
जंगल में चिम्पैजियों के बीच छिड़ा खूनी गृहयुद्व Publish Date : 20/04/2026
जंगल में चिम्पैजियों के बीच छिड़ा खूनी गृहयुद्व
- युगांडा में न्गोगो चिम्पैजियों ने अपने ही साथियों का वध किया
- न्गोगो चिम्पैंजी के कुनबे में थे 200 से अधिक योद्वा
- चिम्पैजियों के बीच जारी इस संघर्ष में 14 चिम्पैजी हुए लापता, और लगता है कि यह सभी योद्वा इनके बीच चल रहे इस गृहयुद्व की भेंट चढ़ चुके हैं।
यह कथा जंगल में छिड़े उस गृहयुद्व के सम्बन्ध में है, जिसने वैज्ञानिकों को भी हैरत में डाल दिया है। युगांडा के किबाले नेशनल पार्क में ‘न्गोगो’ नाम के चिम्पैजियों का एक ऐसा साम्राज्य हुआ करता था, जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती र्थी इसके बाद न जाने ऐसा क्या हुआ कि सदियों पुराने यह दोस्त एक दूसरे के खून के प्यासे बन गए।

न्गोगो चिम्पैंजी कोई साधारण वानर नहीं थे, यह चिम्पैजियों का सबसे बड़ा और शक्तिशाली कुनबा हुआ करता था, जिसमें 200 से अधिक योद्वा थे। दशकों तक इन सभी चिम्पैजियों नें एक साथ ही शिकार किया। इसमें इन सभी का एक साथ भोजन करना और अपनी सरहदों की रक्षा करना शामिल हुआ करता था, परन्तु वर्ष 2015 के आते-आते कुछ ऐसा हुआ कि इस संयुक्त परिवार में एकता की नींव दरकने लगी।
वह थी एक मनहूस सुबहः स्तनधारी प्राणियों का अध्ययन करने वाले (प्रादमेटोलॉजिस्ट) आरोन सैंडल जंगल में चिम्पैजियों के व्यवहार का बारीकी से अध्ययन कर रहे थे। इस दौरान अचानक उन्होंने देखा कि पश्चिमी गुट के चिम्पैंजी अपने ही भाईयों अर्थात मध्य गुट के चिम्पैजियों की आवाज को सुनकर दुबकने लगे। यह इन चिम्पैजियों के वही साथी थे, जिनके साथ वह अभी तक मिलकर खेल खेला करते थे। इसके बाद शांति से भागने की यह कोशिश शीघ्र ही यह पीछा करने वाली एक खूनी जंग में बदल गई।
इससे आगे आने वाले कुछ वर्षों में जो कुछ हुआ, उसे तो पूरे जंगल को ही लाल कर दिया, क्योंकि इनके ही पुराने दोस्तों के द्वारा इन्हें बहुत ही बेरहमी से मार दिया गया। संघर्ष की इस खूनी जंग में शिशुओं को भी नहीं बख्शा गया था। इस प्रकार से इस खूनी खेल में लगभग 14 चिम्पैंजी लापता हो चुके हैं और माना जा रहा है कि यह सभी लापता चिम्पैंजी भी इस गृहयुद्व की भेंट चढ़ चुके हैं।

कैसे टूटा यह शक्तिशाली कुनबाः वैज्ञानिकों का मानना है कि चिम्पैजियों में ऐसी विनाशकारी दरार प्रति 500 वर्ष में एक बार ही आती है। असल में इनका यह कुनबा इतना अधिक बड़ा हो चुका था कि इनके बीच की सामाजिक दूरी बिलकुल समाप्तप्राय: हो गई थी। समय के साथ ही कुछ ऐसे समझदार चिम्पैंजी भी मर गए, जो कि इन दोनों ही गुटों को आपस में जोड़कर रखते थे और उनके जाते ही इनको आपस में जोड़ने वाला यह पुल भी ध्वस्त हो गया। अल्फा नरों की आपसी लड़ाई ने इस युद्व के लिए आग में घी डालने वाला काम किया।
“आरोन सैंडल कहते हैं कि इस लडाई को केवल बन्दरों की आपसी लड़ाई कहकर ही नहीं टाला जा सकता, बल्कि यह मानवीय समुदाय के लिए भी एक चेतावनी है। अक्सर सुनने में तो यही आता है कि युद्व धर्म और भाषा के कारण ही अधिक होते हैं, जबकि असलियत यह है कि कोई भी युद्व उस समय होता है, जब हम आपस एक-दूसरे के साथ दोस्ती करना छोड़ देते हैं”।
वैज्ञानिकों ने यह भी देखा कि अपने ही पुरान साथियों को मारने के बाद, हमलावर चिम्पैंजी अक्सर चीखते और चिल्लाते हैं और किसी ड्रम की तरह से ही पेड़ों को भी पीटते हैं। इस कृत को शक्ति का प्रदर्शन कहा जाता है। यह कितना दुखद है कि कभी जिन साथियों की वह देखभाल किया करते थे, आज उनकी ही मौत पर वह शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं।
