विश्व अस्थमा दिवस पर विशेष      Publish Date : 06/05/2026

              विश्व अस्थमा दिवस पर विशेष

                                                                                                                                         डॉ0 दिव्यांशु सेंगर

मेडिकल ऑफिसर डॉ0 दिव्यांशु सेंगर ने बताया कि अस्थमा से वैश्विक स्तर पर मृत्यु दर 13 प्रतिशत है जबकि भारत में यह दर 43 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, जो कि चिंताजनक है। क्योंकि इसमें दवा की कम मात्रा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है और दुष्प्रभाव भी कम होते हैं।

डॉ0 दिव्यांशु ने बताया कि विश्व अस्थमा दिवस प्रति वर्ष मई के पहले मंगलवार को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य अस्थमा की बीमारी और उसकी देखभाल के बारे में जागरूकता फैलाना है। इस वर्ष की थीम अस्थमा से पीड़ित हर व्यक्ति के लिए सूजन रोधी एनएलआर की उपलब्धता अब भी एक अत्यंत आवश्यक जरूरत है। देश में लगभग 4 करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं, जो गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है। अस्थमा आनुवांशिक रोग है जिसमें श्वास नलिकाएँ अति संवेदनशील हो जाती हैं।

                                           

धूल धुआं, नमी, मौसम परिवर्तन, सर्दी, जुकाम, धूम्रपान, फास्ट फूड, तनाव, व्यायाम पालतू जानवर और परागकण जैसे कारक सूजन पैदा करते हैं, जिससे सांस लेने में कठिनाई होती है।

अस्थमा के लक्षण

  • बार बार सांस फूलना।
  • सांस लेते समय सिटी जैसी आवाज आना।
  • रात या सुबह ज्यादा खासी होना।
  • सीने में जकड़न या भारीपन रहना।
  • शारीरिक विकास में बाधा होना।

अस्थमा दौरे रोकने के क्या है उपाय

मौसम बदलने से चार से छह सप्ताह पहले ही सजग हो जाना चाहिए और उचित चिकित्सा परामर्श लेना चाहिए। इन्हेलर व दवाएं विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही लेनी चाहिए। अपने फेफड़ों को मजबूत बनाने के लिए प्राणायाम जैसे सांस के व्यायाम करें यदि बलगम गाढ़ा हो गया है, खांसी, घरघराहट और सांस  अस्थमा के मरीज समानता दो प्रकार के इन्हेलर का प्रयोग करते हैं। सूजन कम करने वाले सूजन रोधी इन्हेलर का नियमित उपयोग अत्यंत आवश्यक है क्योंकि स्वास नलकाओं में पहले सूजन उत्पन्न होती है जिसके बाद ही सूजन विकसित होती है।

भारत में अक्सर देखा जाता है कि सूजन रोधी एनएलआर के स्थान पर केवल सूजन कम करने वाले एनएलआर का अधिक उपयोग होता है, जो दीर्घकाल में पर्याप्त नहीं है, अगर यदि सूजन रोधी इन्हेलर का नियमित और निरंतर उपयोग किया जाए तो अस्थमा अटैक की आशंका काफी हद तक कम की जा सकती है।

                                           

डॉ0 दिव्यांशु सेंगर ने बताया कि प्रिवेंटिव इन्हेलर नियमित और सही तरीके से लेने से अस्थमा के अटैक का खतरा 80% तक कम हो जाता है। कम से कम बार इन्हेलर लेने पर जोर दिया गया है। रिलीवर इन्हेलर सांस फूलने या अटैक आने पर तुरंत राहत देते हैं। यह सांस नली की मांसपेशियों को तुरंत फैला देते हैं जिससे सांस लेने की परेशानी दूरहो जाती है। प्रीमेटिव इन्हेलर सांस की नली की सूजन को कम करने के लिए नियमित रूप से लिया जाता है और इससे अटैक की सम्भावना कम हो जाती है। उन्होंने बताया कि इस इन्हेलर को लगातार लेने से कोई साइड इफ्ट भी नहीं होते हैं।

यह फेफडों की कार्य क्षमता को बढ़ाते हैं और यदि इनका नियमित प्रयोग किया जाए तो अस्थमा के अटैक की सम्भावानाएं काफी हद तक कम हो जाती हैं।

बचाव और सावधानियां के लिए क्या करें

  • धूल धुआं, ठंडी हवा, पराकणों और संक्रमण से बचाव के लिए मास्क लगाएं।
  • बच्चों को रोएदार कपड़े न पहनाएं और न ही इस प्रकार के खिलौने उन्हें दें।
  • पंख वाले या रे शम के तकियों का प्रयोग न करें।
  • घर के अन्दर ताजे फल या फूल वाले पौधों को न रखें।
  • रोगी को एसी या कूलर वाले से एकदम गर्म वातावरण में ले जाने से परहेज करें।
  • इत्र, परफ्यूम या डियोडरेंट आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए।
  • धूम्रपान और एल्कोहल आदि का सेवन करने बचें।
  • उच्च जोखिम वाले मरीजों में वार्षिक फ्लू वैक्सीनेशन अवश्य ही कराएं।

डॉ0 दिव्यांशु सेंगर ने बताया कि अब स्मार्ट एनएलआर भी आने लगे हैं। इन्हें डिजिटल एनएल भी कहा जाता है। इनमें लगे छोटे सेन्सर ब्लूटूथ के जरिए स्मार्टफ़ोन ऐप से जुड़े रहते हैं। यह रिकॉर्ड करता है कि दवा कब ली और इनर को सही तरीके से अंदर खींचा या नहीं, दवा लेना भूल जाते हैं तो फ़ोन पर रिमाइंडर भेजता है। इससे डॉक्टर को सटीक डेटा मिलता है। मरीज की बीमारी कितनी नियंत्रित है नई तकनीकों में बायोलॉजिकल थेरेपी ब्रोकियल थर्माप्लास्टिटी फैनो टेस्टिंग भी काफी कारगर है।

शहरों में वायु प्रदूषण काफी रहने के कारण भी यह समस्या बढ़ रही है क्योंकि प्रदूषण कार्यों से उड़ने वाली धूल, फसल अवशेष व कचरा आदि जलाने से उठने वाला धुआं अस्थमा में ट्रिगर का काम कर रहा है। वयस्कों की तुलना में बच्चों में अस्थमा अधिक मिल रहा है। दौड़ने, खेलने पर खांसी आना, सांय-सांय की आवाज़ निकलना, गले में गड्ढा बनने जैसी लक्षण 12 साल तक के बच्चों में देखे जा रहे हैं, 4 से 8 फीसदी बच्चे इस बीमारी से प्रभावित होते हैं। वयस्कों में भी यही स्थिति है। इन्हेलर से दवा फिफड़ों तक पहुंचती है, इसलिए डॉक्टर इन्हेलर लेने की बात करते हैं। इसका साइड इफेक्ट भी नहीं होता है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।