड़ी हुई है। इन आयामों में से पहला है, कंप्यूटर पावर, जिसका अर्थ है, गणना करने के लिए अच्छी क्षमता वाली चिप का होना। चिप में श्रेष्ठता हासिल करने के लिए ही अमेरिका और चीन एक-दूसरे के सामने डटे हुए हैं। दूसरा है, डाटा का उचित इस्तेमाल। दरअसल, एआई उपकरण डाटा से ही सीखते हैं। वे पैटर्न देखते हैं और वहीं से आइडिया लेते हैं। चूंकि, भारत एक बहुत बड़ी आबादी वाला देश है, इसलिए डाटा के मामले में हम दुनिया के सिरमौर हैं। हमारी सरकार इसे समझ रही है कि नई तकनीक को हमारी कितनी जरूरत है? इसीलिए, हमारे यहां ‘लॉर्ज लैंग्वेज मॉडल’ पर भी शोध काफी संख्या में बढ़ चुके हैं।

                              

इसका तीसरा पहलू एआई के इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ा है, यानी हमें डाटा सेंटर, प्रतिभा विकास, अनुसंधान एवं विकास तंत्र, अकादमिक रिसर्च व उद्योग के आपसी संबंध और शिक्षा पर बहुत अधिक ध्यान देना होगा। भारत में लगभग 1.8 लाख स्टार्टअप हैं और साल 2024 में लॉन्च हुए लगभग 89 प्रतिशत नए स्टार्टअप ने अपने उत्पादों या सेवाओं में एआई का काफी उपयोग किया है। यह सुखद है कि एआई का पूरा ‘स्टैक’ हमारे यहां बनाया गया है, ताकि हर पहलू में निवेश हो, शोध होते रहे। ‘इंडिया ए आई मिशन‘ तो चल ही रहा है। चूंकि भारत की विदेश नीति का आयाम व्यापक है, इसलिए एआई में जो उपलब्धि नई दिल्ली के खाते में आएगी, वह निःस्वार्थ भाव से बांटा जाएगा, ठीक उसी तरह, जैसे कोरोना के समय हमने टीके बांटे गए थे। एआई का लाभ इस तरह साझा करने से कूटनीतिक मंचों पर भारत का कद और ऊंचा उठ सकता है।

इस सम्मेलन के माध्यम से भारत स्वयं को उभरती एआई वैश्विक शक्ति के रूप में पेश करने में सफल हुआ है। फिर, इससे उद्योग, शिक्षा, कृषि जैसे तमाम क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ने का रास्ते भी खुलेंगे, जिससे हमें अपने कूटनीतिक हित पूरा करने में मदद मिल सकेगी। इसका तीसरा और महत्वपूर्ण लाभ रोजगार-सृजन से जुड़ा है। बेशक कुछ लोगों को डर है कि एआई के विस्तार से नौकरियां जा सकती हैं, लेकिन इससे नए क्षेत्रों में कामकाज बढ़ भी सकता है। चूंकि, प्रतिभा के मामले में हमारा कोई सानी नहीं है, इसलिए हम अपने ‘टैलेंट पूल’ का इस्तेमाल बखूबी कर सकेंगे और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत आने के लिए बाध्य किया जा सकेगा। ऐसी कई कंपनियां तो हमारे यहां आ भी चुकी हैं। इस तरह, भारत की कूटनीति व एआई टैलेंट पूल आपस में घुलते-मिलते दिखाई दे रहे हैं।

एआई की बड़ी-बड़ी मशीनों के लिए ऊर्जा की खूब जरूरत पड़ेगी। आजकल जब कार्बन उत्सर्जन को लेकर चिंताएं व्यापक हैं, तो जाहिर है कि कूटनीतिक रिश्ते एआई और ऊर्जा के अंतर्निहित संबंधों से भी तय होंगे। इस तरह देखें, तो एआई सम्मेलन वह आधार बनाने का काम करेगा, जिसकी बुनियाद पर हम अपनी ऊर्जा जरूरतों को बखूबी पूरा कर सकेंगे। हालांकि, कुछ मोर्चों पर हमें अभी भी बहुत तेजी से काम करना होगा। अभी तक भारत पास वैसी उन्नत चिप उपलब्ध नहीं हैं, जैसी अमेरिका के पास उपलब्ध हैं। हमारे पास अभी 30 हजार जीपीयू (ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट) हैं, जबकि चीन और अमेरिका के पास यह लाखों की संख्या में उपलब्ध हैं। इसी तरह, लॉर्ज लैंग्वेज मॉडल. बनाने में भी हमें अपने खर्च बढ़ाने चाहिए।

ऐसे में जाहिर है, एआई अब कूटनीतिक रिश्तों को नया रूप देने लगी है। आने वाले समय में यह काफी अहम कूटनीतिक औजार साबित हो सकती है। इसीलिए, तमाम देश एआई में सर्वोच्चता हासिल करने के लिए खुद को तैयार करने लगे हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।