
जीन परिवर्तन के आधार पर दवा देने से दोबारा नहीं होगी टीबी Publish Date : 15/01/2026
जीन परिवर्तन के आधार पर दवा देने से दोबारा नहीं होगी टीबी
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
टीबी उन्मूलन का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में इस शोध ने नई उम्मीद जगाई है। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के फार्मेसी विभाग की प्रोफेसर डा. वैशाली पाटिल और के आर मंगलम विश्वविद्यालय गुरुगाम की प्रोफेसर डा. सरोज ने शरीर में पाए जाने वाले नैट-2 जीन पर अध्ययन कर निष्कर्ष दिया है कि टीबी के उपचार में व्यक्तिगत डोजिंग (प्रिसिजन मेडिसिन) ज्यादा प्रभावी है। इस जीन परिवर्तन के आधार पर अलग-अलग कैटेगरी में दवाएं देने से मरीजों में दोबारा टीबी संक्रमण का खतरा न्यूनतम रह जाएगा और लिवर को भी नुकसान नहीं पहुंचेगा।
शोध टीम ने टीबी मरीज का डिजिटल हेल्थ रिकार्ड बनाने की सलाह दी है, जिसमें संपूर्ण जीनोम या विशिष्ट जीन पैनल की आनुवांशिक जानकारी, बीमारी की हिस्ट्री, जीवनशैली और कारकों का विवरण और नैट-2 जीन का परीक्षण शामिल होगा।
शोधार्थी डा. वैशाली पाटिल ने बताया कि टीबी के हर मरीज में कारण, लक्षण, संक्रमण की गंभीरता और दवाओं पर प्रतिक्रिया अलंग-अलग हो सकती है। इसलिए एक जैसी दवा सभी मरीजों के लिए हमेशा प्रभावी नहीं रहती। ऐसे में व्यक्तिगत डोजिंग (प्रिसिजन मेडिसिन) की आवश्यकता बढ़ रही है। शोध के लिए नैट-2 जीन की थ्री डी संरचना का अध्ययन किया गया है। एआई टूल के जरिए शोध में फार्माकोजीनोमिक्स यानी शरीर का दवा के साथ व्यवहार और म्यूटेशन इंफारमैटिक्स को एकीकृत करके पता किया गया कि जीन में होने वाले परिवर्तन किस प्रकार दवा के असर को प्रभावित करते हैं।

यह जीन प्रोटीन डाटा बैंक से लिया गया है। टीबी के लिए सामान्य तौर पर चार दवाओं वालारेजिमेन आइसोनियाजिड, रिफांपिसिन, पिराजिनामाइंड, इथामबुटोल उपयोग किया जाता है। रेजिस्टेंस टीबी के लिए आल-ओरल शार्ट और लांग रेजिमेनप्रयोग किए जाते हैं। जिनमें आधुनिक दवाएं बेडाक्विलीन, लिनेजोलिड शामिल हैं। उपचार के लिए डाट्स तकनीक प्रयोग की जा रही है।
नैट-2 जीन दवाओं की सक्रियता करता है तय
शोधार्थी ने बताया कि शरीर में टीबी की दवा आइसोनियाजिड के एसिटिलेशन प्रक्रिया को नैट-2 जीन नियंत्रित करता है। यह जीन एक एंजाइम है, जो दवा को तोड़कर शरीर में उसकी सक्रियता तय करते हैं। नैट-2 जीन के अलग-अलग प्रकार लोगों को फास्ट, इंटरमीडिएट, या स्लो एसीटिलेटर्स बनाते हैं। स्लो एसीटिलेटर व्यक्तियों में दवा धीरे टूटती है। जिससे इनके शरीर में दवा की मात्रा बढ़ने से लिवर को भारी नुकसान हो सकता है।
फास्ट एसीटिलेटर लोग दवा को बहुत तेजी से पचाते हैं, जिससे दवा का स्तर कम होने से उपचार की प्रभावशीलता घट सकती है।
इसलिए नैट-2 जीन मरीजों में दवा की सही खुराक, सुरक्षा और व्यक्तिगत डोजिंग (प्रिसिजन मेडिसिन) उपचार तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यह शोध जर्नल ड्रग डिस्कवरी टुडे में प्रकाशित हुआ है। इसमें फार्माकोलाजी, टाक्सिकोलाजी और फार्मास्यूटिक्स से संबंधित शोध प्रकाशित होते हैं।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
