एआई पर असली नियंत्रण किसका      Publish Date : 17/04/2026

          एआई पर असली नियंत्रण किसका

                                                                                       प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, एवं इं0 कार्तिकेय

चुनौती एआई के जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग की है, पर उससे बड़ी समस्या यह है कि इसके लिए किसी के पास कोई योजना नहीं है।

मान लीजिए, यदि आपको कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से जुड़ी किसी भयानक तबाही में मरना ही पड़े, तो क्या आपको यह सोचकर ज्यादा बुरा लगेगा कि विनाश की राह उन तकनीकी दिग्गजों के घमंड ने आसान बनाई, जो सिलिकॉन वैली में बैठकर आदर्शलोक और अमरता के सपने देख रहे थे, या पेंटागन के अधिकारियों को मूर्खता ने, जो रूस व चीन से आगे निकलने की होड़ में एआई को आजादी और ताकत की खुराक देते हैं?

शीतयुद्ध के दौर में अमेरिका की चिंता सैन्य गलतियों को लेकर रहती थी। उस समय भी एआई को लेकर लोगों में डर और शंकाएं मौजूद थीं- फिल्म डॉ. स्ट्रजलय में ’इम्सडे मशीन’, थॉरगेम्स में खेल खेलने वाला कंप्यूटर और टर्मिनेटर में स्काईनेट को चालू करने का खतरनाक फैसला इसके उदाहरण हैं। पर पिछले कुछ वर्षों में जैसे-जैसे एआई की प्रगति हुई है, कुछ चुनिंदा कंपनियों और उनके मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीईओ) के हाथों में बहुत ज्यादा ताकत आ गई है, जो साईस-फिक्शन सपनों और दुनिया के खत्म होने की डरावनी संस्कृति में हुये हुए हैं।

                                 

राष्ट्रपतियों और सेनाध्यक्षों के बजाय एआई दिग्गजों को उनके समय और महत्वकाँक्षा के बारे में चिंता करना अब आम बात हो गई है। हाल ही में अमेरिकी रक्षा विभाग और अग्रणी एआई कंपनी एंथ्रोपिक के बीच टकराव ने इस बहस को और तेज कर दिया है। सवाल यह है कि क्या एंथ्रॉपिक के एआई मॉडल कंपनी के नैतिक दायरों में ही काम करेंगे, या फिर उन्हें पेंटागन को जरूरतों के अनुसार किसी भी उद्दे श्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।

एंथ्रोपिक के मौजूदा समझौते में दो तरह के उपयोगों पर साफ रोक है। पहला, बड़े पैमाने पर निगरानी के लिए एआई का इस्तेमाल। दूसरा, पूरी तरह स्वायत्त हथियारों के रुप में एआई का उपयोग, जहां अंतिम निर्णय प्रक्रिया में किसी इन्सान की भूमिका न हो। इसलिए, पेंटागन की मांगें कुछ लोगों को उन काल्पनिक कहानियों की याद दिलाती हैं, जिनमें मशीने खुद फैसले लेने लगती हैं। हालांकि, पेंटागन का कहना है कि उसका उद्‌द्देश्य हत्यारे रोबोट बनाना नहीं है। उसकी चिंता यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली तकनीक पर किसी निजी कंपनी का उद्देश्य नैतिक होना चाहिए, भले ही वे कितने ही उथित क्यों न लगे।

सरकार का तर्क है कि ऐसे फैसले चुनी हुई राजनीतिक व्यवस्था और उसके अधिकारियों को लेने चाहिए, न कि किसी कंपनी को। उदाहरण के तौर पर, पेंटागन ने यह आशंका जताई है कि अगर अमेरिका पर किसी हाइपरसोनिक मिसाइल से हमला हो जाए और एआई कंपनी यह कहकर मदद से इन्कार कर दे कि यह उसकी नैतिक नीतियों के खिलाफ है, तो इससे गंभीर संकट पैदा हो सकता है।

                                

फिर भी, यदि यह चिंता कुछ हद तक जायज भी है, तो इसका मतलब यह नहीं कि सरकार को एंथ्रोपिक के खिलाफ कठोर कदम उठाने चाहिए। कंपनी की ’सप्रसाई चैन रिस्क’घोषित करने जैसी कार्रवाई से उसका संबंध उन तमाम कंपनियों से भी टूट सकता है, जो कि अमेरिकी सरकार के साथ काम करती हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी सरकार दुनिया की सबसे आक्रामक एआई नियामक बन सकती है। इसी मजह से एआई उद्योग के लोगों का मानना है कि कंपनियों को एंथोपिक के साथ खड़ा होना चाहिए।

खासकर ये लोग, जो इस बात से डरते है कि सैन्य नियंत्रण एआई के विकास को खतरनाक दिशा कई में तेजी से आगे बढ़ा सकता है। हालांकि, एंथ्रोपिक के प्रमुख डारियों अमीदेई जैसे लोग एआई के संभावित खतरों को लेकर काफी सतर्क दिखाई देते हैं। वे सैन्य या अनियंत्रित एआई से पैदा होने वाले जोखिमों को समझते हैं। पर कुछ लोग यह भी मानते हैं कि लंबी अवधि में पेंटागन के अधिकारी एआई पर नियंत्रण के मामले में युद्व लाभ प्रदान कर सकते हैं।

पहला, उनका ध्यान सामान्यतः व्यावहारिक रणनीतिक लक्ष्यों पर होता है, न कि मशीनों के देवता चनने जैसे विचारों पर।

दूसरा, वे नौकरशाही व्यवस्था और आदेशों की श्रृंखला से बंधे होते हैं, जिससे ये जोखिम उठाने से बचते हैं।

तीसरा, में अंततः जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। अगर एआई बास्तव में उतनी बड़ी शक्ति जन जाती है, जितना तकनीकी विशेषज्ञ मानते हैं, तो यह कल्पना करना कठिन है कि इतनी महत्वपूर्ण तकनीक सिर्फ निजी कंपनियों के हाथों में ही रहे और सरकार उससे दूर रहे।

आने वाले समय में यह सवाल लगातार उठेगा कि एआई पर अंतिम नियंत्रण किसका होना चाहिए? दरअसल, वर्तमान टकराव इसी मूल राजनीतिक प्रश्न को सामने ला रहा है। पर केवल नियंत्रण की इच्छा ही पर्याप्त नहीं होती। असली चुनौती यह है कि इस तकनीक को सुरक्षित और जिम्मेदार तरीके से कैसे संचालित किया जाए। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इसके लिए कोई ठोस और दूरदर्शी योजना है या नहीं।

सोरा 2

यह एक उन्नत एआई-आधारित टेक्स्ट-टू-वीडियो मॉडल है, जिसे ओपनाए आई में विकसित किया है। इसमें टेक्स्ट विचरण (प्रॉम्प्ट) या चित्रों के आधार पर यथार्थवादी बीडियो तैयार करने की क्षमता है। यह मॉडल भौतिकी के नियमों- जैसे प्रकाश, गति और वस्तुओं की पारस्परिक क्रिया, आदि को ध्यान में रखते हुए दृश्य उत्पन्न करने का प्रयास करता है। जहां अन्य टूल्स तीन से 10 सेकंड के वीडियो बनाते हैं, वहीं सोरा 60 सेकंड तक के बीडियो बनाने में सक्षम है। यह एक ही वीडियो में विभिन्न कैमरा एंगल्स बना सकता है, जिसे देखकर ऐसा लगता है, जैसे वीडियो को बेहतरीन अंदाज में पेशेवर रूप से शूट और एडिट किया गया हो।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।