‘‘हरीतकी”: आयुर्वेद की एक अमूल्य धरोहर      Publish Date : 07/08/2025

         ‘‘हरीतकी”: आयुर्वेद की एक अमूल्य धरोहर

                                                                                                                                            डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा

हमारे देश भारत की इस पवित्र भूमि पर कुछ ऐसी औषधीय सामग्री भी उपलब्ध हैं, जिन्हें संजीवनी भी कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। ऐसी ही कुछ औषधीय सामग्रियों में से एक है ‘‘हरीतकी”, जिसे संस्कृत में अभया कहा जाता है। हमारे प्राचीन ग्रंथ आयुर्वेद में हरीतकी को औषधीय गुणों का खजाना माना गया है; हम इसे हरण या हर्र के नाम से भी जानते हैं। हरीतकी में विटामिन-सी, विटामिन-के, मैग्नीशियम, अमीनो एसिड, फ्लेवेनॉएड और एंटी-ऑक्सीडेन्ट्स के जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं।

हरीतकी ब्लड शुगर को कंट्रोल करने, पाचन क्रिया में सुधार करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है। हरीतकी का फल भारत औश्र दक्षिण एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में पाया जाता है और इसका वैज्ञानिक नाम टर्मनिलिया चेबुला है। हरीतकी का उपयोग आयुर्वेद में हजारों वर्षों से किया जा रहा है।

                                                       

हरीतकी के फल सूखे होते हैं और इनका उपयोग चूर्ण, काढ़ा और गोली के रूप में किया जाता है। एक अन्य ग्रंथ चरक संहिता में इसे कषाय (कसैला) माना गया है जबकि सुश्रुत संहिता के अनुसार, हरीतकी का उपयोग मुख्य रूप से पाचन क्रिया, श्वसन, त्वचा और मूत्र सम्बन्धित परेशानियों से जूझ रहे लोगों के उपचार के लिए किया जाता है।

हरीतकी के चूर्ण का उपयोग करने से आर्श यानी बवासीर के लक्षण प्रभावी रूप से कम होते हैं; सूजन कम होती है और दर्द में भी राहत प्राप्त होती है। चरक संहिता में इसे त्रिदोषनाशक बताया गया है। इस चिकित्सा ग्रंथ के अनुसार हरीतकी के फूल को सुखोर इसका चूर्ण तैयार किया जाता है। इस चूर्ण का सेवन करने से मुंह के छाले, खांसी और गले में खराश जैसी समस्याओं से राहत मिलती है।

                                                        

यदि आप अपने झड़ते हुए बालों से परेशान हैं तो हरीतकी के चूर्ण को आंवला और रीठे के साथ मिलाकर पानी में उबालें और छानकर इस पानी से अपने बालों को धोएं। ऐसा करने से आपके बालों का झड़ना भी कम होगा और आपके बाल मजबूत बने रहेंगे।

लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।