
हरित खाद वाली फसलों की उपयोगिता Publish Date : 17/01/2026
हरित खाद वाली फसलों की उपयोगिता
प्रोफेसर आर एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
प्रमुख हरी खाद फसलें, बुवाई का समय, उनकी उत्पादन क्षमता तथा उनमें उपलब्ध जैविक पदार्थों की मात्राः
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फसल |
बुवाई का समय |
बीजदर (कि.ग्रा./हे.) |
हरे पदार्थ की मात्रा (टन/हे.) |
पोषक तत्वों की मात्रा (कि.ग्रा./हे. में) |
प्राप्त नाइट्रोजन (कि.ग्रा./हे.) |
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नत्रजन |
फास्फोरस |
पोटाश |
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ढँचा |
अप्रैल-मई |
70-80 |
20-25 |
90-120 |
12-12 |
8-10 |
80-100 |
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सनई |
अप्रैल-मई |
80-100 |
20-30 |
75-100 |
12-15 |
5-8 |
80-120 |
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लोबिया |
अप्रैल-जुलाई |
45-50 |
10-15 |
75-90 |
15-18 |
5-8 |
70-80 |
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ग्वार |
अप्रैल-जुलाई |
30-35 |
8-10 |
60-70 |
60-80 |
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मूंग |
जून-जुलाई |
20-25 |
8-10 |
40-50 |
18-20 |
5-10 |
40-50 |
हरी खाद की गुणवत्ता बढ़ाने के उपाय:

- उपयुक्त फसल का चयन: जलवायु एवं मृदा की दशा केअनुसार फसल का चयन करना आवश्यक है। जलमग्न तथा क्षारीय एवं लवणीय मृदाओं में ऊँचा तथा सामान्य मृदाओं में सनई व ढँचा दोनों फसलों से अच्छी हरी खाद प्राप्त की जा सकती है।
- समुचित उर्वरक प्रबन्धन: कम उर्वरता वाली मृदाओं में नत्रजन उर्वरकों का 15-20 कि.ग्रा. एवं फास्फोरस 40-50 कि.ग्रा./हे. प्रयोग कर अच्छी हरी खाद प्राप्त की जा सकती है।
- हरी खाद को खेत में पलटने का उपयुक्त समयः अधिक व गुणवत्तायुक्त हरी खाद प्राप्त करने के लिए फसल की पलटाई या जुताई, बुवाई के 40-50 दिन के भीतर कर देनी चाहिए इससे अधिक अवस्था पर पौधों की शाखाओं में रेशे की मात्रा बढ़ जाती है। इसके फलस्वरूप जैविक पदार्थों के अपघटन में अधिक समय लगता है।
- हरी खाद के प्रयोग के बाद अगली फसल की बुवाई या रोपाई का समय: हरी खाद को खेत में पलटने के 15-20 दिन बाद खेत में अगली फसल की बुवाई करनी चाहिए। जिन क्षेत्रों में धान की फसल बोई या रोपी जाती है, वहां जलवायु नम तथा तापमान अधिक होने से अपघटन क्रिया तेज होती है। अतः खेत में हरी खाद की फसल 40-45 दिन से अधिक की नहीं होनी चाहिए।
हरी खाद के रूप में ढैंचा
- ढैंचा जल जमाव वाले क्षेत्रों, लवणीय, ऊसर, एवं क्षारीय भूमि के लिए सर्वोत्तम हरी खाद है। एक बार उगने के बाद सूखा को भी लम्बे समय तक सहन करने की इसमें क्षमता है।
- ऊसर भूमि में ढैंचा को 4-5 साल लगातार लगाया जाए तो सारा लवण घुलकर मिट्टी के नीचे चले जाते है और वह मिट्टी फसल लगाने योग्य हो जाती है।
- अन्य हरी खाद की तुलना में ढैंचा की फसल अधिक कार्बनिक अम्ल पैदा करती है, जिसके कारण ऊसर,लवणीय एवं क्षारीय भूमि को सुधार कर उपजाऊ बनाती है।
- धान की खेती से पहले ढैंचा की हरी खाद के रूप में प्रयोग अति उत्तम पाया गया है।
- ढैंचा बुआई की 55 दिनों के बाद अच्छी बढ़वार होने पर लगभग 25-30 टन हरी खाद प्रति हेक्टेयर पैदा करती है, जो अन्य हरी खादों से बहुत अधिक है।
- गेहूँ की कटाई के तुरंत बाद खेत की जुताई कर ढैंचा की बुवाई की जाती है।
- बुवाई मई के पहले पखवाड़े में कर लेनी चाहिए, जिससे इसे जून के अंत तक जमींन में मिलाने के बाद धान की रोपाई की जा सके।
- ढैंचा को जमीन में मिलाने के बाद पर्याप्त पानी मिलने पर यह लगभग 15 दिनों में सड़ जाता है और खेत रोपाई केलिए तैयार हो जाता है।
हरी खाद को मिट्टी में मिलाने की विधिः हरी खाद की फसल को मिटटी पलट हल या रोटावेटर की सहायता से मिटटी में काटकर मिला देना चाहिए।
मिट्टी में हरी खाद पलटने का समय
- हरी खाद का इस्तेमाल तभी सफल हो पाता है जब उसे सही समय पर मिट्टी में पलटा जाए एवं उसके बाद भूमि में लगने वाली फसल की बुवाई एवं हरी खाद की पलटाई के बीच का अंतर पर्याप्त हो। फसल को सही समय पर मिटटी में मिलाना चाहिए जिससे अगली फसल की बुवाई के पहले हरी खाद पूरी तरह अपघटित हो जाए।
- मिट्टी में पलटने के बाद उसके अपघटन के लिए पर्याप्त समय देने की जरूरत है। यह समय फसलों के प्रकार एवं सस्य कियाओं के अनुसार बदलता है।
मिट्टी में पलटने की दशा
- दलहनी फसलों की जड़ों में जब ग्रंथियों का निर्माण पूर्णरूपेण हो जाता है, इस दशा में फसल को पलट कर मिट्टी में मिला देना चाहिए।
- उड़द तथा मूँग में फलियों की तुड़ाई के पश्चात् फसलों की जुताई कर मिट्टी में मिलाया जा सकता है वैसे सामान्यतः 40 से 50 दिनों की अवस्था हो जाने पर मिट्टी पलट हल से मिट्टी में मिलाकर खेत को पानी से भर देना चाहिए।
- अधिक दिनों की फसल हो जाने पर इसका रेशा कड़ा हो जाने से इनके अपघटन की क्रिया सुचारू रूप से नहीं हो पाती। इसलिए जब रेशा मुलायम हो, उसी अवस्था में फसल की जुताई कर पलटना उचित रहता है।
- बहुत छोटी अवस्था में भी फसल को मिटटी में नही मिलाना चाहिए। इससे पर्याप्त कार्बनिक पदार्थ नही मिलता, साथ ही साथ पोषक तत्व भी अगली फसल को प्राप्त नही होते।
- फसल को मिट्टी में पलटने के पश्चात् उसमें चाहे तो धान की रोपाई भी की जा सकती है। ऐसे करने से खेत में अलग से पानी भरने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। हमें ऐसा करने से दोहरा लाभ भी मिल जाता है तथा जब धान में नत्रजन की पूर्ति करने हेतु यूरिया का छिड़काव किया जा सकता है, उस क्रिया से हरी खाद की फसल के अपघटन में सहयोग मिलता है।
इस प्रकार हरी खाद वर्तमान समय में एक संजीवनी से कम नहीं है जिसको उगाने के लिए बहुत अधिक श्रम नही लगता तथा फसलोत्पादन को बढाया जा सकता है। साथ ही साथ भूमि की उर्वरा शक्ति में भी सुधार होता है तथा कृषि में अधिक मुनाफा होता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
