झड़ते बालों की कहानी इलाज की जुबानी      Publish Date : 08/07/2026

    झड़ते बालों की कहानी इलाज की जुबानी

                                                                                                    डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

किसी व्यक्ति के शारीरिक हाव-भाव और संपूर्ण स्वास्थ्य में बालों की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सिर पर काले घने बाल व्यक्तित्व पर निखार लाते हैं। बढ़ती आयु के साथ बालों का झड़ना शरीर क्रिया के तमाम पहलुओं पर निर्भर करता है, परन्तु अल्पायु में सिर के बालों का आंशिक अथवा पूरी तरह गायब होना गंजापन अथवा खालित्य कहलाता है। एक आम कहावत के अनुसार गंजापन समृद्धि की निशानी होती है। गंजेपन से प्रभावित संभ्रांत लोग यह सोचकर आत्ममुग्ध होते हैं कि सिर के बाल गए तो क्या, इसके कारण आर्थिक सम्पन्नता तो आई ही है। वैज्ञानिक परिदृश्य में गंजापन और आर्थिक संपन्नता के बीच किसी तरह का संबंध होने के प्रमाण नहीं मिले हैं।

गंजापन, जिसे मेडिकल भाषा में एलोपेसिया ऐसा रोग है जिसमें प्रतिरक्षा प्रणाली हेयर फॉलिकिल पर आक्रमण कर बाल को क्षति पहुंचाती है। हेयर फॉलिकिल्स, जिसे रोम कूप अथवा बालों की जड़ कहा जाता है, त्वचा के नीचे बाल की रचना करने वाली संरचनाएं होती हैं। यद्यपि, शरीर के किसी भी अंग से बाल को क्षति पहुंच सकती है, परंतु एलोपेसिया एरिएटा से आमतौर पर सिर और चेहरे प्रभावित होते हैं। विशेष रूप से बालों के गिरने की शुरुआत छोटे और गोल पैच के रूप में होती है, परंतु कुछ मामलों में यह अधिक व्यापक होती है।

इस रोग से प्रभावित अधिकांश लोग स्वस्थ रहते हैं और उनमें कोई अन्य लक्षण नहीं देखे जाते। गंजेपन की शुरुआत बाल झड़ने के साथ होती है जिसके पीछे कई स्थितियां जिम्मेदार होती हैं, जिनमें प्रमुख हैं: तनाव, पोषण के अंतर्गत आयरन, प्रोटीन, विटामिन डी, बी 12 जैसे पौष्टिक तत्वों की कमी, थायरॉइड, पॉलीसिस्टिक ओवरी रोग यानि पीसीओडी, गर्भावस्था, रजोनिवृत्ति जैसी हॉर्मोन संबंधी स्थितियों में बदलाव आनुवंशिक (जेनेटिक); बालों में लगाने के रासायनिक उत्पादों और हीटिंग टूल्स का अत्यधिक उपयोग, कुछ दवाइयां और सिर के ऊपरी हिस्से यानी स्कैल्प में डैंड्रफ, फंगल या वैक्टीरियल संक्रमण, आदि।

शारीरिक अथवा भावनात्मक तनाव की स्थितियों में कॉर्टिसोल नामक हॉर्मोन का स्तर बढ़ जाने से बालों के रोम कूप (फॉलिकिल्स) प्रभावित हो जाते हैं जिससे बाल झड़ने की शुरुआत होती है। बालों को काला करने के लिए प्रयुक्त रासायनिक रंग यानी डाई के प्रयोग, बालों को सीधा करने अथवा घुंघराले बनाने के लिए विद्युत चालित स्ट्रेटनिंग और हीटिंग टूल्स का प्रयोग बालों के झड़ने का कारण बन सकता है। थायरॉइड रोग, एनीमिया तथा ऑटोइम्यून से जुड़ी कुछ बीमारियां, ब्लडप्रेशर के लिए प्रयुक्त कुछ दवाइयां बालों के झड़ने का कारण बन सकती हैं। इनके अलावा बालों में चोटी और हेयर स्टाइल बनाने के दौरान बालों को कसकर बांधने से उत्पन्न खिंचाव जैसी स्थितियां भी बालों के झड़ने के लिए जिम्मेदार हो सकती हैं।

एलोपेसिया एरिएटा एक ऑटोइम्यून स्थिति है जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली बालों के रोमों पर हमला करती है जिससे बाल झड़ने लगते हैं। बाल झड़ने की प्रक्रिया अलग-अलग व्यक्तियों में भिन्न होती है। कुछ व्यक्तियों में बाल गिरने यानी झड़ने की प्रक्रिया उनके जीवनभर बार-बार चलती है, जबकि कुछ व्यक्तियों में बाल झड़ने का दौर एक ही बार होता है। बालों के झड़ने के बाद बाल उगना अप्रत्याशित होता है, कुछ लोगों में बाल पूरी तरह उग आते हैं, परंतु कुछ में गंजेपन की स्थिति आजीवन बनी रह सकती है।एलोपेसिया एरिएटा लाइलाज है, परंतु कुछ उपचार विधाएं बालों को तेजी से उगाने में सहायक होती हैं। कुछ लोग मौजूदा दौर के संसाधनों, विधियों का उपयोग करके अपने गंजेपन की स्थिति को छुपाने में सफल होते हैं।

स्कैरिंग एलोपेसिया

इसे साइकैट्रीशियल एलोपेसिया भी कहा जाता है, कि स्थिति में बाल उगने वाली त्वचा की सतह पर मौजूद हेयर फॉलिकल्स क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। इसके पीछे आमतौर पर संक्रमणों, रासायनिक प्रतिक्रियाओं, दहन यानी बर्निंग अथवा ऑटोइम्यून विकारों का हाथ हो सकता है। स्कैरिंग एलोपेसिया के कारण बाल स्थाई रूप से झड़ सकते हैं, क्योंकि स्वस्थ हेयर फॉलिकल्स के बिना बाल दोबारा नहीं उग सकते। स्कैरिंग एलोपेसिया से बाल की मौजूदगी वाला शरीर का कोई भी हिस्सा प्रभावित हो सकता है।

स्कैरिंग एलोपेसिया के कारण बालों के स्थाई रूप से झड़ने से भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ सकते हैं। बालों की अनुपस्थिति वाली त्वचा कोमल और चिकनी दिखाई देती है। अलग-अलग व्यक्तियों में स्कैरिंग एलोपेसिया लालिमा, पपड़ीदार अथवा रूखी त्वचा, फफोलापड़ने जैसे अलग-अलग प्रकार से दिखाई दे सकती है।नॉन-स्कैरिंग एलोपेसिया यानी अस्थाई रूप में बालों के झड़ने की स्थिति में बालों के फॉलिकल्स क्षतिग्रस्त नहीं होते, जिसके कारण उपयुक्त इलाज के परिणामस्वरूप बालों के दोबारा उगाने की संभावना होती है। एंड्रोजेनेटिक एलोपेसिया सामान्य रूप से पाया जाने वाला नॉन-स्कैरिंग एलोपेसिया है।

इस प्रकार का हेयर लॉस तनाव, हॉर्मोनल परिवर्तन या पोषण की कमी के कारण हो सकता है।बालों की संरचना से जुड़े विकार की स्थिति में दिखाई देने वाले बाल के तंतु नाजुक होकर टूटने लगते हैं।बालों का झड़ना दो श्रेणियां में विभाजित किया जा सकता है। पहला डरावना किस्म का जिसमें हेयर फॉलिकल्स स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त होते हैं, और दूसरा भयरहित। बाल झड़ने की दूसरी श्रेणी की व्यापकता अधिक पाई जाती है।

बाल झड़ने की प्रक्रिया

बाल झड़ने की प्रक्रिया निम्न तीन स्थितियों पर आधारित होती हैः

  • पैटर्ल्ड यानी एंड्रोजेनेटिक एलोपेसिया
  • डिफ्यूज़ यानी बालों का व्यापक रूप से झड़ना
  • फोकल क्षति

पैटर्ल्ड हेयर लॉस

पैटर्ल्ड हेयर लॉस जिसे एंड्रोजेनेटिक एलोपेसिया भी कहा जाता है, एक आम प्रकार का हेयर लॉस है जो पुरुषों और महिलाओं दोनों में हो सकता है। एशियन जर्नल ऑफ रिसर्च इन डर्मेटोलॉजिकल साइंस (6:1, 2023) में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार आनुवंशिक और पर्यावरणीय दोनों कारकों के प्रभाव में लगभग 50% पुरुषों और महिलाओं दोनों के एंड्रोजेनेटिक एलोपेसिया से प्रभावित होने की जानकारी मिलती है। बालों की पैटर्ल्ड श्रेणीकी क्षति का आशय बालों का व्यापक रूप से झड़ना होता है। बाल झड़ने की प्रक्रिया उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है जिसमें बाल धीरे-धीरे पतले और छोटे हो जाते हैं, और अंततः बालों का झड़ना बंद हो जाता है।

पैटर्ल्ड हेयर लॉस के लक्षण: इस श्रेणी के हेयर लॉस में बाल धीरे-धीरे पतले और छोटे हो जाते हैं। बाल झड़ने की शुरुआत अधिकांशतः सिर के शीर्ष यानी मध्य भाग और माथे के हिस्से में होती है, जिसके कारण माथा बड़ा दिखाई देने लगता है और बालों की रेखा पीछे हटने लगती है।

पैटर्ल्ड हेयर लॉस के कारण: इस श्रेणी के हेयर लॉस के पीछे आनुवंशिक और हॉर्मोन में बदलाव जैसी स्थितियां जिम्मेदार होती हैं। यह आनुवंशिक और हॉर्मोनल कारकों, हेयर फॉलिकल्स और डर्मल पैपिली के बीच पारस्परिक क्रिया तथा स्कैल्प यानी खोपड़ी पर डाइहाइड्रोटेस्टोस्टेरॉन, 5. अल्फा रेडक्टेज़ और एंड्रोजन रिसेप्टर्स के स्तरों में वृद्धि हो जाने के कारण होता है। यदि किसी व्यक्ति के परिवार में किसी को गंजेपन की सीमा तक बाल झड़ने की समस्या होती है तो उस व्यक्ति में भी इसकी संभावना अधिक होती है। शरीर में एंड्रोजन नामक हॉर्मोन की अधिकता भी पैटर्ल्ड हेयर लॉस का कारण बन सकती है।

पैटर्ल्ड हेयर लॉस का उपचार: चिकित्सा विशेषज्ञ खासकर त्वचारोग विशेषज्ञ की परामर्श में प्रयुक्त दवाइयां बालों के झड़ने की प्रक्रिया धीमा करने में सहायक हो सकती हैं। सर्जिकल प्रक्रिया द्वारा बालों को एक हिस्से से प्रभावित हिस्से में स्थानांतरित/ प्रत्यारोपित किया जाता है। चिकित्सा जगत की मौजूदा प्रगति के आधार पर त्वचारोग विशेषज्ञ एवं कुशल टेक्नीशियनों की मदद से सम्पन्न लेजर थेरेपी बालों के झड़ने को धीमा करने में सहायक हो सकती है।

डिफ्यूज़ हेयर लॉस

डिफ्यूज़ प्रकार का हेयर लॉस यानी बालों का व्यापक रूप से झड़ना डरावना नहीं होता, परंतु बालों का झड़ना सिर के किसी हिस्से तक सीमित नहीं होकर बल्कि पूरे सिर से बाल झड़ने लगते हैं। बाल झड़ने की यह प्रक्रिया पुरुषों और महिलाओं दोनों में देखी जाती है। बाल झड़ने की समस्या 30 से 50 वर्षीय आयु वर्ग के रोगियों में अधिक देखी जाती है जिसके पीछे तनाव अथवा बीमारी, आनुवंशिकअथवा हॉर्मोन एवं पोषण संबंधी समस्या जैसी स्थितियां जिम्मेदार हो सकती हैं। इन स्थितियों पर नियंत्रण रखकर बाल झड़ना रोका जा सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञ की सलाह में जिम्मेदार कारणों पर काबू पाकर बालों का झड़ना रोका जा सकता है।

लक्षण: सिर के घने बाल धीरे-धीरे अथवा अचानक झड़ने लगते हैं, प्रायः, प्रति दिन 100 से अधिक बाल गिरते जाते हैं।

कारण: इस प्रकार के हेयर लॉसके पीछे आमतौर पर टेलोजन इलूवियम नामक स्थिति जिम्मेदार होती है जो बहुधा तनाव, चयापचय यानी मेटाबॉलिक, अथवा हॉर्मोन संबंधी समस्याओं से प्रेरित होती है। टेलोजेन एलुवियम बालों के झड़ने की एक सामान्य, परन्तु अस्थायी समस्या है, जो शारीरिक या मानसिक तनाव, हॉर्मोनल बदलाव (जैसे प्रसव, थायराइड), या पोषण की कमी के कारण होती है। इसमें बाल विकास चक्र बाधित होता है, जिससे बड़ी संख्या में बाल समय से पहले आराम (टेलोजेन) चरण में जाकर 2-3 महीने बाद तेजी से झड़ने लगते हैं।

तनाव की स्थिति बालों की सेहत पर सीधा असर डालती है। इसकी शुरुआत ज्यादातर सिर के ठीक ऊपरी हिस्से से होती है। बालों के झड़ने की प्रक्रिया अचानक एवं ऑटोइम्यून तरह से होती है। दैनिक आहार में आयरन, जिंक, बायोटिन अथवा विटामिन्स की आवश्यक संतोषजनक मात्रा का अभाव भी इस तरह के बालों के झड़ने का कारण हो सकता है। बालों को झड़ने से रोकने के लिए चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा प्रचुर मात्रा में विटामिन, खनिज और प्रोटीन युक्त पौष्टिक आहार के सेवन की सिफारिश की जाती है।

एंडोक्राइन प्रणाली में परिवर्तन भी डिफ्यूज प्रकार के एलोपेसिया का एक प्रमुख कारण होता है। महिलाओं में डिफ्यूज एलोपेसिया की समस्या आमतौर पर गर्भावस्थाअथवा शिशु जन्म के पश्चात, अथवा मेनोपॉज यानी रजोनिवृत्ति के दौरान होती है। शरीर में थायराइड हॉर्मोन के स्तर में असंतुलन और पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम जैसी स्थितियां भी इस तरह के बालों के झड़ने का कारण हो सकती हैं। इनके अलावा इंटेस्टाइन यानी आंत, लिवर यानी यकृत और यहां तक कि किडनी की बीमारियों में भी डिफ्यूज एलोपेसिया की स्थिति पैदा हो सकती है।

खून से जुड़ी बीमारी के उपचार में प्रयुक्त एंटीकॉगुलैंट दवाइयों का सेवन भी अचानक बाल झड़ने का कारण हो सकता है जिसका उपचार बंद करने की स्थिति में बालों का झड़ना रुकते हुए पूर्ववत सामान्य हो जाता है। कीमोथेरेपी अथवा रेडियोथैरेपी द्वारा कैंसर के इलाज के दौरान डिफ्यूज एलोपेसिया की स्थिति उभरना अत्यंत सामान्य है जिसका इलाज पूरा होने पर बाल पहले की तरह सामान्य रूप से उग आते हैं।

निदान एवं उपचार: डिफ्यूज़ प्रकार के हेयर लॉस की पहचान प्रायः ट्राइकोस्कोपी, बालों के खिंचाव की जांच, अथवा स्कैल्प बायोप्सी परीक्षण के माध्यम से की जाती है। दवाइयों की दुकानों पर बालों को झड़ने से रोकने के लिए कई दवाइयां उपलब्ध होती हैं, परंतु चिकित्सा विशेषज्ञ की सलाह के बिना किसी भी प्रकार की दवाई का सेवन करना बेअसर होने के साथ-साथ खतरनाक भी साबित हो सकता है। रोजमर्रा के जीवन से तनाव को कम करना, संतुलित आहार का सेवन करना, तथा हॉर्मोन के स्तरों में असंतुलन दूर करना लाभकारी साबित हो सकता है।

चिकित्सा विशेषज्ञ की सलाह में जिंक, आयरन, बायोटिन जैसे पोषक तत्वों के सप्लीमेंट्स का सेवन बालों को झड़ने से रोकने में सहायक हो सकता है। परंतु इन सप्लीमेंट्स के सेवन की मात्रा एवं अवधि का निर्धारण चिकित्सा विशेषज्ञ रोग की स्थिति के आधार पर करते हैं, अतः, इनके सेवन का निर्णय स्वयं करना न केवल प्रभावहीन बल्कि खतरनाक भी साबित हो सकता है। बाल झड़ने की प्रक्रिया की शुरुआत होने पर किसी योग्य त्वचारोग विशेषज्ञ अथवा बालों की समस्या से संबद्ध विशेषज्ञ की परामर्श लेना महत्वपूर्ण होता है।

बालों की फोकल क्षति

जगह-जगह से बाल झड़ने की प्रक्रिया मेडिकल भाषा में एलोपेसिया एरिएटा के रूप में ज्ञात है। स्कैल्प पर बालों का झड़ना एक विशिष्ट गोलाकार धब्बों के रूप में होता है। फोकल क्षति के पीछे प्रायः फंगल संक्रमणों (जैसे टीनिया कैपिटिस), ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया अथवा हेयर फॉलिकिल्स में सूजन जैसी स्थितियां जिम्मेदार होती हैं। टीनिया कैपिटिस सिर की त्वचा (स्कैल्प) का एक संक्रामक फंगल संक्रमण है, जिसे 'स्कैल्प रिंगवर्म' भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से बच्चों (3-14 वर्ष) में होता है, जिससे सिर पर खुजलीदार, पपड़ीदार औरगोल गंजे धब्बे बन जाते हैं।

यह संक्रमण प्रभावित व्यक्ति, जानवरों या संक्रमित वस्तुओं के संपर्क से फैलता है। यह समस्या स्थाई या अस्थाई हो सकती है। इसका इलाज एंटीफंगल दवाइयों, स्टेरॉयड या पोषण संबंधी उपचार के माध्यम से किया जाता है। टीनिया कैपिटिस फंगल संक्रमण बच्चों में आम है जहां खोपड़ी पर पपड़ीदार गोल धब्बे बनने के साथ बाल टूट कर गिरने लगते हैं। इसी प्रकाश एलोपेसिया एरिएटा एक ऑटोइम्यून स्थिति है जिसमें प्रतिरक्षा प्रणाली बालों के फॉलिकिल्स यानी रोमों पर हमला कर देती है जिससे अचानक छोटे-छोटे गोल पैच में बाल झड़ने लगते हैं। रोम क्षेत्र में संक्रमण अथवा सूजन हो जाने से बाल की जड़ें क्षतिग्रस्त होकर सिर के बाल झड़ने लगते हैं। कभी-कभी बालों की तंग स्टाइल के चलते एक ही स्थान पर लगातार तनाव अथवा खिंचाव से बाल झड़ने लगते हैं। अत्यधिक तनाव, हॉर्मोनों में असंतुलन, थायराइड की समस्या अथवा विटामिन डी, आयरन जैसे पोषक तत्वों में कमी जैसी स्थितियां भी बालों के झड़ने में सहायक होती हैं।

लक्षण और पहचान: सिर के विशिष्ट हिस्से में गोलाकार पैच (चिन्ह) का निर्माण, त्वचा पर पपड़ी, लालिमा या खुजली होने तथा बालों का जड़ से या सतह के पास से टूटना देखा जाता है। बालों को झड़ने से बचाने हेतु उपचार के तरीके बालों के झड़ने के उपयुक्त निदान के पश्चात संक्रमण की स्थिति में एंटीफंगल दवाइयों का सेवन अथवा एंटीफंगल शैंपू लगाने, सूजन को कम करने और बालों को दोबारा उगाने के लिए चिकित्सा विशेषज्ञ की सलाह में कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स का प्रयोग, विटामिन डी और आयरन की कमी को पूरा करने के लिए पोषक तत्वों युक्त सप्लीमेंट्स लेने एवं जीवन शैली में बदलाव जैसी स्थितियां बालों को झड़ने से रोकने में सहायक होती हैं।

बाल की संरचना

बाल के तत्वों में केरोटिन, मेलानिन, लिपिड और पानी जैसे तत्व सम्मिलित हैं। केराटिन बाल का मुख्य घटक है जो प्रोटीन से बनी एक जटिल संरचना है, बाल का 95% भाग इसी केराटिन से बनता है। मेलानिन बाल को रंग प्रदान करने वाला पिगमेंट है। लिपिड बाल को नमी और चमक प्रदान करने वाले फैटी एसिड है। बालमें लगभग 10-15% पानी होता है, जो बाल को लचीलापन और मजबूती प्रदान करता है।बाल की संरचना को मुख्यतया दो भागों में बांटा जा सकता है त्वचा के ऊपर दिखाई देने वाला शाफ्ट यानी तना और त्वचा के भीतर मौजूद जड़। त्वचा के ऊपर दिखाई देने वाला बाल यानी शाट बालों का मृत हिस्सा होता है। इस तरह बाल में लगभग 95% केरोटिन, 10-12% पानी, लिपिड और रंग प्रदान करने वाले पिगमेंट (यूमेलेनिन और फियोमेलेनिन) होते हैं।

बाल की शाफ्ट: इसकी तीन मुख्य आंतरिक परतें क्युटिकिल, कॉर्टेक्स और मेडुला होती हैं। चपटी कोशिकाओं यानी सेल्स से बनी बाल की सबसे बाहरी परत क्युटिकिल बालों को सुरक्षा प्रदान करती है। बाल की मध्य परत कॉर्टेक्स बालों को मजबूती, लचीलापन और रंग यानी पिगमेंट प्रदान करती है। यह बालों का 80% हिस्सा होता है। मेडुला के नाम से ज्ञात बालों का सबसे भीतरी कोर केवल मोटे बालों में पाया जाता है।

बाल की जड़ यानी हेयर रूट/फॉलिकिल: यह त्वचा के अंदर उपस्थित फॉलिकिल से जुड़ी होती है। हेयर फॉलिकिल एक नलीनुमा संरचना होती है जो बालों को सहारा और पोषण प्रदान करती है। हेयर रूट का सबसे निचला चौड़ा हिस्सा हेयर बल्ब कहलाता है जहां नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। हेयर बल्ब के नीचे उपस्थित पैपिला बालों को रक्त की आपूर्ति करता है। हेयर फॉलिकिल से जुड़ी इरेक्टर पिली नामक मांसपेशियां बालों को खड़ा रखती हैं।

क्यों होते हैं बाल सफेद?

बाल सफेद होने की प्रक्रिया में मेलानिन का उत्पादन घटने से बालों का रंग बदल जाता है। मेलानिन बालों को रंग प्रदान करने वाला एक प्रकार का पिगमेंट है जिसके उत्पादन में गिरावट आने पर बाल सफेद या भूरे रंग के हो जाते हैं।

बाल सफेद होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

  • वृद्धावस्था: उम्र बढ़ने के साथ-साथ बालों में मेलानिन का उत्पादन कम हो जाता है, जिससे बाल सफेद होने लगते हैं।
  • जेनेटिक्स:यदि बाल सफेद होने का पारिवारिक इतिहास है, तो परिवार के सदस्यों में भी बाल सफेद होने की संभावना अधिक होती है।
  • तनाव: तनाव के कारण बालों के रंग में परिवर्तन हो सकता है, जिससे बाल सफेद हो सकते हैं।
  • पोषण की कमी: विटामिन बी 12, विटामिन डी, और कॉपर जैसे पोषक तत्वों की कमी से बाल सफेद हो सकते हैं।
  • हॉर्मोन के स्तरों में बदलाव: हॉर्मोनल परिवर्तन, जैसे कि थायरॉइड हॉर्मोन की कमी या अधिकता, बाल सफेद होने का कारण बन सकती है।
  • ऑक्सीडेटिव तनाव: ऑक्सीडेटिव तनाव के कारण बालों के रंग में परिवर्तन हो सकता है, जिससे बाल सफेद हो सकते हैं।
  • स्वास्थ्य समस्याएं: कुछ स्वास्थ्य समस्याएं, जैसे कि विटिलिगो, एलोपेसिया एरियाटा, और थायरॉइड समस्या, कैंसर के उपचार में प्रयुक्त कीमोथेरेपी एवं रेडियोथेरेपी बाल सफेद होने का कारण बन सकती हैं।

हेयर ट्रांसप्लांटेशन

गंजापन कुरूपता बिल्कुल नहीं है, फिर भी इसकी गिरफ्त में आए अधिकांश लोग नक्ली बालों (विग) की सहायता से स्वयं को आकर्षक बनाने का प्रयास करते हैं। नकली बाल लगवाने की अपेक्षा हेयर ट्रांसप्लांट यानी बाल प्रत्यारोपण कराना लोकप्रिय विकल्प है, बशर्ते योग्य एवं अनुभवी विशेषज्ञ द्वारा किया जाए। इस प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति के सिर के अन्य हिस्से से बाल लेकर सिर में उस जगह प्रत्यारोपित किए जाते हैं जहां बाल उग नहीं रहे। भारत में नई तकनीकों के आने से आम लोग भी हेयर ट्रांसप्लांट की सस्ती और सुलभ प्रक्रिया अपनाकर गंजेपन से छुटकारा पा सकते हैं।पहले एंड्रोजेनेटिक एलोपेसिया का इलाज प्लग ग्राट्स, स्कैल्प रिडक्शंस और ट्रांस्पोजीशन लैप्स नामक तकनीकों के माध्यम से किया जाता था। वर्तमान दौर में हेयर ट्रांसप्लांटेशन मानक सर्जिकल प्रयास है जिसमें रोगी की ऑक्सीपिटल स्कैल्प से फॉलिकुलर यूनिट्स को तैयार करके किया जाता है। यह एक अधिक प्राकृतिक और असली बालों को प्रदर्शित करने वाली विधि है।हेयर ट्रांसप्लांटेशन के लिए बाल की संरचना पर जानकारी आवश्यक है।

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अंतर्गत नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इनफॉर्मेशन (2 अगस्त, 2025) द्वारा 'हेयरट्रांसप्लांटेशन' शीर्षक के शोध पत्र के अनुसार मानव में दो प्रकार के हेयर फॉलिकिल्स होते हैं टर्मिनल और वेलस। टर्मिनल हेयर फॉलिकिल्स आकार में बड़े और त्वचा के भीतर गहरे स्थित होते हैं, जो सबकुटेनियस फैट यानी त्वचा की निचली परत में मौजूद वसा तक फैले होते हैं। इस प्रकार के फॉलिकिल्स से औसतन 0.06 मिलीमीटर से अधिक व्यास के घने मोटे बाल विकसित होते हैं। इसके विपरीत छोटे आकार के वेलस हेयर फॉलिकिल केवल रेटिकुलर डर्मिस तक ही पाए जाते हैं। जिनसे 0.03 मिलीमीटर से कम व्यास के छोटे और कमजोर बाल उगते हैं।

मानव खोपड़ी यानी स्कैल्प पांच परतों सेबनी होती हैः

  • त्वचा यानी एपिडर्मिस
  • कनेक्टिव टिशु यानी संयोजी ऊतक
  • एपोन्यूरोसिस: संयोजी ऊतक की एक सपाट, सफेद और पतली परत जो टेंडन की तरह मांसपेशियों को हड्डियों या अन्य मांसपेशियों से जोड़ती है।
  • नरम लचीला और जालीदार संयोजी ऊतक जो त्वचा को मांसपेशियों से जोड़ता है रक्त वाहिकाओं को सहारा देता है और अंगों को सुरक्षा प्रदान करता है
  • क्रेनियम के ऊपर पेरिओस्टिअम यह हड्डियों की बाहरी सतह पर लिपटी हुई संयोजी ऊतक की एक पतली घनी झिल्ली होती है। यह नसों और रक्त वाहिकाओंको हड्डी तक पहुंचाती है और हड्डियों के विकास, पोषण तथा टूटने पर उनकी मरम्मत में मदद करती है।

त्वचा और सबक्युटेनियस ऊतक में हेयर फॉलिकिल्स मौजूद होते हैं। एलोपेसिया से प्रभावित रोगियों में ये दोनों परतें पतली, कमजोर हो जाती हैं। हेयर ट्रांसप्लांटेशन के दौरान कनेक्टिव सबकुटेनियस ऊतक रक्त आपूर्ति को बाधित होने से बचाते हैं। आमतौर पर मानव की खोपड़ी पर लगभग एक से डेढ़ लाख हेयर फॉलिकिल्स होते हैं। प्रत्येक फालिकिल में हेयर सॉफ्ट, भीतरी और बाहरी परत और एक जर्मिनेटिव बल्ब होता है। इस बल्ब की गहराई में हेयर मैट्रिक्स, डर्मल पैपिला और मेलानोसाइट्स की उपस्थिति होती है। हेयर मैट्रिक्स से बालों का तना उगता है, डर्मल पैपिला बाल की वृद्धि को नियंत्रित करता है, तथा मेलनोसाइट्स बाल को रंग प्रदान करते हैं।हेयर ट्रांसप्लांटेशन प्रक्रिया से पहले चिकित्सक द्वारा संक्रमण, बाल प्रत्यारोपण की असफलता, अप्राकृतिक हेयर लाइंस, जैसे संभावित खतरों की समीक्षा की जाती है। हेयर ट्रांसप्लांटेशन प्रक्रिया के दौरान चिकित्सक ऑक्सीपिटल क्षेत्र से प्राप्त एंड्रोजन प्रतिरोधी फॉलिकुलर यूनिट्स को बाल्डिंग यानी खालित्य(गंजापन) क्षेत्र में स्थानांतरित करते हैं। जो व्यक्ति हेयर ट्रांसप्लांटेशन के लिए जरूरी शल्यक्रिया के अनुकूल नहीं होते, उनमें कुछ नॉन-सर्जिकल विकल्पों के माध्यम से बालों को झड़ने से रोकने और उनकी पुनः उत्पत्ति प्रेरित करने में सहायक हो सकते हैं। उन विधियों में माइनॉक्सिडिल, (यह सीधे स्कैल्प पर लगाई जाने वाली दवाई है जो बालों के रोमों (फॉलिकल्स) में रक्त के प्रवाह को बढ़ाकर नए बालों के विकास को प्रोत्साहित करती है), फिनास्टेराइड (बालों को झड़ने से रोकने के लिए प्रयुक्त दवाई), डूटास्टेरॉयड (पुरुषों में बालों को झड़ने से रोकने के लिए प्रयुक्त दवाई), निम्न स्तरीय लेजर थेरेपी,प्लेटलेट बहुल प्लाज्मा, केटोकोनाज़ोल (खोपड़ी की त्वचा में फंगल संक्रमण की आशंका में प्रयुक्त दवाई) जैसी अशल्यक विधियां सम्मिलित हैं। रोगी द्वारा इनमें से किसी भी दवाई का प्रयोग चिकित्सा विशेषज्ञ की सलाह के बिना नहीं किया जाना चाहिए।

कैसे किया जाता है हेयर ट्रांसप्लांट

हेयर ट्रांसप्लांट यानी बाल प्रत्यारोपण एकशल्यक प्रक्रिया है जिसके तहत सिर के पीछे या किनारों पर घने बालों वाले क्षेत्रों से बाल लेकर उस एरिया में प्लांट किए जाते हैं, जहां बाल नहीं है। इस पूरी प्रक्रिया में आठ से दस हफ्ते का समय लगता है और इस सर्जरी को विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा ही किया जाता है। कुछ व्यक्तियों के सिर पर पर्याप्त बाल नहीं होने की स्थिति में उनकी छाती और दाढ़ी के बालों को भी सिर पर प्रत्यारोपित किया जा सकता है। लेकिन आमतौर पर गंजेपन से प्रभावित व्यक्ति के सिर के बालों को ही दूसरों हिस्से में प्रत्यारोपित करने का चलन है।हेयर ट्रांसप्लांट के लिए हफ्ते में पांच से छह घंटे की एक सर्जरी की सिटिंग होती है जिसके तहत व्यक्ति के सिर में कुछ ही बाल ट्रांसप्लांट यानी प्रत्यारोपित किए जाते हैं। इसी प्रकार कई बार की सिटिंग में तयशुदा बाल ग्राट किए जाते हैं। इस सर्जरी में एनेस्थीसिया विशेषज्ञ के साथ-साथ अन्य उपकरणों के विशेषज्ञ भी मौजूद रहते हैं। यदि हेयर ट्रांसप्लांट करवाने वाला व्यक्ति पहले से किसी बीमारी से पीड़ित है तो उसकी विधिवत जांच के उपरांत चिकित्सा विशेषज्ञ की सलाह में पहले ही हेयर ट्रांसप्लांट किया जाता है।

चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार हेयर ट्रांसप्लांट होने के दो से तीन हफ्ते के भीतर गंजेपन से प्रभावित क्षेत्रों में बाल आने शुरू हो जाते हैं। ये बाल बिलकुल अन्य बालों की तरह प्राकृतिक और उसी रंग के होते हैं। बाद में लंबे होकर गंजापन से छुटकारा दिलाते हैं। प्रत्यारोपित बाल अन्य बालों की तरह मजबूती से सिर की त्वचा में स्थाई रूप से आजीवन उगते रहते हैं। गंजापन शारीरिक क्रियाओं में बदलाव का परिणाम है, अतः, उसकी आत्म-स्वीकृति व्यक्ति को हीन भावना की गिरफ्त में आने से अवश्य बचाएगी। पर्यावरणीय प्रदूषकों के दुष्प्रभावों से बचकर, पौष्टिक एवं संतुलित आहार का नियमित सेवन करके, स्वस्थ जीवन शैली को अपनाकर, गंजेपन यानी बाल्डनेस और उसके कारण उत्पन्न मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक वेदनाओं से बचना संभव है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।