
रजोनिवृत्ति के बाद आस्टियोपोरोसिस का उपचार Publish Date : 23/09/2026
रजोनिवृत्ति के बाद आस्टियोपोरोसिस का उपचार
डॉ0 युवराज चौधरी एवं मुकेश शर्मा
लाखों महिलाएं रजोनिवृत्ति के बाद हड्डियों की कमजोरी के चलते दर्द, बार-बार फ्रैक्चर होने जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नई दिल्ली के नए शोध से इसके प्रभावी उपचार की उम्मीद बढ़ गई है। शोध की मानें तो इस बीमारी का कारण कैल्शियम या विटामिन-डी की कमी एकमात्र कारण नहीं है, बल्कि आंत, प्रतिरक्षा तंत्र और हड्डियों का असंतुलन भी जिम्मेदार होता है। एम्स के शोध से लक्षित दवा विकसित करने का रास्ता खुल गया है।
समझें बीमारी की असली जड़
रजोनिवृत्ति के बाद हार्मोनल बदलाव आंतों में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया और प्रतिरक्षा तंत्र को प्रभावित करते हैं। इससे हड्डियों को गलाने वाली कोशिकाएं (आस्टियोक्लास्ट) अधिक सक्रिय हो जाती हैं, जिससे हड्डियों की सघनता तेजी से घटने लगती है।
शोध ने जगाई उम्मीद
एम्स के शोध में पोस्ट-मेनोपाजल आस्टियोपोरोसिस का एक मॉडल तैयार कर चूहों पर अध्ययन किया गया। इसमें एक सुरक्षित प्रोबायोटिक बैक्टीरिया 'बेसिलस कोएगुलेंस' का प्रयोग किया गया। शोध में पाया गया कि आंतों की सूजन में कमी आई, हड्डियों की घनता में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। चूहों पर मिले सकारात्मक परिणामों के आधार पर अब मानव स्तर पर क्लीनिकल ट्रायल की तैयारी की जा रही है।
हड्डियों का क्षरण हो सकता है कम
बेसिलस कोएगुलेंस आंत में बनने वाले शार्ट चेन फैटी एसिड, खासकर ब्यूटिरेट के स्तर को बढ़ाता है। यही तत्व सूजन नियंत्रित कर हड्डियों का क्षरण धीमा करता है। यही सिद्धांत नई दवा की नींव बनेगा।
विशेषज्ञ की राय
आस्टियोपोरोसिस मेनोपाज के बाद महिलाओं में एक साइलेंट बीमारी है। जब फ्रैक्चर होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यदि आंत और प्रतिरक्षा तंत्र को लक्ष्य बनाकर दवा विकसित होती है, तो यह इलाज के तरीके में बड़ा बदलाव ला सकती है।
अध्ययन से यह स्पष्ट है कि पोस्ट मेनोपाजल आस्टियोपोरोसिस केवल कैल्शियम की कमी से होने वाली बीमारी नहीं है। आंत, प्रतिरक्षा तंत्र और हड्डियों के बीच संतुलन बिगड़ने से यह बीमारी जन्म लेती है। चूहों पर मिले सकारात्मक परिणाम भविष्य में एक लक्षित दवा के विकास की मजबूत नींव तैयार करेंगे।
बने सेहत की मजबूत नींव
एक महिला को अपने जीवनकाल में अलग-अलग पोषण संबंधी जरूरतें पूरी करनी होती हैं। भारतीय बच्चों में खराब पोषण और अस्वस्थता का एक बड़ा कारण गर्भावस्था से पहले, उसके दौरान और बाद में माताओं के पोषण की खराब स्थिति है। बच्चियों के सही और पोषण वाले आहार की सुलभता अपेक्षाकृत कम होती है, जिससे एनीमिया, कम वजन, धीमे विकास जैसी समस्याएं अक्सर लड़कियों में अधिक देखने में आती हैं।
लड़कियों की सेहत की बात करें तो इसका अर्थ केवल बीमारी से बचाव तक सीमित नहीं होना चाहिए। सेहत शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक संतुलन की पूरी तस्वीर होती है। इसे सुंदर बनाने के लिए समय के साथ उभरने वाली कुछ नई चुनौतियों को भी ध्यान में रखने की जरूरत है। जैसे, छोटी उम्र में ही बढ़ता मोटापा, स्क्रीन टाइम व पीयर प्रेशर के कारण अलग-अलग स्तर पर होने वाली एंजाइटी आदि। लड़कियों की सेहत में बड़ा रोड़ा कुछ परंपरागत सामाजिक और लैंगिक मान्यताएं भी हैं। इसमें सबसे सामान्य है बचपन से ही परिवार में सबसे बाद में भोजन करने या बचा-खुचा ग्रहण करने की आदत।
12 की उम्र में 12 हो हीमोग्लोबिन
इसे सामान्य भाषा में खून की कमी भी कहा जाता है। एनीमिया एक ऐसी स्थिति है, जब रक्त में लाल रक्त कोशिकाओं की मात्रा कम हो जाती है। बच्चियां मासिक धर्म की चुनौतियों व पोषण की कमी से आसानी से शिकार हो जाती हैं। इस स्थिति में शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन युक्त रक्त नहीं मिल पाता, जिससे थकान व कमजोरी बनी रहती है। यह संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करता है व शारीरिक विकास में भी बाधक है। यह अवसाद और गंभीर हृदय रोग का कारण बन सकता है।
यही कारण है कि एनीमिया मुक्त भारत रणनीति के तहत 10 से 19 साल की लड़कियों व किशोरियों को सप्ताह में एक बार आयरन और फोलिक एसिड की एक गोली लेने की सिफारिश की गई है। प्रत्येक गोली में 60 मिग्रा. प्राकृतिक आयरन और 500 माइक्रोग्राम फोलिक एसिड होता है। सर गंगाराम अस्पताल की वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर माला श्रीवास्तव के अनुसार, इससे बचाव के लिए 12 की उम्र में उनमें हीमोग्लोबिन का स्तर 12 होना चाहिए।
स्वस्थ आदतों का विकास
बचपन वह समय होता है, जब शरीर और मन दोनों तेजी से विकसित होते हैं। वरिष्ठ चिकित्सक डा. सुशीला कटारिया के अनुसार, छोटी उम्र से ही लड़कियों को सही पोषण, विशेषकर आयरन और कैल्शियम, मासिक धर्म से जुड़ी सही जानकारी के साथ अच्छा दिखना क्या है, यह जानकारी भी देनी चाहिए। जैसे, बच्चियों को बताएं कि गलत पोषण कैसे उनके अच्छा दिखने में बाधक है। साथ ही स्वस्थ रहने के लिए सक्रिय होना कितना जरूरी है ताकि ब्लड शुगर, थायराइड, हाइपरटेंशन और हार्मोनल बदलावों से होने वाली चुनौतियों से बचा जा सके।
बच्चियों में होने वाली एंजाइटी को हल्के में न लें। उन्हें बताएं कि मानसिक थकान और भावनात्मक दबाव को कैसे पहचाना जाए और इनसे बचाव के लिए योग व ध्यान को दिनचर्या में शामिल करना जरूरी है। इन आदतों का विकास हो तो इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि लड़कियां बड़ी होकर अपनी सेहत को प्राथमिकता देना सीख सकेंगी। कोई समस्या हो तो उसे टाल देना या समय नहीं है या पहले काम जरूरी है, यह प्रवृत्ति विकसित नहीं हो पाएगी।
एचपीवी वैक्सीन क्यों जरूरी
जागरूकता और जांच से कैंसर का बचाव किया जा सकता है। एक प्रभावी उपाय है एचपीवी वैक्सीन, जिससे सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम संभव है। इसे 9-14 साल की बच्चियों को लगवाना चाहिए। वैक्सीन लगवाने से संक्रमण के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। इससे गर्भाशय ग्रीवा कैंसर (90 प्रतिशत तक) व अन्य कैंसर से सुरक्षा मिल सकती है।
घर का खाना, सेहत का खजाना
बच्चियों में पोषण की समस्या हल करने का एक बेहतर तरीका है उन्हें घर में बने भोजन करने के लिए प्रोत्साहित करना। दाल, चावल, सब्जी, रोटी, दही में पोषण तो मिलता ही है साथ ही वजन भी नियंत्रित रहता है। अगर बच्चियां ओवरवेट हैं तो आगे चलकर उन्हें गंभीर बीमारियों का जोखिम रहता है। पीसीओडी और कैंसर सबसे गंभीर खतरा है। उन्हें कभी कच्चा, साबुत तो कभी केवल उबाल कर, कभी भूनकर, हर रूप में भोजन ग्रहण करने के लिए प्रेरित करें। घर में स्वस्थ तेल-घी का प्रयोग करना चाहिए। भोजन लोहे की कढ़ाही में बनाएं तो आयरन की कमी दूर करने में मदद मिल सकती है। बच्चियों को स्वस्थ भोजन तैयार करने के लिए प्रेरित करना चाहिए ताकि वे जान सकें कि वे जो बना रही हैं वह कितना स्वस्थ है।
पीयर प्रेशर न बना दे बीमार
बचपन से ही बच्चों को स्वस्थ आहार के साथ समग्र सेहत के लिए भी प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चियों को भी खेलकूद के लिए समान रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें बताएं कि शारीरिक परिवर्तन के कारण शरीर की आवश्यकताएं बदल जाती हैं। पीरियड्स में होनी वाली अनियमितता, थकान या बार-बार कमजोरी को अनदेखा नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये शरीर के संकेत हो सकते हैं। किशोरावस्था में पीयर प्रेशर भी एक ऐसी चीज है, जो बच्चों में एंजाइटी का कारण बनता है। बच्चियां अपनी बॉडी इमेज को लेकर अत्यधिक सचेत रहती हैं। इंटरनेट मीडिया के प्रभाव में आकर अपने लुक्स को लेकर प्रयोग करती रहती हैं। मोटापा के कारण बुलिंग या दुबले होने की सनक भी उन्हें बीमार बना सकती है।
लेखकः डॉ0 युवराज चौधरी, निदेशक, हंस मल्टीस्पेशलिस्ट हॉस्पिटल, कंकर खेड़ा मेरठ।