प्रियंगुः त्वचा के स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद का एक वरदान      Publish Date : 18/08/2025

  प्रियंगुः त्वचा के स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद का एक वरदान

                                                                                                                                          डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा

त्वचा के रोगों के लिए बेहद खास है प्रियंगु। आयुर्वेद में कई पौधे अपने औषधीय गुणों के लिए जाने जाते हैं। इनमें से एक है प्रियंगु, जिसे हिंदी में बिरमोली या धयिया भी कहते हैं। यह पौधा औषधीय गुणों से भरपूर होता है और इसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं। चरक संहिता के अनुसार प्रियंगु को मुख्य रूप से वात, पित्त, और कफ दोषों को संतुलित करने के लिए उपयोगी माना गया है। प्रियंगु का वैज्ञानिक नाम कैलिकारपा मैक्रोफिला वाहल है। अंग्रेजी में इसे सुगंधित चेरी या ब्यूटी बेरी कहा जाता है।

भारत में विभिन्न भाषाओं में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। संस्कृत में इसे वनिता, प्रियंगु, लता, शुभा, सुमङ्गा के नाम से जाना जाता है। हिंदी में बिरमोली, धयिया के नाम से, बंगाली में मथारा के नाम से, मराठी में गहुला के नाम से, तमिल में नललु के नाम से, मलयालम में चिमपोपिल के नाम से, गुजराती में घंकला के नाम से और नेपाली में इसे दयालो के नाम से जाना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार प्रियंगु का उपयोग पेट दर्द, दस्त, पेचिश और यूटीआई के इलाज में किया जाता है।

                                                  

आयुर्वेद में प्रियंगु को स्वस्थ त्वचा के लिए अत्यधिक महत्व दिया जाता है। इसके सूजनरोधी और ठंडक देने वाले गुण त्वचा की जलन को शांत करने, मुँहासों को कम करने और रंगत निखारने में मदद करते हैं। त्वचा की चमक बढ़ाने और दाग-धब्बों को कम करने के लिए इसका उपयोग अक्सर फेस पैक और तेलों के रूप में किया जाता है।

आयुर्वेद में जो सेहत का खजाना पाया जाता है, जिनमें प्रियंगु का नाम भी आता है। प्रियंगु को हिन्दी में बिरमोली, धयिया भी कहते हैं। प्रियंगु दाया में पौष्टिकता का गुण इतना होता है कि वह आयुर्वेद में औषधि के रूप में काम करता है। प्रियंगु का औषधिपरक गुण पेट और त्वचा संबंधी समस्याओं के उपचार हेतु आयुर्वेद में सबसे अधिक किया जाता है।

प्रियंगु क्या है?

प्राचीन चरक, सुश्रुतादि संहिता काल से लेकर भावमिश्र के समय तक यह बूटी संदिग्ध नहीं थी। चरक के मूत्र विरेचनीय, पुरीषसंग्रहणीय, सन्धानीय, शोणित स्थापनीय गुणों में तथा विभिन्न रोगों में पेस्ट, काढ़ा, आसव (Distillate), तेल, घी कल्पों में इसकी योजना की गई है। सुश्रुत के प्रिंग्वादि, अंजनादि, एलादि गुणों में तथा विभिन्न रोगों में यह कई कल्पों में प्रयुक्त की जाती है। वाग्भट्ट के प्रियंग्वादि गुणों में धन्वन्तरी निघण्टु के चन्दनादि वर्ग में कैयदेव निघण्टु के औषधीय वर्ग में तथा भाव प्रकाश के कर्पूरादि वर्ग में इसकी गणना की गई है। वर्तमान में तीन पौधों 1. Callicarpa macrophylla टीस 2. Aglaia roxburghiana Miq- तथा 3- Prunus mahaleb Linn- का प्रयोग प्रियंगु के रूप में किया जाता है।

प्रियंगु के औषधीय गुणः

प्रियंगु किन-किन बीमारियों के लिए औषधी के रूप में काम करता है इसके बारे में जानने के लिए सबसे पहले इसके औषधीय गुणों के बारे में विस्तार से जानना आवश्यक हैं।

प्रियंगु प्रकृति से तीखा, कड़वा, मधुर, शीत, लघु, रूखा, वातपित्त से आराम दिलाने वाला, चेहरे की त्वचा की रंगत को निखारने में मददगार, घाव को जल्दी ठीक करने में मदद करता है।

यह उल्टी, जलन, पित्त के बढ़ने के कारण बुखार, रक्तदोष, रक्तातिसार, शरीर से बदबू आना, खुजली, मुँहासे, कण्ठ (Throat disorder), रक्तपित्त (Haemoptysis), विष, आभ्यांतर दाह (जलन), तृष्णा या प्यास, तथा गुल्म या ट्यूमर में लाभप्रद होता है।

इसके बीज मूत्र संबंधी रोग तथा आमाशयिक क्रिया विधिवर्धक होते हैं। इसकी जड़ आमाशयिक क्रिया विधिवर्धक होती है।

प्रियंगु के लाभ और इसके उपयोगः

प्रियंगु का औषधिकारक गुणों का पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए समान मात्रा में प्रियंगु, नागरमोथा तथा त्रिफला को पीसकर दांतों पर रगड़ने से शीताद रोग में लाभ मिलता है।

रक्तातिसार में लाभकारी प्रियंगु

अगर खान-पान में असंतुलन होने के कारण दस्त से खून निकल रहा है तो प्रियंगु का इस तरह से इस्तेमाल करने पर जल्दी आराम मिलता है-

-शल्लकी, प्रियंगु, तिनिश, सेमल तथा प्लक्ष छाल चूर्ण (2-3 ग्राम) को मधु के साथ सेवन कर अनुपान में दूध पीने से अथवा चूर्ण से दूध को पकाकर मधु मिला कर पीने से अथवा चावल के धोवन में मधु तथा प्रियंगु पेस्ट मिलाकर पीने से पित्तातिसार तथा रक्तातिसार में लाभ होता है।

-1-2 ग्राम प्रियंगु फल (1-2 ग्राम) के पेस्ट में मधु मिलाकर तण्डुलोदक के साथ पीने से रक्तातिसार में लाभ होता है।

पेट फूलने की समस्या से दिलाये राहत प्रियंगुः

पेट की समस्या को शांत करने के लिए प्रियंगु चूर्ण का सेवन करने से पाचन संबंधी समस्या, आमाशय शूल में लाभ होता है।

पेट दर्द से दिलाये आराम प्रियंगुः

पेट दर्द से परेशान हैं और कोई भी उपचार काम नहीं आ रहा है तो 1-2 ग्राम प्रियङ्गु फूल तथा फल चूर्ण का सेवन करने से अजीर्ण या बदहजमी, अतिसार या दस्त, उदर शूल या पेट दर्द तथा प्रवाहिका या पेचिश में लाभ होता है। इसके अलावा 50 मिग्रा हींग, 1 ग्राम प्रियंगु तथा 1 ग्राम टंकण को गुड़ के साथ पीसकर 125 मिग्रा की गोली बनाकर सुबह शाम खिलाने से पेट दर्द से आराम मिलता है।

मूत्र संबंधी बीमारियों के उपचार में लाभकारी प्रियंगुः

मूत्र करते वक्त दर्द होना, जलन होना, रूक रूक कर पेशाब आने जैसे लक्षण मूत्र संबंधी बीमारियों में होते हैं। इनसे राहत पाने में प्रियंगु का सेवन लाभकारी होता है। प्रियंगु के पत्तों को पानी में भिगोकर, मसल-छानकर मिश्री मिलाकर पीने से मूत्र-विकारों में लाभ होता है।

सुख-प्रसवार्थ में प्रियंगु के लाभः

प्रियंगु जड़ के पेस्ट को नाभि के नीचे लेप करने से कठिन प्रसव में गर्भ सरलता से बाहर आ जाता है।

आमवात या गठिया से आराम दिलाने में लाभकारी है प्रियंगुः

प्रियंगु पत्ता, छाल, फूल तथा फल को पीसकर लेप करने से आमवात या वातरक्त के दर्द से जल्दी राहत पाने में मदद मिलती है।

विसर्प या हर्पिज के इलाज में लाभकारी प्रियंगुः

शैवाल, नलमूल, वीरा तथा गंधप्रियंगु के 1-2 ग्राम  में थोड़ा-सा घी मिला कर लेप करने से कफज विसर्प में लाभ होता है।

कुष्ठ रोग के उपचार में लाभकारी प्रियंगुः

प्रियंगु बीज या फूलों को पीसकर लगाने से कुष्ठ में लाभ होता है। कुष्ठ के लक्षण बेहतर होने में मदद मिलती है।

रक्तपित्त में लाभकारी प्रियंगुः

प्रियंगु का औषधीय गुण कान- नाक से ब्लीडिंग होने पर उसको रोकने में मदद करता है। इसके लिए प्रियंगु का इस तरह से इस्तेमाल करने पर लाभ मिलता है-

-लाल कमल एवं नील कमल का केसर, पृश्निपर्णी तथा फूलप्रियंगु से जल को पकाकर उस जल की पेया बना कर पीने से रक्तपित्त में लाभ होता है।

-खैर सार, कोविदार, सेमल तथा प्रियंगु फूल के चूर्ण (1-3 ग्राम) को मधु के साथ सेवन करने से रक्तपित्त में लाभ होता है।

-प्रियंगु-युक्त उशीरादि चूर्ण अथवा केवल प्रियंगु में समान मात्रा में लाल चंदन चूर्ण मिलाकर 1-2 ग्राम चूर्ण को शर्करा युक्त चावल के धोवन में घोल कर पीने से रक्तपित्त, तमक-श्वास, तृष्णा, दाह आदि का शमन होता है।

-1-2 ग्राम प्रियंगु पुष्प चूर्ण में शहद मिलाकर चाटने से रक्तपित्त में लाभ होता है।

अतिसार या दस्त को रोकने में प्रियंगु का उपयोग लाभकरी है प्रियंगुः

समान मात्रा में प्रियंगु, सौवीराञ्जन तथा नागरमोथा के चूर्ण (1-3 ग्राम) में मधु मिलाकर शिशु को चटाकर अनुपान में चावल का धोवन पिलाने से बच्चों में होने वाली पिपासा, उल्टी तथा अतिसार में लाभकारी होता है।

कीट के विष को कम करने में प्रियंगुः

प्रियंगु कीट के विष के असर को कम करने में मदद करता है, उसका इस तरह से इस्तेमाल करने पर ज्यादा लाभ मिलता है-

-फूलप्रियंगु, हल्दी तथा दारुहल्दी के 1-2 ग्राम चूर्ण में शहद तथा घी मिलाकर बनाए गए अगद को लेप, नस्य, पान आदि विविध-प्रकार से प्रयोग करने से लूता तथा कीट-दंशजन्य विषाक्त प्रभावों से आराम मिलता है।

-भोजन में प्रियंगु का प्रयोग विष के असर को कम करने में सहायक होता है।

प्रियंगु के पौधे के उपयोगी भाग

आयुर्वेद के अनुसार प्रियंगु का औषधीय गुण इसके इन भागों को प्रयोग करने पर सबसे ज्यादा मिलता है-

  • पत्ता
  • फल
  • फूल
  • जड़

प्रियंगु के उपयोग करने का तरीकाः

यदि आप किसी ख़ास बीमारी के घरेलू इलाज के लिए प्रियंगु का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि इसके लिए किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही इसका उपयोग करें। चिकित्सक के सलाह के अनुसार 1-2 ग्राम चूर्ण ले सकते हैं।

प्रियंगु कहां पाया या उगाया जाता हैः

समस्त भारत में प्रियंगु लगभग 1800 मी की ऊँचाई पाया जाता है।

लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।