कृषि विश्वविद्यालय में “क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट इन एग्रीकल्चर” पर त्रिदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ      Publish Date : 23/12/2025

कृषि विश्वविद्यालय में “क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट इन एग्रीकल्चर” पर त्रिदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ के प्रौद्योगिकी महाविद्यालय में दिनांक 22 दिसंबर 2025 को “क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट इन एग्रीकल्चर” विषय पर त्रिदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय के प्रौद्योगिकी महाविद्यालय मे स्थापित एग्रीटेक इनोवेसन हब एवं बैंकर्स इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट (BIRD), नाबार्ड (NABARD) के संयुक्त तत्वाधान से आयोजित किया जा रहा है।

कार्यक्रम का उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. के. के. सिंह द्वारा किया गया। अपने उद्घाटन संबोधन में उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि क्षेत्र में जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं, जिनका प्रभाव फसल उत्पादकता, जल संसाधनों की उपलब्धता, मृदा स्वास्थ्य तथा किसानों की आजीविका पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट इन एग्रीकल्चर, नवाचार, वैज्ञानिक योजना निर्माण एवं जलवायु-संवेदी तकनीकों को अपनाना अत्यंत आवश्यक है।

                                                       

माननीय कुलपति जी ने यह भी कहा कि भारत वर्ष को विकसित राष्ट्र (India@ 2047) बनाने के लक्ष्य को प्राप्त करने में कृषि क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसके लिए जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करना तथा अनुकूलन एवं रणनीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करना अनिवार्य होगा।

इस अवसर पर BIRD एवं NABARD से पधारे संकाय सदस्यों श्रीमती रजनी पाण्डेय एवं श्री प्रशान्त दूबे ने क्लाइमेट चेंज सेन्टर एवं इस ट्रेनिंग की मुख्य उद्देश्य एवं उपयोगिता के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की। उदघाटन समारोह में उपस्थित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं सभी अतिथियों का स्वागत डॉ. यू.पी. शाही, ट्रेनिंग डायरेक्टर एवं निदेशक, प्रशासन एवं अनुश्रवण द्वारा किया गया।

डॉ. शाही ने बताया कि मेरठ सहित उत्तर पश्चिमी भारत में पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय न होने से हवा की गुणवत्ता एवं रबी फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। मेरठ के 50 वर्षो के वर्षा आकड़ो के विश्लेषण के आधार पर उन्होंने बताया कि जहां वर्ष 1970 से 2000 में औसत वार्षिक वर्षा 845mm था, वही वर्ष 1981 से 2010 में कम होकर 732 रह गई है। साथ ही वर्षा के दिनों की संख्या भी कई वर्षो से कम हो रही है।

                                                    

प्रशिक्षण कार्यक्रम के को-ऑर्डिनेटर डॉ. पी. के. सिंह ने बताया कि यह त्रिद्विसीय प्रशिक्षण तकनीकी सत्रों जैसे- क्लाइमेट डाटा कलेक्षन एवं अनालिसिस, क्लाइमेट रिस्क मोडलिंग, क्लाइमेट स्मार्ट एण्ड रिजीलियंट एग्रीकल्चर एवं संवादात्मक चर्चाओं के माध्यम से संचालित किया जायेगा। इसमें जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, जल एवं मृदा संसाधन संरक्षण, जल उपयोग दक्षता, कृषि नवाचार तथा जोखिम-आधारित योजना निर्माण जैसे विषयों पर विशेष फोकस किया गया है। साथ ही प्रतिभागियों को नवीन जलवायु-स्मार्ट तकनीकों एवं नवाचारों की जानकारी भी प्रदान की जा रही है।

                                                             

कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों एवं विष्वविद्यालय के 30 प्रशिक्षणार्थी प्रतिभाग कर रहे है, जिनमें शिक्षक, वैज्ञानिक, प्रसार अधिकारी एवं शोधार्थी शामिल हैं। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रतिभागियों को व्यावहारिक, तकनीकी एवं नीति-आधारित ज्ञान प्रदान कर उन्हें कृषि क्षेत्र में जलवायु जोखिमों से निपटने हेतु सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध होगा।

कार्यक्रम में कुलसचिव, सभी महाविद्यालयों के अधिष्ठाता एवं निदेशक ट्रेनिंग प्लेसमेंट प्रोफेसर आर. एस. सेंगर भी उपस्थित रहे।