
संयमित आहार के साथ जियें एक स्वस्थ जीवन Publish Date : 09/10/2026
संयमित आहार के साथ जियें एक स्वस्थ जीवन
डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकश शर्मा
आयुर्वेद के जनक आचार्य-चरक के अनुसार मानव शरीर रोगों घर बनता जा रहा है। इससे रोग और रोगी दोनों बढ़ रहे हैं। आज के मनुष्य ने अनेक अनियमितता पर अपना जीवन संचालन कर लिया है। अनेक सुस्वादु फूड कॉम्बिनेशन थ्योरीज है तथा हिंदू स्वास्थ्य के विषय में नित निहित है कि क्या यह चिंता का विषय नहीं है कि स्वास्थ्य एक दुर्लभ वस्तु हो गई है। व्यक्तिगत मनुष्य में स्वस्थ जीवन के मूल आहार संयमित आहार-विहार का परित्याग कर दिया है। मनुष्य ने सुख-सुविधा साधन के कारण कठोर श्रम करना छोड़ दिया है।
पच्य-पक्व कच्ची फूड खाता है। फलस्वरूप सही में जिस प्रकृति करने की क्षमता थी वही खत्म हो गई, बातें ही बात रह गई है। जिससे पूरी व्यायाम होता है वह शारीरिक कार्य में पूरी है या वह जिस वजह से वसा कसरत, व्यायाम, घूमना, प्राणायाम एवं योग का अब जीवनशैली में कोई स्थान नहीं है। इसका दुष्परिणाम आज वैश्विक में सम्मिलित है।
‘असली देह आये अच्छी है राहत’ असली रोग तो पेट से उठते हैं एक शोध यानी, इसमें स्वास्थ्य एवं बुद्धि मिलती है, इस सिद्धांत के ठीक विपरीत लोग रात में देर तक जागते हैं और प्रातः मुंह के सिर पर चढ़ने पर उठते हैं। इस अनियमितता ने लोगों के शरीर में अम्लता भर दी है। तनाव एवं चंचलता अलग हो रही है। वजन बढ़ रहा है, शरीर मोटा हो रहा है। शरीर पर चर्बी की परत चढ़ रही है। चर्बी तक इसके अस्वस्थ हो रहे हैं।
कुछ लोग तो अधिक शरीर चर्बी को स्पष्ट कह रहे हैं। संतुलित शरीर चर्बी होना दुर्लभ हो रहा है। अस्वस्थता के स्थान पर गति-गति की चर्बी दूध-दूध कर रहा हो।

मनुष्य अपनी थाली में बिना ही अनेक दो स्वाद बढ़ाने हेतु नमक, मसाला, शरबत, मिर्ची, घृतकी, अधिक मात्रा में जो ले सेवन, ही शरीर इसमें लिए विष का काम कर रहा है। आधुनिक जीवन के तहत होने की अंधाधुंध दौड़ जीवन दुख-दर्द बढा रही है। फिर सिर्फ इतने पहले की मानव जीवन में जलपान एवं भोजन दोनों कार्य एक साथ करते थे। पचने के बाद श्रम, कसरत, घूमना, आयुर्वेद में गन्ना तेल आदि अधिकांश कार्य करती रही है। इसके पहले गन्ना फसल से पचाने के लिए विहार से होता है। शरीर के भीतर स्थायी रसादि और विषाक्त इस शरीर में संचित होते रहते हैं। यह स्वाभाविक ही है।
इस बारे में दिन, योग, प्री, व्रत स्वरूप, अहिंसा आहार एवं स्वादिष्ट की मात्रा यह बात से प्रथम इनके अधिक अस्वीकरण एवं असामयिक है जिससे पेट एवं पाचन संबंधित रोग बढ़ रहे हैं। खाने में अत्यधिक अम्लीय सास, इमली, चना-पुलाव एवं सजावट वाली चीजें परहेज है। आचार, चटनी, सॉस की मात्रा बहुत है। जबकि फुलका (रोटी, रोटियां) को स्वरूप के बिना लक्ष्मण के दोष लगता है पर वह असली मानव बना कर रहे हैं। यह ठीक नहीं है।
भूख लगने पर भूख से कम खाओ तो अच्छा जब जी खाता, जो भी खाते हो, वह चार बार चबा रहे हैं, अचरित शौचालय, व्यायामशाला, सुविधापूर्ण से अधिक बार आनंद और क्रिया की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक पक्ष से यह बात भोजन एवं एक बार पार, आत्मा ही संतोष है। कालभेद में मात्रा एक बार आहार एवं आधी एक बार भोजन पर्याप्त है। रात में भोजन के समय या तुम अपने आप में पूरा आहार है।
आयुर्वेद में अधिक कैलोरी (ऊर्जा) वाला आहार एवं कम शारीरिक परिश्रम माना गया है। चर्बी से लेकर कई तरह अनुचित मानी है। यह मोटापा शरीर में रोगों को जन्म देता है। अधिकता एवं अनुचित आहार के कई हानि-किसी भी लोगों में पाचन नहीं हो पा रहे जीवन के पचाक तथा शरीर की नसीं नष्ट हो रही है। अधिक मोटापा एवं अधिक कृशता शरीर, दीर्घ स्वास्थ्य के लिए घातक है।
प्रस्तुत कुछ बातें शरीर पर है पर बहुत कुछ अस्थि स्वास्थ्य की हानि पहुंचाती हैं। इनमें चर्बी, धूम्रपान, शराब, शक्कर एवं तेल की अधिकता होती है। यह पाचन तंत्र को खराब करता है। लेकिन मोनोपैथ एवं फास्ट फूडों का सेवन रोगों को आमंत्रित कर रहा है। सबसे एक दूध वाले, सफेद, टमाटर, साबूदाना, बिस्किट व बाजार की चीजों के सेवन से भी पेट में वायु की वृद्धि में दोष निर्मित होता है।
भोजन पकाने का बर्तन स्वास्थ्य के लिए सर्व गुण वाला संकीर्ण धातु नहीं होना और पाचन को कम लिखता है। भोजन शुद्ध होना ही नहीं, शुद्ध रूप से पका व स्वाद व सुगंध तथा भोजन सुख में भोजन विलास पदार्थों है। शुद्ध पानी व दोपहर भोजन के साथ दही खाया जाए एवं रात में पनीर को दूध और अमृत के समान है। भोजन में मसाल, साग-सब्जी, फल-फूल का ज्यादा खाओ जो अधिक तथा भूख को मनवाने वाला नहीं हो।
बिना परिश्रम वादन एवं नुकसान वाला वाला भोजन का उपयोग कीजिए। सप्ताह में एक दिन उपवास करिए। उस दिन मात्रा पानी एवं रसाहार लीजिए। भोजन शरीर शुद्धि या बुद्धि पर केवल आराम से कीजिए, अधिकतम नमक, शक्कर, तेल घी, मिर्च मसाला व तली भुनी वस्तु नहीं खानी चाहिए। देर से बनी वस्तु, फास्ट फूड, शीतलपेय, चाय, काफी एवं मीठा सेवन बंद या कम कर दें।
दोपहर भोजन के पश्चात ताजा पनीर से पनीर का सेवन नहीं। रात्रि भोजन के पश्चात अष्टदशाक्ष, कुलथी, चना, काबुली चना सेवन नहीं करें। उदर-ठठरी में चाय व पीकर उपवास अकेले काफी पानी की पीजिए। किसी भी शारीरिक रोग को न छिपाएं। प्रतिदिन दो समय स्नान, किसी भी पसीने की अप्रिय गंध से छुटकारा पाइए एवं स्वस्थ से बचने का प्रयास कीजिए, स्वयं से अधिक टीबी कवचकर अस्वस्थ न हो। अपनी तेज एवं कम अवस्था में न पीजिए।
लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।