
कब खतरा बनता है कोलेस्ट्रॉल Publish Date : 23/09/2026
कब खतरा बनता है कोलेस्ट्रॉल
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
रक्त में वसा/फैट का होना शरीर के लिए आवश्यक है। यह कोशिकाओं की बाहरी परत को मजबूती देता है। यह नुकसानदायक तब होता है जब रक्त में बैड कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स) बढ़ जाते हैं। इसके वजह से धमनियां ब्लॉक होने लगती हैं और एथेरोस्क्लेरोसिस की समस्या होती है, जिसे सामान्य भाषा में धमनियों का कड़ा होना कहते हैं। इसमें हार्ट अटैक या स्ट्रोक का जोखिम बढ़ता है।
हाल ही में हुए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि 35.5 प्रतिशत भारतीयों में लिपिड प्रोफाइल संबंधी गड़बड़ियां हैं। इनमें से 35.5 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्हें न कोलेस्ट्रॉल की समस्या है, न तो उच्च रक्तचाप न ही मोटापे की समस्या। ऐसे में कोलेस्ट्रॉल के बढ़े हुए स्तर को लेकर हमें सतर्क रहना चाहिए, चाहे यह केवल कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण से काम चल रहा हो। अगर सिर्फ एक पहलू पर ध्यान दिया जाए तो हो सकता है कि बात न बने। केवल सामान्य कोलेस्ट्रॉल में ही हो सकता है कि जोखिम बना रहे।
अगर आप भी सोच रहे हैं कि आपका कोलेस्ट्रॉल सामान्य है तो हार्ट अटैक या स्ट्रोक का जोखिम कम हो जाता है तो यह पूरी तरह सच नहीं है। ऐसे मरीजों को जो केवल सामान्य लिपिड प्रोफाइल या एलडीएल के बल पर ही अपना ध्यान रख रहे हैं, उनमें से कई व्यक्ति केवल धमनियों के ब्लॉक होने के कारण हार्ट अटैक के शिकार हुए हैं। दरअसल, हार्ट अटैक केवल एलडीएल या टोटल कोलेस्ट्रॉल जमा होने की वजह से नहीं होता, बल्कि धमनियों में सूजन, आनुवंशिक कारण, एलपी (a), एपोलिपोप्रोटीन (b), उच्च ट्राइग्लिसराइड्स, उच्च रक्तचाप, मोटापा और स्मोकिंग आदि घटक भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।
एलपीए है महत्वपूर्ण मार्कर
हार्ट की सेहत के लिए एलपीए महत्वपूर्ण मार्कर है। यह उच्च लिपिड प्रोफाइल वाले मरीजों में ज्यादा बनता है। रक्त में मौजूद एलपीए (लाइपोप्रोटीन ए), स्ट्रोक और एथेरोस्क्लेरोसिस का जोखिम बढ़ाने में मददगार है। स्ट्रोक की आशंका वाले मरीजों के लिए भी यह जिम्मेदार हो सकता है। इसके अलावा आनुवंशिक प्रभाव, स्ट्रोक और हृदय संबंधी रोग (सीवीडी) का इतिहास रहा है, तो एलपीए की जांच भी करा लेनी चाहिए।
कब खतरा बनता है कोलेस्ट्रॉल
डॉक्टर हेल्थ चेकअप, लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराते रहने की सलाह देते हैं ताकि हृदय रोग के खतरे की शुरुआत में ही पहचान की जा सके। बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए दवाइयों तो मौजूद हैं, पर ये स्थायी समाधान नहीं हैं। इसके लिए रोजमर्रा की आदतों में कुछ जरूरी बदलाव करने होंगे, जिससे होने वाली समस्याओं को टाला जा सकता है।
जीवनशैली स्वस्थ रखें और स्वास्थ्य जांच कराते रहें
जब हम कोलेस्ट्रॉल कम करने की बात करते हैं तो इसका अर्थ तेल या वसा को बंद करना नहीं होता। इसका अर्थ पेट नुकसान नहीं करना, लेकिन इसकी मात्रा भी सीमित होनी चाहिए।
भारतीयों में एलपीए कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ा रहता है। कुल कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी उच्च रहता है, साथ में पेट का मोटापा अधिक देखने में आता है। यह ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ाता है और इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा भी। ऐसे में जरूरी है कि हम जो खा रहे हैं, उसे लेकर सजग रहें और शारीरिक निष्क्रियता कम से कम रखें। रोजाना व्यायाम फायदेमंद है।
यह अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है और खराब को कम करता है। दवा उनके लिए है जिन्हें अधिक जोखिम है। कोलेस्ट्रॉल बढ़ने, एलपीए मार्कर के औसत स्तर अधिक होने पर सतर्कता बढ़ाने की जरूरत होती है। जिनका एलडीएल का स्तर 160-170 रहता है, तो उन्हें इसे कम करने की सलाह दी जाती है। हमारी सबसे पहली सलाह होती है जीवनशैली को ठीक करना। यदि नहीं कर पाए तो बाजार में दवाइयां मौजूद हैं। अपना रिस्क फैक्टर अवश्य जाने। ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल जांच कराते रहें। सावधानी ही सबसे अच्छा उपाय है, यह हमेशा याद रखना चाहिए।
लिपिड प्रोफाइल से ही कोलेस्ट्रॉल के स्तर का पता चलता है। इसमें मुख्य घटक माने जाते हैं:
कुल कोलेस्ट्रॉल: रक्त में कुल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा।
एचडीएल (गुड कोलेस्ट्रॉल): यह दिल के लिए अच्छा है। यह धमनियों के बीच कोलेस्ट्रॉल से लिवर में भेजता है व शरीर से बाहर निकाल देता है।
एलडीएल (बैड कोलेस्ट्रॉल): यह आर्टरीज में जमा होता है और हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण बनता है।
ट्राइग्लिसराइड्स: रक्त में मौजूद जोखिमकारक फैट है।
यह संभव है। यही कारण है कि हार्ट के मरीजों का आकलन करते समय केवल एलडीएल या टोटल कोलेस्ट्रॉल ही नहीं, बल्कि अन्य जोखिम कारकों के बारे में भी जानना उतना ही महत्वपूर्ण है। परिवार में हार्ट से जुड़ी बीमारियों का इतिहास भी इसमें शामिल है। बेहतर यही है कि कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखने के साथ डायबिटीज, हाई बीपी और धूम्रपान की आदतों को लेकर भी सचेत होने की जरूरत है।
ऐसे बढ़ जाएगा बैड कोलेस्ट्रॉल
लगातार लंबे समय तक बैठे रहना।
आहार के प्रति असावधानी व लापरवाही।
नियमित कसरत से दूरी।
अच्छी नींद में कोताही या नींद से जुड़ी स्वच्छता का ध्यान न रखना।
तनाव प्रबंधन न कर पाना।
धूम्रपान व अल्कोहल का सेवन।
ये हैं हार्ट-फ्रेंडली अच्छी आदतें
आहार में नियमित रूप से फल, सब्जियां, दालें व साबुत अनाज लें।
कसरत करें।
नमक की मात्रा भी कम रखें।
वजन नियंत्रण को प्राथमिकता में रखें।
धूम्रपान कम करेंगे या बंद करेंगे।
प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट शारीरिक गतिविधि करें।
अपनी दिनचर्या और जीवनशैली में आवश्यक बदलाव करना चाहिए।
कोलेस्ट्रॉल का स्तर
कुल कोलेस्ट्रॉल
200 से कम
सीमा रेखा (बॉर्डरलाइन)
200 से 239
उच्च (हाई)
240 या अधिक
एचडीएल (गुड)
40 से अधिक (पुरुष)
एलडीएल (बैड)
50 से अधिक (महिला)
100 से कम
सीमा रेखा
130 से 159
उच्च
160 से 189
बहुत उच्च
190 या अधिक
32% लाख भारतीयों की मौत के लिए जिम्मेदार है कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां। हर साल, इसका एक प्रमुख कारण एलडीएल कोलेस्ट्रॉल है। 40-69 वर्ष आयु वर्ग में होने वाली कुल मौतों में लगभग आधी के लिए कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां हैं जिम्मेदार।
लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।