
भारतवर्ष में रोजगार का आदर्श वितरण Publish Date : 03/12/2025
भारतवर्ष में रोजगार का आदर्श वितरण
डॉ वीरेन्द्र सिंह गहलान सस्यविद
परिचय
भारत की आत्मा उसके खेतों में बसती है, जहां लाखों किसान दिन-रात मेहनत करके देश का पेट भरते हैं। आधुनिक किसान केवल परंपरागत ज्ञान पर निर्भर नहीं है; वह सस्ते आदान (बीज, उर्वरक, कीटनाशक), फसलों के उचित मूल्य (न्यूनतम समर्थन मूल्य या MSP), मिट्टी की जांच, उर्वरकों का रासायनिक प्रोफाइल, दवाओं और बीजों की गुणवत्ता जांच, और बीज से प्लेट तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला में गुणवत्ता नियंत्रण की मांग करता है। इसके अलावा, खेतों में पोषक तत्वों (न्यूट्रिएंट्स) की बैलेंस शीट बनाए रखने के लिए फसल उत्पादन के हर स्तर पर सरकारी प्रयोगशालाओं की सक्रिय भागीदारी चाहिए।
न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) योजना के साथ-साथ भूमि में न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट न केवल किसानों के लिए, बल्कि उपभोक्ताओं के लिए भी लाभकारी है, क्योंकि यह मिट्टी की उर्वरता, फसल की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देता है। मगर सरकार इन मांगों को अनसुना करती आ रही है, और मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना जैसी पहलें भी असफल सिद्ध हो रही हैं। यह निबंध किसानों के दृष्टिकोण से उनकी जायज मांगों को सामाजिक, तकनीकी और वैज्ञानिक नजरिए से गहराई से विश्लेषित करता है, और 2025 की नीतियों की कमियों को उजागर करता है।
सामाजिक दृष्टिकोण
किसान भारत की समृद्वि की रीढ़ हैं, मगर सामाजिक रूप से वे उपेक्षा, आर्थिक तंगी और कर्ज के बोझ तले दबे हैं। खेतों में मेहनत करने वाला किसान ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातों से नहीं, बल्कि सस्ते बीज, उर्वरक और कीटनाशकों से अपनी आजीविका चलाना चाहता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जो उसका एक अधिकार है, जो उसे बाजार के शोषण से बचाए। 2025-26 में सरकार ने खरीफ फसलों के MSP में बढ़ोतरी की, जैसे धान के लिए ₹2,300 प्रति क्विंटल से अधिक, मगर यह पर्याप्त नहीं है।
किसान MSP को कानूनी गारंटी चाहते हैं, क्योंकि बिना इसके मंडियों में बिचौलियों का बोलबाला है। न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) योजना, जो 2025 में संशोधित हुई, उर्वरकों को सस्ता करने का वादा करती है, लेकिन भ्रष्टाचार और असमान वितरण के चलते छोटे किसानों, खासकर महिलाओं और दलित-आदिवासी किसानों तक इसका लाभ नहीं पहुंचता।
न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट का अभाव किसानों को अनुचित उर्वरक उपयोग के लिए मजबूर करता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता घटती है और उपभोक्ताओं को कम पौष्टिक भोजन मिलता है। यह सामाजिक अन्याय का एक रूप है, क्योंकि किसान और उपभोक्ता दोनों की सेहत और आजीविका दांव पर है। फसलों का उचित मूल्य न मिलने से किसान कर्ज में डूब रहे हैं, और आत्महत्याएं बढ़ रही हैं। सरकार की योजनाएं, जैसे किसान क्रेडिट कार्ड या ऋण माफी, जो 2025 के बजट में बढ़ी हैं, कागजी साबित हो रही हैं। किसान पूछता है: जब हम देश का पेट भरते हैं, तो सरकार हमारी और उपभोक्ताओं की चिंता क्यों नहीं करती?
तकनीकी दृष्टिकोण
किसान तकनीक का स्वागत करता है, मगर वह ऐसी तकनीक चाहता है जो उसकी जेब और जरूरतों के हिसाब से हो। मिट्टी की जांच, उर्वरकों का रासायनिक प्रोफाइल, और बीज-दवाओं की गुणवत्ता जांच जैसी सुविधाएं ग्रामीण भारत तक पहुंचनी चाहिए। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, जो मिट्टी के पोषक तत्वों की जानकारी देने का दावा करती थी, असफल रही है।
इस योजना के तहत मिट्टी की जांच तो हुई, लेकिन कार्ड्स का वितरण सीमित रहा, और किसानों को इसे लागू करने के लिए प्रशिक्षण या सहायता नहीं मिली। नतीजतन, किसान अब भी अनुमान के आधार पर उर्वरक डालते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता घट रही है। न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट को तकनीकी रूप से लागू करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, जैसे मोबाइल ऐप्स और ड्रोन-आधारित मॉनिटरिंग, आवश्यक हैं।
वर्ष 2025 में ड्रोन और सैटेलाइट इमेजिंग का उपयोग हो रहा है, मगर ग्रामीण इंटरनेट और प्रशिक्षण की कमी के चलते किसान इनसे वंचित हैं। बीजों की जांच के लिए सब मिशन ऑन सीड्स एंड प्लांटिंग मटेरियल (SMSP) जैसी योजनाएं हाइब्रिड बीजों पर सब्सिडी देती हैं, पर नकली बीजों का बाजार अब भी कायम है।
ब्लॉकचेन तकनीक से बीज से प्लेट तक आपूर्ति श्रृंखला की गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित हो सकती है, मगर सरकार की उदासीनता के चलते यह सपना अधूरा है। न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट को लागू करने के लिए डेटा-संचालित तकनीकें, जैसे मिट्टी के पोषक तत्वों का रियल-टाइम विश्लेषण, किसानों को सही उर्वरक उपयोग की सलाह दे सकती हैं, जिससे उपभोक्ताओं को पौष्टिक भोजन मिले। लेकिन सरकार की लापरवाही से यह तकनीक गांवों तक नहीं पहुंच पा रही।
किसान कहता है: हमें ऐसी तकनीक चाहिए जो हमारी मेहनत को फल दे और उपभोक्ताओं को बेहतर भोजन दे, न कि केवल शहरों की शोभा बढ़ाए।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किसान चाहता है कि उसकी मिट्टी और फसलें स्वस्थ रहें, और उपभोक्ताओं को पौष्टिक भोजन मिले। मिट्टी की जांच से पोषक तत्वों (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम) और सूक्ष्म पोषक तत्वों का पता चलता है, जो उर्वरकों के सही उपयोग में मदद करता है। लेकिन सबसे जरूरी है खेतों में न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट बनाए रखना, और इसके लिए सरकारी प्रयोगशालाओं का योगदान चाहिए। सॉइल टेस्टिंग लैब्स और मोबाइल सॉइल टेस्टिंग लैब्स (MSTLs) के तहत सॉइल हेल्थ मैनेजमेंट (SHM) योजना मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने का दावा करती है, मगर मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना की असफलता ने इन लैब्स की पहुंच और प्रभाव को भी सीमित कर दिया।
न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, जो मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी और अतिरिक्तता का हिसाब रखता है, जिससे किसान को सही मात्रा में उर्वरक उपयोग करने की सलाह मिलती है। यह न केवल मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता बनाए रखता है, बल्कि फसलों की पौष्टिकता बढ़ाकर उपभोक्ताओं की सेहत को भी लाभ पहुंचाता है। उदाहरण के लिए, सूक्ष्म पोषक तत्वों (जैसे जिंक, आयरन) की कमी से फसलों में पौष्टिकता कम होती है, जो उपभोक्ताओं में कुपोषण का कारण बनता है। NBS योजना, जो 2025 में संशोधित हुई, उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देती है, मगर इसकी जमीनी हकीकत कमजोर है।
नकली उर्वरकों और कीटनाशकों की बिक्री रोकने में सरकार नाकाम रही है, जिससे मिट्टी और फसलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। बीजों की जांच, जीएमओ टेस्टिंग, और कीटनाशक अवशेषों की जांच खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी है, लेकिन सरकारी प्रयोगशालाएं इनकी मांग पूरी नहीं कर पा रही हैं। बीज से प्लेट तक गुणवत्ता जांच में FSSAI मानक और ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन जैसे प्रोटोकॉल हैं, मगर ये जमीनी स्तर पर लागू नहीं हो पाते। 2025 के बजट में उर्वरक सब्सिडी ₹1.64 लाख करोड़ है, लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधान में निवेश की कमी और सरकारी प्रयोगशालाओं की निष्क्रियता से बायोटेक्नोलॉजी बीज और न्यूट्रिएंट प्रबंधन जैसी नवीन तकनीकें किसानों तक नहीं पहुंच रही।
जलवायु परिवर्तन के दौर में, वैज्ञानिक रूप से रेजिलिएंट फसलें विकसित करना जरूरी है, जो न्यूट्रिएंट बैलेंस के साथ किसानों की आय और उपभोक्ताओं की सेहत को सुरक्षित रखें। किसान पूछता है: जब हमारी मिट्टी और फसलें दम तोड़ रही हैं, और उपभोक्ता कुपोषण का शिकार हो रहे हैं, तो सरकार की वैज्ञानिक योजनाएं कहां हैं?
निष्कर्ष
किसान की पुकार साफ है: उसे सस्ते आदान, उचित मूल्य, और वैज्ञानिक जांच चाहिए, जो उसकी मेहनत को सम्मान दे और उपभोक्ताओं को पौष्टिक भोजन दे। न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट, NBS योजना के साथ मिलकर, मिट्टी की उर्वरता और खाद्य गुणवत्ता को सुनिश्चित कर सकती है, मगर सरकार की उदासीनता और मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी योजनाओं की असफलता ने किसानों का भरोसा तोड़ा है।
सरकार को चाहिए कि वह MSP को कानूनी गारंटी दे, डिजिटल और वैज्ञानिक सुविधाएं ग्रामीण स्तर तक पहुंचाए, सरकारी प्रयोगशालाओं को न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट के लिए सक्रिय करे, और नकली आदानों पर रोक लगाए। किसान कहता है: हम देश को खिलाते हैं, अब सरकार हमारी और उपभोक्ताओं की सुन ले, ताकि हमारी मेहनत रंग लाए, मिट्टी स्वस्थ रहे, और देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत हो।
लेखक: डॉ. वीरेन्द्र सिंह गहलान, सस्यविद, Ex. Chief Scientist, CSIR-IHBT, Palampur Himachal Pradesh.
