सिजोफ्रेनिया की समस्या का पारंपरिक उपचार      Publish Date : 10/07/2026

सिजोफ्रेनिया की समस्या का पारंपरिक उपचार

                                                                                                      डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

सिजोफ्रेनिया एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। जब यह समस्या विकसित होती है, तो इससे प्रभावित व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता भी प्रभावित होने लगती है। हमारे स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ0 दिव्यांशु सेंगर इस समस्या के बारें में आपको जानकारी प्रदान कर रहे हैं-

सिजोफ्रेनिया एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित एक विकार है, जिसके अन्तर्गत प्रभावित व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और वास्तविकता को समझने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। अक्सर लोग इसे ‘स्प्लिट पर्सनैलिटी’ समझ लेते हैं, जबकि यह एक अलग मानसिक बीमारी होती है। सिजोफ्रेनिया से ग्रस्म मरीज का यदि समय पर उपचार न किया जाए तो प्रभावित व्यक्ति की पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों और दैनिक जीवन के पहलुओं पर इसका गहरा प्रभाव भी पड़ सकता है।

                               

ज्यादातर मामलों में इस बीमारी की शुरुआत कम उम्र में ही हो जाती है। इसके कारण प्रभावित व्यक्ति को ध्यान केंद्रित करने में मुश्किल हो सकती है और निर्णय लेने या कोई योजना बनाने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

सिजोफ्रेनिया के कारणः

डॉ0 दिव्यांशु सेंगर बताते हैं कि सिजोफ्रेनिया का कोई एक कारण विशेष नहीं होता है। इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार होते हैं, इन कारणों में शामिल हैं-

1. जेनेटिक कारण

सिजोफ्रेनिया जेनेटिक हो सकता है। यानी अगर परिवार में किसी सदस्य को यह बीमारी पहले भी रह चुकी है, तो आप में भी इसका जोखिम बढ़ सकता है।

2. मस्तिष्क में डोपामिन और ग्लूटामेट जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का असंतुलन होने पर भी सिजोफ्रेनिया का खतरा बढ़ सकता है।

3. प्रेग्नेंसी के दौरान सिजोफ्रेनिया का खतरा बढ़ सकता है। वहीं, जन्म के समय संक्रमण या ऑक्सीजन की कमी के कारण भविष्य में भी इस बीमारी का खतरा बढ़ सकता है।

4. लंबे समय तक तनाव में रहने से और किसी ट्रामा की वजह से सिजोफ्रेनिया का जोखिम बढ़ सकता है।

सिजोफ्रेनिया के शुरुआती लक्षणः

सिजोफ्रेनिया होने पर इससे प्रभावित होने वाले व्यक्ति को कुछ लक्षण महसूस हो सकते हैं। इस समस्या के लक्षण और प्रभाव हर व्यक्ति में अलग-अलग भी हो सकते हैं। इनमें से कुछ लक्षण इस प्रकार के भी हो सकते हैं-

1. बीमारी से प्रभावित व्यक्ति को ऐसी आवाजें सुनाई देना जो कि वास्तव में मौजूद ही न हों।

2. दूसरे लोगों पर शक करने की आदत।

3. सोचने और बोलने में असंगति का होना।

4. लोगों से दूरी बनाना और अकेले रहना पसंद करना।

5. प्रभावित व्यक्ति की भावनाओं का कम हो जाना।

6. पढ़ाई या काम के स्तर में अचानक गिरावट आना।

7. विशेष रूप से ध्यान और याददाश्त में कमी आना।

8. प्रभावित व्यक्ति हाइजीन का ध्यान भी नहीं रख पाता है।

ऐसे लोगों में ज्यादा रहता है सिजोफ्रेनिया जोखिम

1. अगर परिवार में मानसिक बीमारी का इतिहास रहा है, तो इस बीमारी खतरा हो सकता है।

2. 20 से 30 साल की उम्र में सिजोफ्रेनिया का जोखिम सबसे अधिक रहता है।

3. लंबे समय तक नशीले पदार्थों का सेवन करने से भी सिजोफ्रेनिया का जोखिम बढ़ता है।

4. लंबे समय तक तनाव में रहने से सिजोफ्रेनिया का खतरा अधिक रहता है।

क्या सिजोफ्रेनिया का इलाज संभव है?

डॉ0 दिव्यांशु सेंगर बताते हैं कि वर्तमान में सिजोफ्रेनिया का इलाज उपलब्ध नहीं है। लेकिन, सही समय पर निदान और सही उपचार से इसके लक्षणों को कम करने में मदद मिल सकती है। इसके इलाज के लिए डॉक्टर एंटीसाइकोटिक दवाएं लिख सकते हैं। साथ ही, साइकेट्रिस्ट से सलाह करना भी बहुत जरूरी माना जाता है। वहीं, परिवार और दोस्तों से बातचीत करना भी बहुत जरूरी है।

डॉक्टर से कब मिलना चाहिए?

                               

  • अगर किसी व्यक्ति को लगातार भ्रम हो रहा है, उसे ऐसी चीजें दिखाई या सुनाई दे रही है, जो असल में है ही नहीं।
  • अगर व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई दे, तो इस संकेत की अनदेखी न करें और डॉक्टर से बिना देरी किए मिलना चाहिए।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।