
जीवन प्रत्याशा तो बढ़ी परन्तु रोगों के साये में हैं जीने को विवश Publish Date : 08/09/2026
जीवन प्रत्याशा तो बढ़ी परन्तु रोगों के साये में हैं जीने को विवश
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
उम्र तो बढ़ी, पर लोग रोगों के साये में बिता रहें हैं जीवन के अंतिम साल। वर्तमान समय में स्वास्थ्य के प्रति लगतार बढ़ती जागरूकता के चलते इंसान की उम्र तो लंबी हो रही है, लेकिन उसकी सेहत कमजोर पड़ती जा रही है। विज्ञान और तकनीक के हथियार ने हमें जीवन के कुछ अतिरिक्त साल दिए हैं, मगर यह अतिरिक्त साल खुशहाली के बजाय बीमारियों और लाचारी के साये में बीत रहे हैं। मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट पब्लिक हेल्थ’ में प्रकाशित ‘बल ग्लोब बर्डन ऑफ डिजीज’ 2023 के अध्ययन में यह कड़वी सच्चाई सामने आई है कि 1990 दशक के बाद से दुनिया भर में ‘मॉर्बिडिटी गैप’ (कुल जीवन प्रत्याशा और स्वस्थ जीवन प्रत्याशा के बीच का अंतर) तेजी से बढ़ा है।
वर्ष 2023 में दुनिया भर में लोग अपनी कुल जिंदगी का औसतन 14.5 प्रतिशत हिस्सा अरूवस्थता में बिता रहे हैं, जो वर्ष 1990 में 13.6 प्रतिशत था। यह अंतर केवल जीवन के अंतिम पड़ाव में ही नहीं बल्कि पूरी तरह से वयस्कता के दौरान भी देखा जा रहा है। 2023 में स्वस्थ जीवन प्रत्याशा और कुल जीवन प्रत्याशा के बीच 10.7 साल का अंतर था, जो 1990 में 8.8 साल था। भारत के सन्दर्भ में आंकड़े काफी संवेदनशील तस्वीर पेश किये जाते हैं। वर्ष 1990 में भारत में कुल जीवन प्रत्याशा 58.5 वर्ष और स्वस्थ जीवन प्रत्याशा 50.1 वर्ष की थी, वर्ष 1990 के बाद पूरे विश्व में मर्दाना गैप (यानी कुल जीवन प्रत्याशा और स्वस्थ जीवन प्रत्याशा के बीच का अंतर) तेजी से बढ़ा है।
पीठ दर्द, मानसिक तनाव और मोटापा
दुनिया भर में महिला और पुरुष दोनों के लिए स्वस्थ जीवन जीने में सबसे बड़ा योगदान प्लास्टिक और पत्थरों के भंडार (विशेषकर कमर व शरीर के मुख्य हिस्सों का दर्द) का रहा है। इसके बाद अवसाद और चिंता जैसे मानसिक विकार सबसे बड़ी समस्या उभर कर सामने आती है। दवाइयों के अनुसार, बेकार में बाटने वाले इस साल मुख्य रूप से ऐसी फिजियोलॉजी से जुड़े हुए हैं जिन्हें रखा या नियंत्रित किया जा सकता है। ग्लोबल लेवल पर हाई फास्टिंग ब्लड शुगर और हाई बड़ी मास स्टाक (मोटापा) ऐसे मुख्य जोखिम कारक हैं जो सेहत को दीमक की तरह चाट रहे हैं।
जीवन प्रत्याशा 50.1 वर्ष था, यानी रचनात्मकता का अंतर 8.4 वर्ष था। वर्ष 2023 तक आते-आते भारत का औसत जीवन प्रत्याशा तो उछाल 71.6 वर्ष हो गया, लेकिन स्वस्थ जीवन प्रत्याशा केवल 61.0 वर्ष तक ही पहुंच गया। इसका मतलब है कि आज एक भारतीय अपने जीवनके औसत 10.6 साल के बीच अस्थिर और शारीरिक रूप से बीमार होने पर मजबूर है। एक अध्ययन में यह भी सामने आया है कि दुनिया के हर कोने में महिलाएं पुरुषों की तुलना में लंबी जिंदगी तो जी रही हैं, लेकिन इसमें उनकी आबादी का एक बड़ा हिस्सा रोगों की परेशानियों को ढेलने के लिए विवश है।
लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।