
कृषि विश्वविद्यालय में किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन Publish Date : 06/12/2025
कृषि विश्वविद्यालय में किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन
एक दिवसीय किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम में कृषि रोग प्रबंधन हेतु नैनोकवकनाशकों की महत्ता पर विस्तृत चर्चा की गई।
जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा 6 दिसम्बर 2025 को “कवकजनित रोगों के प्रबंधन में नैनोकवकनाशियों की भूमिका” विषय पर एक दिवसीय किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का संयुक्त आयोजन उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद, लखनऊ एवं विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय द्वारा किया गया। इस अवसर पर मेरठ एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से लगभग 40 प्रगतिशील किसानों ने प्रतिभाग किया। किसानों को बताया गया कि आने वाले समय में स्मार्ट कृषि प्रणालियों और नैनो-फॉर्मुलेशन के संयोजन से रोग प्रबंधन और प्रभावी होगा।
प्रशिक्षण के उद्घाटन सत्र में डॉ संजय सिंह, डायरेक्टर जनरल, उपकार लखनऊ में अपने सन्देश में किसानो के प्रशिक्षण हेतु अपने आशीर्वचन दिए। विश्वविद्यालय कुलपति प्रो के के सिंह ने अपने सन्देश में प्रशिक्षण निदेशक एवं उनके सहयोगियों को कार्यक्रम के लिए शुभकामनाएं दी और कृषको क लिए उन्नत तकनीकों को अपनाने पर ज़ोर दिय। डॉ. रविंद्र कुमार, अधिष्ठाता, जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया और कार्यक्रम की उद्देश्यपूर्ण पृष्ठभूमि प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में कृषि उत्पादन बढ़ाने और फसल रोगों पर नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना अत्यंत आवश्यक है। नैनो-आधारित फफूंदनाशक किसानों के लिए एक उभरता हुआ सशक्त विकल्प है जो कम लागत में उच्च प्रभाव प्रदान करता है।
डॉ. नीलेश कपूर, प्रशिक्षण निदेशक ने प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए किसानों को आश्वस्त किया कि इस प्रकार के कार्यक्रमों का उद्देश्य किसानों को नई तकनीकों से जोड़ना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। उन्होंने बताया कि नैनो-विज्ञान और कृषि के समन्वय से रोग प्रबंधन, पोषक तत्व प्रबंधन और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में नए अध्याय खुल रहे हैं।

कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथि डॉ. रामजी सिंह ने अपने व्याख्यान में नैनो-कृषि की महत्ता पर प्रकाश डाला और बताया कि कैसे यह तकनीक पारंपरिक कृषि प्रणालियों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ विवेक धामा ने कृषको से वार्ता के अनुभवों को आधार बनाकर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि किसानों के लिए यह समय तकनीकी रूप से सक्षम होने का है और विश्वविद्यालयों की यह जिम्मेदारी है कि वे किसानों को उपयोगी, व्यावहारिक और वैज्ञानिक प्रशिक्षण प्रदान करें।
डॉ. हितेश कुमार ने किसानों को गेहूँ में पाई जाने वाली प्रमुख बीमारियों—झुलसा, करनाल बंट, पाउडरी मिल्ड्यू, रतुआ आदि से बचाव के उपाय बताए। उन्होंने रोग पहचान के सरल तरीकों, बीजोपचार, फफूंदनाशक की मात्रा, और नैनोकवकनाशकों के प्रभावी उपयोग के बारे में मार्गदर्शन दिया। किसानों ने उनसे पत्ती रोगों, छिड़काव की मात्रा और रासायनिक दवाओं के सुरक्षित उपयोग पर कई प्रश्न किए।
डॉ. नीलेश कपूर ने नैनोकणों के निर्माण में प्रयुक्त हरित विधियों, धात्विक नैनोकणों और अन्य जैव-अनुकूल तकनीकों के बारे में विस्तार से बताया। किसानों को भली-भांति समझाया गया कि कैसे ये नैनोकण पौधों की सतह पर चिपककर रोगजनकों को निष्क्रिय करते हैं।

डॉ. राकेश सिंह सेंगर ने किसानों को बताया कि कैसे नैनो-आधारित तकनीकें न केवल गेहूँ बल्कि गन्ना, मकई, दालों और सब्जियों में भी उत्कृष्ट परिणाम देती हैं। उन्होंने कहा कि “भविष्य की खेती नैनो आधारित और पर्यावरण-मैत्री तकनीकों पर निर्भर होगी।”
डॉ आशुतोष त्रिपाठी ने नैनो आधारित उत्पादों द्वारा पशुओ में बांझपन की समस्या से णिद्दं के उपाय बताये साथ ही अपनी नवनिर्मित नैनो आधारित दवा द्वारा पशुओ में बांझपन समाप्त करने की विधि की विस्तृत जानकारी दी। डॉ राजेंद्र सिंह ने अंतिम व्याख्यान में उन्नत कीट प्रबंधन तकनीकों के बारे में जानकारी प्रदान की। साथ ही उन्होंने किसानो को कीट समस्या से निजात हेतु उपयुक्त जैविक एवं काम लागत और अधिक कारगर तकनीकों से से भी परिचित कराया।
जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों ने किसानों को नैनो-आधारित फफूंदनाशकों की अवधारणा, निर्माण प्रक्रिया, गुणधर्म एवं खेतों में उनके लाभों के बारे में विस्तार से बताया। नैनोकण-आधारित कवकनाशक नई पीढ़ी के ऐसे स्मार्ट समाधान हैं जो बहुत कम मात्रा में प्रयोग होकर अधिक प्रभावी परिणाम देते हैं। विशेषज्ञों ने नैनोकवकनाशकों की विशेषताओं पर प्रकाश डाला । यह पारंपरिक फफूंदनाशकों की तुलना में कम मात्रा में प्रभावी होते हैं। पौधों द्वारा जल्दी अवशोषित होकर रोगजनक फफूंदों पर सीधा प्रभाव डालते हैं। इनके उपयोग से अवशेष कम बनता है, जिससे खाद्य सुरक्षा बनी रहती है। यह पर्यावरण के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं क्योंकि कम मात्रा में प्रयुक्त होते हैं।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि इसमें उपस्थित किसानों को अपनी समस्याएँ खुलकर प्रस्तुत करने का अवसर मिला। ‘किसान विचार मंथन’ सत्र में किसानों ने गेहूँ एवं गन्ने की रोग समस्याएँ, उच्च उत्पादक किस्मों के चयन, नैनोफफूंदनाशको की उपयुक्त मात्रा, छिड़काव के सही समय, तथा जैविक एवं नैनो-आधारित कृषि विकल्पों की उपलब्धता से संबंधित अनेक प्रश्न उठाए। कार्यक्रम में शामिल किसान—श्री अनुज सिंह, श्री गुलदीप सिंह, श्री जयभगवान सिंह, श्री धर्मवीर सिंह सैनी (ग्राम पावरसा), श्री संजय सिंह (ग्राम भमौरी), श्री रणवीर सिंह (ग्राम पल्हेड़ा) आदि ने अपनी समस्याएँ तथा अनुभव साझा किए। वैज्ञानिकों ने इनके प्रश्नों के समाधान हेतु विस्तृत सुझाव प्रदान किए, जिससे कार्यक्रम अत्यंत उपयोगी और संवादात्मक बन गया। किसानों द्वारा प्रस्तुत समस्याओं का वैज्ञानिकों ने विस्तृत समाधान दिया। कई किसानों ने कहा कि उन्हें पहली बार नैनोकवकनाशकों के बारे में इतनी स्पष्ट, वैज्ञानिक और व्यावहारिक जानकारी मिली है।
यह कार्यक्रम न केवल किसानों के लिए उपयोगी साबित हुआ, बल्कि इसमें भाग लेने वाले स्नातक एवं परास्नातक छात्रों के लिए भी ज्ञानवर्धक रहा। छात्रों ने शोध कार्य, प्रयोगशाला तकनीकों तथा फील्ड-लेवल रोग प्रबंधन के बारे में विशेषज्ञों से विस्तृत जानकारी प्राप्त की। यह एक सफल, प्रभावी और भविष्य उन्मुख प्रशिक्षण कार्यक्रम रहा जिसने किसानों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने और नैनोकवकनाशकों जैसी उभरती तकनीकों से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
