वर्तमान समय में स्वास्थ्य के मापदंड      Publish Date : 19/09/2026

        वर्तमान समय में स्वास्थ्य के मापदंड

                                                                                               डॉ0 दिव्यंशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

आप स्वस्थ और तंदरूस्त हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि आप पूरी तरह स्वस्थ हैं। आज के समय में फैटी लिवर और प्री-डायबिटिक बेहद शांत तरीके से लोगों के शरीर में बीमारी की नींव तैयार कर रहे हैं। लक्षण स्पष्ट नहीं होने से लोग इनसे बेखबर बने रहते हैं। रूटीन जांच या समस्या बढ़ने पर ही लोग निदान का रास्ता चुनते हैं। हाइपरटेंशन, असामान्य कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लडप्रेशर और दिल की बीमारी आज किसी खास आयु वर्ग की स्वास्थ्य समस्या नहीं है, युवा, यहां तक कि बच्चे भी अब इन बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।

रिफाइंड कार्बाेहाइड्रेट, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, शुगर वाले ड्रिंक्स, सुस्त जीवनशैली, इंसुलिन रेजिस्टेंस अनेक बीमारियों की जड़ बन रहे हैं। एम्स के एक हालिया अध्ययन के अनुसार भारत में 38.6 प्रतिशत वयस्क और 35.4 प्रतिशत बच्चे फैटी लिवर की समस्या से प्रभावित हो चुके हैं। सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी के चेयरमैन डॉक्टर बी. के. राव बताते हैं कि चूंकि अब बच्चों में भी मोटापा एक बड़े स्तर पर बढ़ रहा है, इसलिए स्वास्थ्य समस्या होने पर उनका लिवर फंक्शन टेस्ट (एलएफटी) भी कराना चाहिए। इसके जरिए समय रहते ही, उपचार करना संभव है। उनके अनुसार, यदि आप किसी तरह का रिस्क फैक्टर है, तो बेहतर होगा कि लिवर को लेकर अपनी सतर्कता बढ़ा दें।

खराब जीवनशैली है बीमारी की जड़ः

मोटापे से एमएएसएलडी यानी मेटाबॉलिक लिवर डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीएटोटिक लिवर डिजीज का जोखिम भी बढ़ा है। यह दुनियाभर में लिवर की सबसे आम बीमारी है। इसे पहले नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) कहा जाता था। यह मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, हाई ट्राइग्लिसराइड या कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं वाले लोगों को अधिक प्रभावित करती है।

क्यों हो रहा कम उम्र में फैटी लिवर

मोटापा, डायबिटीज और खराब खानपान हर तीसरे युवा को अब फैटी लिवर की समस्या दे रहा है। चूंकि, शुरुआत में इसके लक्षण नहीं दिखते, इसलिए समय पर उचित उपचार मिलना मुश्किल हो जाता है। इसके लिए कैसे बढ़ाएं सतर्कता और जीवनशैली में क्या करें बदलाव-

फैटी लिवर के शुरुआती लक्षण

शुरुआत में लक्षण या तो नहीं होते या हल्के होने के कारण इसे ‘साइलेंट डिजीज’ या खामोश बीमारी के नाम से जाना जाता है। हालांकि कुछ लक्षण होने पर जांच करानी चाहिए। जैसे कि

  • लगातार थकान महसूस होना।
  • पेट में खासकर दाईं ओर खिंचाव महसूस होना।
  • भोजन के बाद पेट फूलना या भारी महसूस होना।

समझें फैटी लिवर की गंभीरता

  • सही समय पर उचित इलाज न होने पर समस्या गंभीर हो सकती है।
  • लिवर में सूजन।
  • फाइब्रोसिस (लिवर टिश्यू पर निशान)।
  • सिरोसिस (लिवर को नुकसान)।
  • लिवर फेल होने का खतरा।

युवा भारतीयों में फैटी लिवर होने के कारण

खराब जीवनशैलीः देश की बड़ी युवा आबादी अब शारीरिक तौर पर अपनी सक्रियता बहुत कम कर चुकी है। लोग नियमित शारीरिक व्यायाम, बाहरी गतिविधियों से दूर होने लगे हैं। लंबे समय तक बैठे रहना (काम/पढ़ाई/स्क्रीन के सामने) की आदत बनती जा रही है। जीवनशैली में निष्क्रियता आने के चलते मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, जिससे लिवर और अन्य अंगों में फैट जमा होने लगता है।

मोटापा और वजन बढ़नाः पेट के आसपास जमा फैट और वजन बढ़ने की समस्या सीधे तौर पर फैटी लिवर से जुड़ी हुई है। अतिरिक्त फैट मेटाबॉलिक असंतुलन का कारण बनता है। यह स्थिति अब किशोरों और युवाओं में भी काफी देखी जा रही है।

टाइप-2 डायबिटीजः इंसुलिन रेजिस्टेंस फैटी लिवर का मुख्य कारण है। इससे ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाता है, जो लिवर में फैट जमा होने की स्थिति पैदा करता है। युवाओं में इसका संबंध प्री-डायबिटीज और टाइप-2 डायबिटीज से भी होता है, इसलिए शारीरिक सक्रियता आवश्यक है।

आहार की समस्याः आजकल जंक फूड, फास्ट फूड, सॉफ्ट ड्रिंक्स, पैकेज्ड जूस, रिफाइंड कार्बाेहाइड्रेट की अधिकता और पोषक तत्वों की कमी से लिवर में फैट जमा होने लगता है।

तनाव और खराब नींदः तनाव और नींद का अनियंत्रित पैटर्न भी फैटी लिवर की समस्या बढ़ाता है। कॉर्टिसोल (तनाव हार्माेन) के बढ़ने से मेटाबॉलिज्म बाधित होता है। वहीं नींद के खराब होने के चलते फैट का रेगुलेशन भी अनियंत्रित होता है।

किन लोगों को है अधिक जोखिमः

  • जिनका वजन बहुत अधिक है।
  • जिन्हें टाइप 2 डायबिटीज या प्री-डायबिटीज है।
  • हाई कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड्स है।
  • बैठकर काम करने या सुस्त जीवनशैली है।
  • जिन लोगों को अधिक जंक फूड या मीठा खाने की आदत है।

जीवनशैली का बिगड़ा रूप है फैटी लिवर

कम उम्र में फैटी लिवर होने के पीछे दो मुख्य कारण हैं - मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता। ऐसे में इसकी गंभीरता समझें। भारत में डायबिटीज, थायराइड, कोलेस्ट्रॉल भी जिम्मेदार होते हैं। प्रतिशत तथा हो चुका है। यही समस्याओं की जड़ है। बच्चे उच्च कैलोरी वाले और पैकेज्ड फूड पर निर्भर होते जा रहे हैं। उनका व्यायाम-कसरत करना कम हो गया है। यही आदत कम उम्र में ही बीमारी दे रही है। चूंकि फैटी लिवर में दिनचर्या में कोई अधिक समस्या नहीं होती, इसलिए समय पर उपचार नहीं हो पाता।

समस्या बढ़ने पर पेट के दाहिने तरफ ऊपरी हिस्से में खिंचाव जैसा महसूस हो सकता है। लिवर की सेहत जानने के लिए अल्ट्रासाउंड या एलएफटी आवश्यक है। फैटी लिवर से बचने के लिए भोजन में प्रोटीन, फल, सलाद को बढ़ाएं और सैचुरेट फैट व कैलोरी कम रखें। बच्चों की फोन या टैबलेट पर निर्भरता कम करें। कुछ लोग मोटापे के शिकार हैं और अल्कोहल भी लेते हैं, इससे जोखिम बढ़ता है। जरूरी है स्वस्थ आदतों का विकास करें और निरोग रहें।

जीवनशैली में सुधार ही है मुख्य इलाज

  • वजन कम करने से लिवर का फैट कम होता है।
  • स्वस्थ भोजन व व्यायाम शरीर को सही रखता है।
  • नियमित स्वास्थ्य जांच इलाज में मददगार है।

युवाओं के लिए बचाव के टिप्स

  • स्वस्थ आहार की आदत डालें, भोजन में फल, सब्जियां व फाइबर शामिल करें। हेल्दी फैट (नट्स, बीज, मछली) लाभकारी हैं।
  • चीनी, रिफाइंड कार्ब, जंक और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से बचें।
  • सप्ताह में 150 मिनट व्यायाम करें, पैदल चलें, साइकिल चलाएं या एरोबिक्स करें।
  • वजन को नियंत्रित रखें।
  • पेट की चर्बी कम करें।
  • 7-8 घंटे की अच्छी नींद लें और तनाव पर काबू रखने के लिए योग या ध्यान करें।

डॉक्टर से कब मिलें

  • लगातार थकान महसूस होने पर
  • लिवर फंक्शन की रिपोर्ट असामान्य होने पर
  • मोटापा और मेटाबॉलिक रिस्क फैक्टर होने पर
  • फैमिली हिस्ट्री होने पर शुरुआती मेडिकल सलाह बीमारी से बचा सकती है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।