
अंगूर से बैटरी रीसाइकिलिंग Publish Date : 25/04/2026
अंगूर से बैटरी रीसाइकिलिंग
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं इं0 कार्तिकेय
वैज्ञानिकों ने बैटरी रीसाइकिलिंग के लिए इलेक्ट्रोप्लेटिंग जैसी तकनीक विकसित की है। इसके जरिये अंगूर में पाए जाने वाले टारटरिक अम्ल का उपयोग कर धातुओं को अलग किया जा सकता है।
आधुनिक तकनीकों जैसे स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और जेट इंजन के तेजी से बढ़ते उपयोग ने उच्च-प्रदर्शन सामग्रियों और बैटरियों की मांग को काफी बढ़ा दिया है। इन तकनीकों में कोबाल्ट और निकेल जैसी धातुएं मुख्य भूमिका निभाती हैं, लेकिन इनकी बढ़ती खपत के साथ एक गंभीर चुनौती भी सामने आई है- पुरानी बैटरियों और औद्योगिक कचरे से इन धातुओं का प्रभावी पुनर्चक्रण।
दरअसल, कोबाल्ट और निकेल रासायनिक रूप से समान होते हैं, जिससे इन्हें अलग करना जटिल और महंगा बन जाता है। अब वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक पर्यावरण-अनुकूल तरीका खोजा है। अमेरिका की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में हुए एक शोध में पाया गया कि अंगूर में पाया जाने वाला प्राकृतिक टारटरिक अम्ल धातुओं के पृथक्करण को सरल बना सकता है। यह खोज बैटरी रीसाइकिलिंग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।

जटिल प्रक्रिया: वर्तमान में कोबाल्ट और निकेल का उपयोग लिथियम-आयन बैटरियों, सुपरएलॉय और औद्योगिक उत्प्रेरकों में बड़े पैमाने पर होता है। बढ़ती मांग के चलते भविष्य में इनकी कमी और कीमतों में वृद्धि की आशंका है। ऐसे में इन धातुओं का पुनर्चक्रण बहुत जरूरी हो जाता है। हालांकि मौजूदा तकनीकें महंगी हैं, कठोर रसायनों पर निर्भर हैं और कई जटिल चरणों से गुजरती हैं।
इलेक्ट्रोविनिंग तकनीक: नए शोध में वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रोविनिंग तकनीक का उपयोग किया। इस प्रक्रिया में बिजली की मदद से तरल घोल से धातुओं को अलग कर किसी सतह पर जमा किया जाता है। यह प्रक्रिया धातु चढ़ाने (इलेक्ट्रोप्लेटिंग) के जैसी होती है, लेकिन समस्या यह थी कि कोबाल्ट और निकेल दोनों ही बिजली के प्रति लगभग समान व्यवहार करते हैं, जिससे वे एक साथ जमा हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें अलग करना कठिन हो जाता है।
टारटरिक अम्ल कारगर: इस समस्या के समाधान के लिए शोधकर्ताओं ने विभिन्न जैविक अम्लों का परीक्षण किया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कौन-सा अम्ल धातु आयनों के साथ अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है। कुल 13 अम्लों के परीक्षण के बाद यह स्पष्ट हुआ कि टारटरिक अम्ल निकेल आयनों के साथ अधिक मजबूत बंधन बनाता है। परिणामस्वरूप, निकेल घोल में ही बना रहता है, जबकि कोबाल्ट पहले अलग होकर सतह पर जमा हो जाता है।

इस क्रमिक प्रक्रिया से दोनों धातुओं को प्रभावी ढंग से अलग किया जा सकता है। शोध की पुष्टि के लिए कंप्यूटर सिमुलेशन भी किए गए, जिनसे यह साबित हुआ कि टारटरिक अम्ल वास्तव में निकेल के साथ अधिक स्थिर संयोजन बनाता है। प्रारंभिक छोटे पैमाने के परीक्षणों में वैज्ञानिकों ने 99.1 प्रतिशत कोबाल्ट सफलतापूर्वक निकाल लिया। बाद में जब इस तकनीक को बड़े और निरंतर प्रवाह वाले सिस्टम में लागू किया गया, तब भी परिणाम प्रभावशाली रहे।
पर्यावरण अनुकूल: वैज्ञानिकों का मानना है कि यह विधि बैटरी रिसाइकिलिंग को सस्ता, कुशल और पर्यावरण के अनुकूल बना सकती है। साथ ही, यह तकनीक अन्य महत्वपूर्ण धातुओं को अलग करने में भी उपयोगी हो सकती है। अभी इस पर शोध जारी है। यदि यह औद्योगिक स्तर पर सफल होती है, तो यह वैश्विक संसाधन प्रबंधन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
