
टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) के लक्षण, कारण, घरेलू इलाज और परहेज Publish Date : 14/01/2026
टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) के लक्षण, कारण, घरेलू इलाज और परहेज
डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा
टीबी की बीमारी को यक्ष्मा, तपेदिक और क्षय रोग जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। यह एक जानलेवा बीमारी है। आंकड़े बताते हैं कि हर साल भारत में करीब दो लाख बच्चे टीबी के शिकार होते हैं। हर साल टीबी रोग के कारण अनेक लोगों की मृत्यु तक हो जाती है। अक्सर देखा जाता है कि जैसी ही रोगी को टीबी होने का पता चलता है, तो वह बहुत घबराने लगता है, जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए। आप शांत होकर टीबी का सफल घरेलू इलाज कर सकते हैं।
टीबी (क्षय रोग) क्या है?
टीबी का पूरा नाम ट्यूबरक्लोसिस है। यह कई लक्षणों से युक्त एक गंभीर संक्रामक बीमारी है। यह माइकोबैक्टीरियम बीमारी ट्यूबरक्लोसिस नामक बैक्टीरिया से फैलती है, जो मुख्य रूप से फेफड़ों को नुकसान पहुँचाता है। यह एक धीमी गति से बढ़ते बैक्टीरिया के कारण होता है। यह बैक्टीरिया शरीर के उन भागों में बढ़ता है जिनमें खून और ऑक्सीजन होता है। इसलिए टी.बी. ज्यादातर फेफड़ों में होता है। इस कारण इसे पल्मोनरी टीबी भी कहते हैं।
टी.बी. शरीर के अन्य भागों में भी हो सकता है। टीबी की बैक्टीरिया हवा के माध्यम से फैलता है। संक्रमित व्यक्ति की खाँसी, छींक या उसकी लार के द्वारा बैक्टीरिया स्वस्थ व्यक्ति तक पहुँचता है। इससे दूसरे लोगों को भी टीबी हो जाती है। वयस्क लोगों की तुलना में टीबी से ग्रस्त बच्चे कम संक्रामक होते हैं, इसलिए बच्चों से दूसरे लोगों में टीबी के जीवाणु के फैलने की संभावना कम होती है।
टीबी (क्षय रोग) के प्रकार:
लेटेंट टीबी (Latent TB)
इसमें बैक्टीरिया शरीर में निक्रिय रूप में रहता है, क्योंकि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इसे सक्रिय नहीं होने देती। इसमें टीबी के लक्षण दिखाई नहीं देते। इस स्थिति में बीमारी एक से दूसरे में नहीं फैलती है, लेकिन भविष्य में यह सक्रिय होकर बीमारी बन सकती है।
एक्टिव टीबी

इसमें टीबी की बैक्टीरिया शरीर के अन्दर विकसित हो जाता है, तथा रोग के सभी लक्षण दिखाई देते हैं। यह संक्रमित व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में आसानी से फैल जाता है।
पल्मोनरी टीबी
यह टीबी का शुरुआती (प्राथमिक) रूप है, जो फेफड़ों को प्रभावित करता है।
एक्सट्रा पल्मोनरी टीबी
यह बीमारी फेफड़ों से अन्य जगहों पर होता है, जैसे; हड्डियाँ, गुर्दे और लिम्फनोड्स (Lymphnodes) आदि स्थानों पर हो सकता है।
टीबी (क्षय रोग) के लक्षण:
पल्मोनरी टीबी (Pulmonary TB) अक्सर बहुत ही कम उम्र वाले बच्चों में या फिर अधिक उम्र वाले वृद्ध लोगों में होता है। बच्चों और व्यस्क लोगों में टीबी के ये लक्षण दिखाई देते हैं:-
- खाँसी का लगातार बने रहना। शुरुआत में सूखी खाँसी आना। बाद में खाँसी के साथ खून भी निकलने लगता है। यह मुख्य लक्षण है।
- टीबी के कीटाणु बच्चे के फेफड़ों से शरीर के अन्य अंगों में बहुत जल्दी पहुँच जाते हैं। इसके कारण बच्चों में हल्का बुखार हमेशा बना रहता है। रात को सोते समय बच्चे को पसीना आने लगता है।
- टीबी में बच्चे को खाँसी और बुखार रहने के कारण बच्चा सुस्त रहने लगता है। थोड़ा चलने और खेलने में भी वह बहुत जल्दी थक जाता है।
- टीबी में बच्चे को भूख नहीं लगती। उसकी खाने में रूचि नहीं रहती। इसलिए बच्चों का वजन घटता जाता है।
- बच्चों की त्वचा बहुत ही नाजुक होने के कारण त्वचा का इन्फेक्शन होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
आमतौर पर टीबी के रोगी में ये लक्षण दिखाई देते हैं:-
- बिना मेहनत किए हुए थकान होना
- खाँसी के साथ बलगम में खून आना
- बुखार
- रात में पसीना आना
- साँस लेने के दौरान छाती में दर्द होना
- साँस फूलना
- भूख ना लगना एवं भोजन के प्रति अरूचि
- लगातार वजन घटना
- मांसपेशियों में दर्द (क्षति)
- पीठ में अकड़न
- पेट में दर्द
- दस्त
टीबी (क्षय रोग) के इलाज के लिए घरेलू उपाय
हल्दी और आक से टीबी की बीमारी का इलाज:
100 ग्राम हल्दी को कूट-पीस कर छान लें। इसमें आक का दूध मिला लें। यदि खून की उल्टियाँ हो रही है, तो इसकी जगह बड़ (वट) या पीपल का दूध मिलाएँ। इसे 2-2 रत्ती की मात्रा में शहद के साथ सुबह-शाम लें।
तुलसी के सेवन से टीबी रोग का इलाज
तुलसी के ग्यारह पत्ते, थोड़ी-सी जीरा एवं हींग को 1 गिलास पानी में डालें। इसमें एक नींबू निचोड़कर दिन में तीन बार पिएँ। यह टीबी रोग में लाभ पहुंचाता है।
काली मिर्च का उपयोग कर टीबी की बीमारी का उपचार
- काली मिर्च के 5 दाने, और तुलसी की 5 पत्तियों पीसकर शहद में मिलाकर चाटें।
- दस काली मिर्च के दाने लेकर घी के साथ फ्राई करें। इसमें एक चुटकी हींग पाउडर डालकर मिलाकर रख लें। इसको तीन हिस्सों में बाँटकर दिन में तीन बार लें।
लहसुन के सेवन से टीबी रोग का उपचार
- लहसुन की 1-2 कली सुबह खाकर, ऊपर से ताजा पानी पिएं। इससे टीबी (यक्ष्मा) में बहुत लाभ होता है।
- लहसुन, टीबी के बैक्टीरिया को खत्म करने में मदद करता है। इसमें एलीसिन (Allicin) और एजोइन (Ajoene) भी होता है, जो बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकता है। एक चम्मच पिसा हुआ लहसुन को एक कप दूध में मिला दें। इसमें चार कप पानी डालकर उबालें। जब यह दूध एक चौथाई रह जाए तब इसे पी लें।
ट्यूबरक्लोसिस का घरेलू इलाज नागबला से
नागबला का चूर्ण लें। इससे असमान भाग में घी लें। इन्हें शहद के साथ सेवन करने से टीबी रोग में लाभ मिलता है। बेहतर उपाय के लिए किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से जरूर परामर्श लें।
ट्यूबरक्लोसिस का घरेलू उपचार प्याज और हींग से
आधा कप प्याज के रस में एक चुटकी हींग डालें। इसे रोज सुबह और शाम खाली पेट पिएँ। यह ट्यूबरक्लोसिस होने पर लाभ पहुंचाता है।
ट्यूबरक्लोसिस का घरेलू इलाज सहजन से
रोज सहजन के पत्तियों को उबालकर सेवन करें। आप इसकी सब्जी भी खा सकते हैं। इससे संक्रमण से जल्दी राहत मिलती है। बेहतर प्रयोग के लिए आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श लें।
ट्यूबरक्लोसिस के इलाज में आंवला का उपयोग
आंवले की बीज से रस निकाल लें। इसमें एक चम्मच शहद मिलाकर सुबह खाली पेट पिएँ। इसकी जगह आंवले का चूर्ण बनाकर भी शहद के साथ ले सकते हैं।
पीपल की बीज और अदरक से टीबी रोग में फायदा
- एक गिलास गाय के दूध में 5-6 पीपल बीज और पिसी हुई छोटी अदरक डालकर पकाएं। इस दूध को छानकर एक चम्मच शहद डालकर पिएं। यह दूध टीबी (क्षय) रोग में होने वाले सभी लक्षणों को ठीक करता है।
- एक गिलास गाय के दूध में 5-6 पीपल की बीज और एक छोटी अदरक डालकर हल्की आँच में पकाएं। इसे छानकर एक चम्मच शहद डालकर पिएं। यह खाँसी, कफ, बलगम बनना जैसे लक्षणों को ठीक करता है।
लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।
