
भारतीय चीनी एवं जैव ऊर्जा उत्पादक संघ ने सरकार से निर्यात प्रतिबंध हटाने का किया अनुरोध Publish Date : 07/11/2025
भारतीय चीनी एवं जैव ऊर्जा उत्पादक संघ ने सरकार से निर्यात प्रतिबंध हटाने का किया अनुरोध
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
चीनी उद्योग विदेशी मुद्रा का आधार बन सकेगा-
वर्तमान समय में भारतीय चीनी उद्योग एक बार फिर से वैश्विक मंच पर वापसी की तैयारी में है। पिछले कई वर्षों की अनिश्चित और निर्यात प्रतिबंधों के बाद चालू सत्र चीनी उद्योग के लिए नए अवसरों के द्वार खोल सकता है। भारतीय चीनी एवं जैव ऊर्जा उत्पादक संघ के अनुसार चालू सीजन में देश में चीनी उत्पादन 16 से 18 प्रतिशत बढ़कर 343.5 लाख टन तक पहुंच सकता है। इसमें से लगभग 34 लाख टन तक चीनी एथेनॉल उत्पादन के लिए प्रयोग की जाएगी, जिसे चीनी का शुद्ध उत्पादन 309.5 लाख टन रहने की उम्मीद है।
देश में फिलहाल चीनी की सालाना खपत लगभग 285 लाख टन है। इस तरह 74.5 लाख टन का अतिरिक्त स्टॉक बचेगा, जो वैश्विक बाजार में भारत के लिए आशा की नई संभावना बढ़ाएगा। बीते दो वर्षों से केंद्र सरकार ने घरेलू जरूरत और एथेनॉल मिश्रण के दबाव में चीनी निर्यात पर रोक लगाई हुई थी, लेकिन अब जब उत्पादन चक्र फिर से पटरी पर लौटा है तो चीनी उद्योग इसे भारत की वैश्विक पुनर्वास का संकेत मान रहा है।
दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में शामिल ब्राजील, थाईलैंड और यूरोपीय यूनियन में इस वर्ष कमजोर उत्पादन के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतें ऊंचे स्तर पर है। ऐसे माहौल में भारत के पास निर्यात से लाभ कमाने का सुनहरा मौका है। इससे संघ ने सरकार से शीघ्र निर्यात एनआईडी घोषित करने की मांग की है, ताकि चीनी मिलें समय रहते वैश्विक अनुबंध कर सकें। संघ का अनुमान है कि भारत इस सत्र में काम से कम 20 लाख टन चीनी का निर्यात कर सकता है, जिससे विदेशी मुद्रा आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

हाल ही के वर्षों में एथेनॉल उत्पादन इस पूरे पर दृश्य का अहम घटक बनकर उभरा है। 34 लाख टन चीनी को एथेनॉल में परिवर्तित करने से न केवल देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी बल्कि पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य को भी बल मिलेगा। यह परिवर्तन चीनी उद्योग को खाद्य वस्तु उत्पादक से आगे बढ़कर हरित ऊर्जा नीति का एक रणनीतिक स्तंभ भी बना रहा है।
केंद्र ने एथेनॉल मिशन नीति के दबाव में चीनी निर्यात पर रोक लगा रखी थी, लेकिन अब इस पर विचार करना प्रारंभ कर दिया है। भारत इस सत्र में कम से कम 20 लाख टन चीनी का निर्यात कर सकता है, जिसका लाभ सीधे देश के मिल मालिकों के साथ-साथ किसानों को भी मिल सकेगा। 34 लाख टन चीनी एथेनॉल उत्पादन के लिए उपयोग की जाएगी और 285 लाख टन सालाना देश में चीनी की खपत है।
ऐसे में यदि यह नीति लागू हो जाती है तो निश्चित रूप से आगामी वर्ष में चीनी उद्योग से विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है, जिसका लाभ देश के किसानों को भी मिल सकेगा।
चीनी के निर्यात की अनुमति मिलने से बकाया भुगतान में आएगी तेजी
चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निर्यात की अनुमति समय पर मिल जाती है तो चीनी मिलों के नगदी प्रभाव में राहत होगी और इससे गन्ना किसानों के बकाया भुगतान में तेजी आएगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा प्राप्त होगी। दूसरी ओर केंद्र सरकार को एथेनॉल बनाने और निर्यात दोनों से कर राजस्व और विदेशी मुद्रा का दोहरा लाभ मिल सकेगा। इससे स्पष्ट है कि चीनी उद्योग इस समय तीन मजबूत स्तंभ उत्पादन ऊर्जा और निर्यात पर खड़ा है, यदि नीति निर्माण में स्थिरता और स्पष्ट बढ़ी तो यह क्षेत्र घरेलू आर्थिक स्थिरता का आधार और विदेशी मुद्रा का दीर्घकालिक स्रोत सिद्ध हो सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
