
आवश्यक है फसलों की पाले से सुरक्षा Publish Date : 10/01/2026
आवश्यक है फसलों की पाले से सुरक्षा
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
हमारे देशके मध्य एवं उत्तरी भाग में, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के कुछ न कुछ भाग में हर साल पाले से फसल खराब होती है। दिसम्बर-जनवरी में पाले की अधिक सम्भावना रहती है। जब दिन में खूब हवा चले, खूब ठण्ड हो, रात्रि को हवा अचानक बन्द हो जाय और तापक्रम हिमांक तक पहुंच जाय तो पाले की प्रबल सम्भावना होती है।
कभी-कभी जब हवा में बहुत अधिक नमी होती है तो शाम के समय या रात्रि को भूमि से कुछ ऊंचाई तक जल की वाष्प छोटी छोटी बूंदों के रूप में जम जाती है और चारो ओर धुंधला कुहरा दिखायी देने लगता है। जाड़े के दिनों में कभी-कभी वायुमण्डल में जल की छोटी-छोटी बूंदें जम जाती है और बड़ा घना कुहरा पड़ता है। प्रायः सबेरे उठ्ने पर थोड़ी दूर को चीजें भी दिखायी नहीं देतीं। सूरज निकलने के बाद ये बूंदें गर्मीसे वाष्प बनकर उड़ जाती है और आकाश स्वच्छ हो जाता है।
दिन के समय तालाब, नदी, झील इत्यादि का पानी भाप बनकर उड़ता रहता है। इसमें हवा में पानी को भाप की मात्रा बढ़ जाती है। सूरज छिपने पर पृथ्वी की सतह से उष्मा का विकिरण होता है जिसके कारण उसका ताप गिरने लगता है और पृथ्वी के ऊपर की सब वस्तुएं ठण्डी होने लगती हैं, वायु भी क्रमशः ठण्डी होने लगती है और अन्त में इतनी अधिक ठण्डी हो जाती है कि वह सब नमी को अपने अन्दर नहीं रोक पाती। वह भाप जिसको हवा अपने अन्दर रोक नहीं पाती, पानी के कणों के रूप में बदल जाती है और घास-पात तथा अन्य वस्तुओं पर पड़ जाती है। पानी की इन बूंदों को ओस कहते हैं। स्वच्छ आकाश और शान्त वायुमण्डल होने पर ओस अधिक पड़ती है।

जाड़े के दिनों में कभी-कभी तापक्रम डिमांक के नीचे तक गिर जाता है। जब ऐसा होता है तो वायु की नमी ओस में न बदलकर बर्फ के छोटे-छोटे कणों में बदल जाती है और जम जाती है जिसे पाला या तुषार कहते हैं। इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि तापक्रम के अधिक कम हो जाने से पौधों की कोशिकाओं के बीच तथा बाहर जो रिक्त स्थान होते हैं उनमें बर्फ के कण बन जाते हैं अर्थात पानी बर्फ के रूप में जम जाता है। बर्फ बननेके कारण पानी का आयतन बढ़ जाता है, जिसके फलस्वरूप पौधों की कोशिकाओं की दीवालों पर दबाव बढ़ जाने से कोशिकाएं फट जाती हैं। इससे पौधों की आन्तरिक क्रियाएं बन्द हो जाती है एवं पौधे सूखकर मर जाते हैं।
हमारे देश के मध्य एवं उत्तरी भाग में, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के कुछ न कुछ भाग में हर साल पाले से फसल खराब होती है। दिसम्बर जनवरी में पाले की अधिक सम्भावना रहती है। जब दिन में खूब हवा चले, खूब ठण्ड हो, रात्रि को हवा बन्द हो जाय और तापक्रम हिमांक तक पहुंच जाय तो पाले की सम्भावना होती है।
कड़ाके की सदी के साथ-साथ आकाश में बादलों का न होना पाला पड़ने के लिए अनुकूल होता है। यदि आकाश में बादल घिरे रहते हैं तो पाले की सम्भावना नहीं होती है। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के माध्यम से समय-समय पर मौसम सम्बन्धी सूचनाएं दी जाती हैं तथा अपने अनुभव के आधार पर किसान भाई पाला पड़ने का पूर्वानुमान लगा सकते हैं।
आमतौर पर पाले से दाल वाली फसलों को अधिक एवं घास कुल की फसलों जैसे गेहूं, गन्ना को कम नुकसान होता है। चौड़ी पत्ती वाली सब्जियों की फसलें जैसे आलू, बैगन, टमाटर और सेम हत्यादि साधारण तथा कम तापक्रम से अधिक प्रभावशील होती है। फलदार वृक्षों पर कम प्रभाव होता है किन्तु नये टोपे गये पौधों पर अधिक नुकसान होता है। टमाटर, मटर, आलू बैगन, सेम, सरसों, मक्का, धान, कपास, गन्ना, सूरजमुखी, चना, अलसी, शकरकन्द, केला, पपीता, नीबू, अमरूद, सन्तरा आदिकी फसलें अधिक प्रभावित होती है।
कम तामक्रम के कारण पौधौँ में मौजूद इंजाइम की क्रियाएं रुक जाती हैं, जिससे भोजन बनाने की प्रकाश संश्लेषण क्रिया ठीक से नहीं हो पाती। पौधों को एनर्जी (शक्ति) देने वाले तत्व जिसे एटीपी कहते हैं, नहीं बन पाते। अतः पौधों की बढ़वार रुक जाती है। पौधों की कोशिकाओं में जो तरल पदार्थ होते हैं, वे ठोस कण में बदल जाते हैं। पौधों में रचनात्मक क्रियाओं के छिन्न-भिन्न हो जाने से विषाक्त पदार्थों की मात्रा बहुत बढ़ जाती है। पौधों में बढ़ाव को रोकने वाले पदार्थ की मात्रा बहुत बढ़ जाती है।
ऐसे क्षेत्रों में जहां प्रतिवर्ष पाला पड़ता है, वहां पर स्थायी उपाय अपनाना चाहिए जैसे फसल उत्पादनके लिए पाला रोधी जातियों का चयन करना। आलू के लिए कुफरी शीतमान तथा हंसा, सरसों के लिए आर.एच.-३० किस्म। ऐसे क्षेत्रों में खेत के चारो ओर ऊंचे एवं घने पेड़ों को लगाना चाहिए जो वायुरोधक का काम करते हैं, जैसे शीशम, बबूल, शहतूत आदि। ये पेड़ आसानी से लग जाते हैं एवं इससे स्थायी रूप से पाले से बचा जा सकता है। घाटी की अपेक्षा ऊपरी सतह पर पाले का असर कम होता है क्योंकि वहां पर वायु का संचार बना रहता है। इसी प्रकार झील, नहर नदी या तालाब के किनारे वाली भूमि पर पाले का असर कम पड़ता है क्योंकि पानी का तापमान सतह की वायु की अपेक्षा अधिक रहता है। अतः फसल का प्रबन्ध करते समय ये बातें ध्यान में रखनी चाहिए।

जिस रात पाला पड़ने की सम्भावना है तो उस दिन फसल में पानी लगा देना चाहिए यानि फसलों की अच्छी तरह सिंचाई कर देनी चाहिए। सिंचाई करने से आधा से २ डिग्री सेल्सियस खेत का तापमान बढ़ जाता है। नमी वाली भूमि में गर्मी काफी समय तक बनी रहती है जिससे भूमिका तापमान जल्दी गिर नहीं पाता है। रात में खेत की मेड़ों पर धुआं करके फसल को पाले से बचाया जा सकता है। आधी रात के बाद खेत की मेड़ों पर घास-फूस या कूड़ा-करकट जलाकर धुएं के माध्यम से फसल का तापमान ज्यादा बढ़ाया जा सकता है। इस कार्य के लिए भारतीय चारा अनुसंधान केन्द्र झांसी द्वारा विकसित एक व्यक्ति द्वारा हस्तचालित धुआं फेंकने वाली मशीन उपयोगी साबित हुई है।
छोटे क्षेत्रों जैसे गृहवाटिका या पौधशाला के चारो ओर घास-फूस की टट्टियां, बोरे, चटाई या पोलिथीन से पौधों को ढंककर भी पाले से बचाया जा सकता है। रसायनों का भी उपयोग किया जाता है, जैसे साइकोसिल एक किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से बनाया गया घोल फसल के ऊपर छिड़का जाता है। उदयपुर विश्वविद्यालयके वैज्ञानिकों द्वारा किसी भी फसल पर – 0.1 प्रतिशत गन्धक या तेजाब (एक लीटर गन्धक का तेजाब 1000 लीटर पानी में) फसल पर छिड़कने से लगभग 15 दिनों तक फसल पर पाले का प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार का छिड़काव रबी की फसलों, विशेषकर सरसों, गेहूं, चना, आलू तथा मटर जैसी फसलों के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसका छिड़काव करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
