
माइकोराइरजा और ट्राइकोडर्मा है फसल के लिए वरदान Publish Date : 07/01/2026
माइकोराइरजा और ट्राइकोडर्मा है फसल के लिए वरदान
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
खेती किसानी में वैसे तो कई प्रकार की खाद और उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है लेकिन यदि आप समय पर अपनी फसल में माइकोराइज़ा एवं ट्राइकोडर्मा का प्रयोग करते हैं तो इससे आपकी फसल की वृद्धि भी अच्छी होगी और उत्पादन भी अच्छा प्राप्त किया जा सकेगा। अभी हाल ही में कई प्रगतिशील किसानों द्वारा इसका उपयोग करके अपने उत्पादन को काफी बढ़ा लिया है। इसलिए आप भी अपनी खेती किसानी में माइकोराइज़ा और ट्राइकोडर्मा का उपयोग कर उत्पादन बढ़ा सकते हैं।
माइकोराइजा क्या है?
यह शब्द दो शब्दों से बना है: ‘माइको’ (Fungs) + ‘रहाइजा’ (Root)। यानी ष्फफूंद और जड़ की दोस्ती’।
वैज्ञानिक इसे “VAM” (Vesicular Aruscular Mycorrhia) कहते हैं।
यह काम कैसे करता है?

- पौधे की जड़ें बहुत दूर तक नहीं जा सकतीं उनकी पहुँच सीमित होती है।
- माइकोराइजा फफूंद के धागे बाल से भी बारीक होते हैं।
- ये धागे पौधे की जड़ों से जुड़ते हैं और मिट्टी में मीलों दूर तक फैल जाते हैं यह बिल्कुल एक ‘इंटरनेट नेटवर्क’ या ‘एक्सटेंशन वायर’ की तरह काम करता है।
माइकोराइजा के लाभः
- मिट्टी में फॉस्फोरस (P) चलता नहीं है। माइकोराइजा के धागे दूर-दूर से बारीक सुराखों से फॉस्फोरस खींचकर पौधे की जड़ को देते हैं। (यह पौधे का फॉस्फोरस अपटेक 50-60% तक बढ़ा सकता है)।
- पानी की कमी के समय जब जड़ें पानी तक नहीं पहुँच पातीं माइकोराइजा के धागे गहराई से पानी सोखकर पौधे को जिंदा रखते हैं।
जिंक और माइक्रोन्यूट्रिएंट्एंट्स:
- यह जिंक, कॉपर और अन्य तत्वों को भी उपलब्ध कराता है।
- माइकोराइजा उन खेतों के लिए वरदान है जहाँ पानी की कमी है या जहाँ किसान ने DAP डाल-डालकर ज़मीन पत्थर कर दी है।
- यह जड़ों के विकास (Root Development) का सबसे अच्छा टॉनिक है।
ट्राइकोडर्मा (Trichoderna):
मिट्टी का ‘बॉडीगार्ड’ अगर माइकोराइजा ‘इंजीनियर’ है तो ट्राइकोडर्मा ‘सिपाही या ‘डॉक्टर’ है। यह एक ऐसी फफूंद है जो दूसरी हानिकारक फफूंदों को खा जाती है।
यह काम कैसे करता है?
जैसे ही ट्राइकोडर्मा किसी दुश्मन फफूंद (जैसे Fusarium)- जो उकठा को फैलाता है या Pythium- जो जड़ सड़न/Red Rot करता है) को देखता है, यह उसके चारों तरफ कुंडली मार लेता है और उसका रस चूसकर उसे मार देता है।
यह बीज या जड़ के चारों तरफ अपनी एक परत बना लेता है, जिससे कोई बीमारी पास नहीं आ सकती।
उपयोग कैसे करें?
बीज उपचार (Seed Treatments):
5 से 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर प्रति किलो बीज में मिलाएं
यह बीज के साथ ही उगता है और जन्म से ही पौधे की रक्षा करता है।
मिट्टी उपचार (Soil Application) - सबसे असरदार:
1-2 किलो ट्राइकोडर्मा को 100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाएं इसे बोरी से ढककर छांव में 5-7 दिन के लिए रख दें। 7 दिन में फफूंद उस पूरे ढेर में फैल जाएगी (सफेद/हरा रंग दिखेगा) अब आपके पास 100 किलो शक्तिशाली बायो -फंगीसाइड तैयार है। इसे बुवाई से पहले खेत में बिखेर दें।
सावधानियाँ
केमिकल फंगीसाइड का दुश्मन:
ट्राइकोडर्मा और माइकोराइजा खुद एक फफूंद हैं।
अगर किसान ने खेत में ‘साफ’ (Carbendajim + Mancojeb) या कोई अन्य फंगीसाइड डाला है, तो वह बीमारी को मारने के साथ-साथ इन मित्रों को भी मार देगा। बायो -फफूंद डालने के 15 दिन पहले और 15 दिन बाद तक खेत में कोई रासायनिक फंगीसाइड ना डालें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
