सूरजमुखी की नई प्रजाति पीले फूल, दिलनुमा पत्तियाँ      Publish Date : 30/09/2026

सूरजमुखी की नई प्रजाति पीले फूल, दिलनुमा पत्तियाँ

                                                                                       प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर जिले में स्थित सीएसआईआर-हिमालय जैव-संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान के शोधकर्ताओं ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में सूरजमुखी के पौधे की नई प्रजाति की खोज की है। कृषि वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति का नाम डोरोनिकम सैक्टम रखा, जो चुमी ग्यात्से जलप्रपात के धार्मिक महत्व से प्रेरित है। सूरजमुखी परिवार से जुड़ा यह पौधा समुद्र तल से करीब 4,086 मीटर की ऊंचाई पर दमटेंग जाने वाले पहाड़ी रास्ते की ढलानों पर पाया गया है। यह खोज महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में पहली बार डोरोनिकम वंश की प्रजाति पूर्वोत्तर क्षेत्र में दर्ज की गई है। इससे पहले इसकी भारतीय मौजूदगी पश्चिमी हिमालय तक सीमित मानी जाती रही है।

शोधकर्ताओं को फिलहाल इस प्रजाति के केवल 10 से 12 पौधे ही मिले हैं। इस पौधे में पीले फूल और दिल के आकार की पत्तियां होती हैं। पौधे के नमूनों की माइक्रोस्कोप से जांच कर वैज्ञानिकों ने पुराने हर्बेरियम रिकॉर्ड और वैज्ञानिक साहित्य से तुलना की है। इसकी कुछ विशेष भौतिक संरचनाएं इसे चीन व तिब्बत की संबंधित प्रजातियों से अलग करती हैं।

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में स्थित सीएसआईआर-हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान के शोधकर्ताओं ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में पौधे की नई प्रजाति खोजी है। इसका नाम डोरोनिकम सैंक्टम रखा गया है, जो चुमी ग्यात्से जलप्रपात के धार्मिक महत्व से प्रेरित है।

हिमालय की जैव विविधता से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खोज में वैज्ञानिकों ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में पौधे की एक नई प्रजाति की पहचान की है। यह खोज पालमपुर स्थित सीएसआईआर-हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (CSIR-IHBT) के शोधकर्ताओं ने की है। शोधकर्ताओं ने बताया कि इसूरजुखी की इस नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम Doronicum sanctum रखा गया है।

यह पौधा सूरजमुखी परिवार (Asteraceae) से संबंधित है। इसकी पहचान पीले फूलों और दिल के आकार की पत्तियों के माध्यम से होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह प्रजाति समुद्र तल से करीब 4,086 मीटर की ऊंचाई पर तवांग के ऊंचाई वाले क्षेत्र में पाई गई है।

चुमी ग्यात्से जलप्रपात से मिला नाम

शोधकर्ताओं ने इस नई प्रजाति का नाम Doronicum sanctum रखा है। इसका नाम तवांग के प्रसिद्ध चुमी ग्यात्से जलप्रपात के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व से प्रेरित है। यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले पौधों की विविधता को समझने के लिए इस तरह की खोज महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

4,086 मीटर की ऊंचाई पर मिली प्रजाति

शोधकर्ताओं को यह पौधा दमटेंग जाने वाले पहाड़ी रास्ते की ढलानों पर मिला। यह क्षेत्र समुद्र तल से करीब 4,086 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। नई प्रजाति के पौधे की पहचान के दौरान वैज्ञानिकों ने उसके फूल, पत्तियों, तने और अन्य भौतिक संरचनाओं का बारीकी से अध्ययन किया। इसके नमूनों की माइक्रोस्कोप से जांच की गई। इसके बाद वैज्ञानिकों ने पौधे की विशेषताओं की तुलना पुराने हर्बेरियम रिकॉर्ड और उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य से की। इस अध्ययन से पुष्टि हुई कि पौधा पहले दर्ज प्रजातियों से अलग है।

भारत में पहली बार पूर्वोत्तर में दर्ज हुआ डोरोनिकम वंश

इस खोज का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत में पहली बार डोरोनिकम (Doronicum) वंश की प्रजाति पूर्वोत्तर क्षेत्र में दर्ज की गई है। इससे पहले भारत में इस वंश की मौजूदगी मुख्य रूप से पश्चिमी हिमालय तक सीमित मानी जाती थी। नई प्रजाति की खोज से डोरोनिकम वंश के भौगोलिक विस्तार और हिमालयी जैव विविधता की जानकारी में महत्वपूर्ण इजाफा हुआ है।

सिर्फ 10-12 पौधे मिले

शोधकर्ताओं को फिलहाल इस नई प्रजाति के करीब 10 से 12 पौधे ही मिले हैं। इतनी कम संख्या में पौधों की मौजूदगी इस प्रजाति के संरक्षण को महत्वपूर्ण बनाती है। वैज्ञानिकों ने इसके प्राकृतिक आवास और पौधे की विशेषताओं का अध्ययन किया है। आगे इस प्रजाति की आबादी, वितरण और संरक्षण स्थिति को समझने के लिए और अध्ययन की जरूरत होगी।

चीन और तिब्बत की प्रजातियों से अलग

वैज्ञानिकों के अध्ययन में इस पौधे की कुछ खास भौतिक संरचनाएं सामने आई हैं। इन विशेषताओं के आधार पर इसे चीन और तिब्बत में पाई जाने वाली इससे संबंधित प्रजातियों से अलग माना गया है। माइक्रोस्कोप से किए गए अध्ययन और पुराने हर्बेरियम नमूनों से तुलना ने नई प्रजाति की पहचान को मजबूत आधार दिया।

हिमालयी जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण खोज

तवांग जैसे ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद पौधों की कई अनोखी प्रजातियां पाई जाती हैं। ऐसे क्षेत्रों में नई प्रजातियों की खोज से हिमालय की जैव विविधता को समझने और उसके संरक्षण में मदद मिलती है। Doronicum sanctum की खोज यह भी बताती है कि पूर्वोत्तर हिमालय में अब भी कई ऐसी वनस्पति प्रजातियां मौजूद हो सकती हैं, जिनका वैज्ञानिक रूप से दस्तावेजीकरण किया जाना बाकी है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।