मानसिक सेहत का मिशन      Publish Date : 13/07/2026

             मानसिक सेहत का मिशन

                                                                                                     डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

भारत में मानसिक सेहत की जरूरतें लगातार बढ़ रहीं और एक नया एलायंस बता रहा है कि कोई एक अलग कार्यक्रम लॉन्च करने से ज्यादा ऐसे प्रयासों के बीच समन्वय की सख्त जरूरत है

भारत में मानसिक सेहत का संकट सबसे तीव्रता से दुविधा की स्थितियों में ही महसूस होता है: मदद कहां से लें, क्वालिटी को कैसे परखें और टूटी-बिखरी व्यवस्था में भरोसा किस पर करें। ये सवाल द श्री राम स्कूल्स की वाइस चेयरपर्सन वासवी भरत राम के लिए उस वक्त निजी बन गए जब उनकी बेटी को मानसिक सेहत से जुड़ी परेशानियां होने लगीं। वे याद करती हैं, "मैं उस सचाई का सामना करने को मजबूर हो गई जिसे मैंने कभी पूरी तरह समझा नहीं था।"हालांकि उनके परिवार को इलाज और देखभाल आखिरकार मिल गए, लेकिन इस तजुर्बे ने व्यवस्था के भीतर गैरबराबरी के बारे में उनकी जागरूकता को और गहरा कर दिया। भारत में मानसिक सेहत से जुड़े इलाज में लगातार चिंताजनक फासला बना हुआ है यानी उन लोगों का हिस्सा जिन्हें इलाज की जरूरत है लेकिन मिल नहीं पाता।

                                          

यह 95 फीसद से ज्यादा आंका जाता है, और यह कमी कोविड के बाद के सालों में खासकर बच्चों और युवाओं में बढ़कर और गहरी हो गई। वासवी कहती हैं, "मानसिक सेहत खास लोगों की चिंता नहीं है; यह शिक्षा,आजीविका, जेंडर, गरीबी, उत्पादकता और भले-चंगे में भी दिखती है। देश का हर चौथा व्यक्ति इससे प्रभावित है। ऐसे में यह विकास का मूल मुद्दा है।"

इसी समझ ने 2023 में इंडिया मेंटल हेल्थ एलायंस (आइएमएचए) की नींव रखी। अलग-थलग कार्यक्रम चलाने के बजाए इस एलायंस की परिकल्पना व्यवस्था के स्तर पर हस्तक्षेप के रूप में की गई। विभिन्न क्षेत्रों में फैला यह मंच सेवा प्रदाताओं, शोधकर्ताओं, परोपकारियों, नीति निर्माताओं और सबसे जरूरी,मानसिक बीमारी अनुभव कर चुके लोगों को साथ लाया। पहले ही साल इसका दायरा इस कदर बढ़ा कि 30 से ज्यादा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैले 250 सदस्य संगठन इसमें शामिल हो गए, जिससे यह भारत का सबसे बड़ा मानसिक स्वास्थ्य अलायंस बन गया।चिल्ड्रेन फर्स्ट की सह संस्थापक और आइएमएचए के संस्थापक समूह से जुड़ी बच्चों और किशोरों की मनोचिकित्सक डॉ।

कविता अरोड़ा कहती हैं, "भारत में मानसिक स्वास्थ्य का काम बहुत बड़ा और समुदाय से जुड़ा है और फिर भी अक्सर दिखाई नहीं देता जबकि परोपकारी लोगों के सामने असर डालने वाले निवेश के साफ रास्ते नहीं हैं। ज्यों-ज्यों जागरूकता और फैलाव बढ़ रहा है, चुनौती इसे रोकथाम, हस्तक्षेप और बाद की देखभाल जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बढ़ाने की है।" इसीलिएयह एलायंस साझा ज्ञान को संजोने, संगठनों और डॉक्टरों की क्षमता को मजबूत बनाने और दोहराव के बजाए मिलकर काम करने को बढ़ावा देने पर काम कर रहा है। इसकी एक बड़ी पहल ओपन सोर्स ऑनलाइन नॉलेज सेंटर है, जिसका मकसद परिवारों, डॉक्टरों, अगली कतार के वर्कर्स के लिए मानसिक सेहत की राह आसान बनाना है।

                                          

आइएमएचए के तौर-तरीकों को परिभाषित करने वाला सिद्धांत 'जिए गए अनुभव कीविशेषज्ञता' को सबसे आगे रखना है। वासवी बताती हैं, "मानसिक सेहत को विशुद्ध बायोमेडिकल और विशेषज्ञ संचालित चश्मों से नहीं देखा जा सकता, देखभाल मानवीय, भरोसेमंद और समुदायों के प्रति उत्साह भरी होनी चाहिए।" यह एलायंस पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े भागीदार के तौर पर सरकारों के साथ काम करके मानसिक देखभाल अधिनियम 2017 के बेहतर अमल में मदद कर रहा है।अपनी शुरुआत से ही आइएमएचए नेक्षमता निर्माण कार्यक्रम चलाकर, राष्ट्रीय सम्मेलनों की मेजबानी करके, सीखने-सिखाने की सुविधा देकर और परोपकारी पूंजी जुटाकर 130 से ज्यादा शहरों में फैले 1,600 से ज्यादा मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों तक पहुंच स्थापित की है। चुपचाप और मिल-जुलकर बना यह एलायंस अपने काम से यह पक्का कर रहा है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य को ढांचागत प्राथमिकता के रूप में लिया जाए जिससे वह लंबे समय से वंचित रहा है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।