आर्थिक स्थिरता का एक शानदार उदाहरण है भारत      Publish Date : 09/11/2025

           आर्थिक स्थिरता का एक शानदार उदाहरण है भारत

                                                                                                                                                           प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) के द्वारा जारी की गई बर्न्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में भारत की आर्थिक वृद्वि दर के अनुामन को बढ़ाया जाना भारत की नीतिगत स्थिरता, उपभोग शक्ति और आत्मनिर्भर विकास के मॉडल पर पूरी दुनिया के बढ़ते विश्वास की पहचान है। वर्तमान समय में जहाँ एक ओर जब पूरी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मुद्रास्फीति, ट्रेड वार और मंदी की आशंकाओं से जूझ रही हैं, तो इस सबके बीच भारत ने एक बार फिर से अपनी आर्थिक क्षमता और नीतिगत संतुलन को सिद्व किया है। आइएमएफ ने वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए भारत की जीडीपी वृद्वि की दर को 6.6 प्रतिशत तक संशोधित किया है, जो जुलाई में जारी किए गए अनुमान से 10 आधार अंक अधिक है।

वैश्विक औसत वृद्वि दर जहाँ 3.2 प्रतिशत के आसपास घूम रही है, वहीं भारत का प्रदर्शन इसका लगभग दोगुना है। यह वृद्वि ऐस समय में आई, जब कि चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते टैरिफ विवादों के चलते वैश्विक व्यापारिक प्रवाह को अस्थिर किया हुआ है और यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा संकट और मंदी के दबाव से जूझ रही हैं। इस वातावरण में भारत की स्थि आर्थिक गति अपने आप में असाधारण ही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पिछले एक दशक में जिस नीतिगत संरचना को अपनाया है, वह अल्पकालिक राहत योजनाओं से आगे जाकर दीर्घकालिक विकास के अपने केन्द्र में रखती हैं। सरकार का ध्यान उपभोग आधारित विकास से हटकर निवेश और उत्पादन आधारित मॉडल पर केन्द्रित हुआ है। पूँजीगत व्यय में निरंतर वृद्वि, मेक इन इंडिया और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) के जैसी योजनाओं ने घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के फील्ड को पर्याप्त गति प्रदान की है। इसके परिणामस्वरूप भारत अब केवल कन्ज्यूमर मार्केट ही नहीं, बल्कि उत्पादन केन्द्र के रूप में भी उभरकर सामने आ रहा है। इसका प्रभाव निर्माण, परिवहन, रक्षा एवं डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्रों बिलकुल स्पष्ट रूप से दिखाई भी दे रहा है।

                                                               

आज ग्रामीण भारत की बढ़ती क्रय शक्ति और शहरी क्षेत्रों में सर्विस सेक्टर का विस्तार भी हमारी आंतरिक माँग को स्थिर बनाए हुए है। आइएमएफ की रिपोर्ट मानती है कि भारत की वृद्वि मुख्य रूप से घरेलू माँग में वृद्वि होने के कारण है, जो वैश्विक अनिश्चितताओं की अपेक्षा अधिक सुरक्षित है।

‘‘विदेशी निवेशकों के लिए आज भारत मात्र एक बाजार ही नहीं है, अपितु अब यह एक स्थाई रिटर्न देने वाला एक देश भी बनता जा रहा है।’’

आरबीआई की संतुलित मौद्रिक नीतियाँ भी देश की आर्थिक स्थिरता का एक बड़ा कारण रही हैं। वैश्विक स्तर पर जहाँ विभिन्न केन्द्रीय बैंक मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने में असफल रहे, वहीं भारत ने ब्याज दरों के प्रबन्धन और मुद्रा स्फीति नियंत्रण के बीच एक संतुलन को बनाकर रखा है। मौद्रिक नीति समिति ने भी बार-बार यह दोहराया है कि वृद्वि एवं मूल्य स्थिरता, दोनों को एक समान प्राथमिकता प्रदान की जाएगी।

इस नीति के परिणामस्वरूप ही खुदरा मुद्रा स्फीति अब नियंत्रण के दायरे में ही बनी हुई है। भारत का विदेशी मुद्रा भण्ड़ार 650 अरब डॉलर से अधिक, परन्तु स्थिर है, जो कि बाहरी झटकों के प्रति सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है। वित्तीय अनुशासन और नीतिगत निरंतरता का यही संयोजन भारत की विकास दर को न केवल टिकाऊ बनाता है, बल्कि निवेशकों के लिए भी एक विश्वास करने योग्य वातावरण तैयार करता है।

आइएमएफ की रिपोर्ट यह भी बताती है कि वर्ष 2025-26 में भी भारत की विकास दर 6.2 प्रतिशत पर ही स्थिर रहेगी, जबकि चीन की वृद्वि दर का 4.2 प्रतिशत तक ही सीमित रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है। यूरो जोन की औसत वृद्वि दर 1.5 प्रतिशत से नीचे है और अमेरिका की वृद्वि दर भी 2 प्रतिशत के आसपास ही अटकी है। इस सन्दर्भ में भारत का प्रदर्शन केवल एशिया में ही नहीं, बल्कि वैश्विक पटल पर भी अलग ही दिखाइ्र दे रहा है। वर्तमान समय में अमेरिका और चीन के बीच चल रहे टैरिफ विवादों के कारण जब अधिकाँश अर्थव्यवस्थाएं अस्थिरता का सामना कर रही हैं, उस समय भारत ने अपने व्यापारिक और कूटनीतिक समीकरणों को अत्यंत कुशलता के साथ साधा हुआ है। भारत ने अपने आप को एक विश्वसनीय सप्लाई चेन सेंटर के रूप में स्थापित किया है। सेमीकॉन इंडिया, मेक इन इंडिया 2.0 और नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसीज के जैसे अनेक कदम इस व्यापक रणनीति का अभिन्न अंग रहे हैं।

                                                                

भारत की आर्थिक कहानी का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष इसका वित्तीय अनुशासन भी रहा है। कोरोना महामारी के बाद जब अधिकाँश देशों ने घाटे को बढ़ाकर राहत पैकेजों पर व्यय किया, तो भारत ने राजकोषीय विस्तार को सीमित रखते हुए पूंजीगत निवेश को प्राथमिकता प्रदान की। आम बजट में सरकार ने उपभोग को बढ़ाने के स्थान पर उत्पादक निवेशों को प्रोत्साहित किया। भारत की इस रणनीति का प्रभाव यह रहा कि सरकार का ऋृण से जीडीपी अनुपात नियंत्रित रहा और अन्तर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने भारत की स्थिरता पर अपना विश्वास व्यक्त किया। आज विदेशी निवेशकों के लिए भारत केवल एक तेजी के साथ बढ़ता हुआ बाजार ही नहीं है, बल्कि यह एक ‘स्थाई रिटर्न डेस्टिनेशन’ बनता जा रहा है।

भारत की आर्थिक सफलता का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम उसकी आर्थिक कूटनीति भी रही है। आइएमएफ और विश्व बैंक जैसे मंचों पर भारत अब नीति-निर्माण की दिशा में प्रभावित करने वाला एक देश बन चुका है। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने ‘वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर’ के सिद्वांत से जिस संतुलित आर्थिक दृश्टि को प्रस्तुत किया है, उसने विकासशील देशों की आवाज को एक नया सम्मान दिलाया है। ऊर्जा सुरक्षा और हरित निवेश के जैसे क्षेत्रों में भारत की पहल ने एक नए आर्थिक मॉडल का खाका खींचा है, जो पश्चिमी पूँजीवाद की नकल नहीं, बल्कि भारतीय परिस्थितियों से जन्मा एक आत्मनिर्भर मॉडल है। यही कारण है कि आइएमएफ जैसी संस्थाएं अब भारत के विकास की गति को वैश्विक स्थिरता के लिए एक ‘महत्वपूर्ण स्तम्भ’ माने लगी हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।