
अब मधुमेह में भी आम को कहें हां Publish Date : 13/12/2025
अब मधुमेह में भी आम को कहें हां
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
रसीले आम देखकर हर किसी का मन उन्हें खाने को करता है, पर शुगर वाले मन मसोस कर रह जाते हैं। लेकिन, अब ऐसा करने की जरूरत नहीं है। शुगर के मरीज भी दशहरी, चौसा, लंगड़ा जैसे रसीले स्वादिष्ट आमों का आनंद ले सकते हैं। आधुनिकता के साथ जीवनशैली में अनेक बदलाव आए हैं। खान-पान से लेकर आहार-व्यवहार भी बदले। सोने-जगने का समय पहले जैसा नहीं रहा। इन सबका असर हमारी सेहत पर पड़ रहा है। अनेक बीमारियों ने लोगों को गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया। मौसमी फल और सब्जियों का आनंद लेने वाले वर्जनाओं में बंध गए। शुगर के चलते जिह्वा को नियंत्रित करने की कड़ी चुनौती है।
लेकिन, एक नए शोध की मानें तो अब डायबिटीज ग्रस्त लोग भी आम का आनंद ले सकेंगे। दरअसल, फोर्टिस सी-डीओसी हास्पिटल फार डायबिटीज एंड एलायड साइंसेज और नेशनल डायबिटीज, ओबेसिटी एंड कोलेस्ट्राल फाउंडेशन (एन-डीओसी) के दो संयुक्त अध्ययनों से स्पष्ट है कि नियंत्रित मात्रा में आम के सेवन से न केवल टाइप-टू डायबिटीज में ग्लाइसेमिक (रक्त शर्करा) कंट्रोल में रहता है, बल्कि शरीर का फैट भी कम होता है।

ब्रेड की तुलना में कम बढ़ा ग्लूकोज का स्तरः' स्टडी विद कंटीन्युअस ग्लूकोज मानिटरिंग, एंड ओरल टालरेंस टेस्ट' में 95 प्रतिभागी शामिल किए गए। इनमें 45 को टाइप-2 डायबिटीज थी और 50 सामान्य लोग रहे। मधुमेह-ग्रस्त और मधुमेह-मुक्त दोनों ही श्रेणियों के लोगों को 250 ग्राम आम (सफेदा, दशहरी और लंगड़ा) या समान मात्रा में कैलोरी ब्रेड का सेवन कराया गया। दो घंटे तक परीक्षण और मल्टीपल ब्लड शुगर का आकलन किया गया। कंटीन्युअस ग्लूकोज मानिटरिंग (तीन दिन तक लगातार सेंसर आधारित शुगर मानिटरिंग) की मदद से प्रतिभागियों का मूल्यांकन किया गया।
सफेदा, दशहरी और लंगड़ा के ग्लूकोज और सफेद ब्रेड के तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि ओरल टालरेंस टेस्ट में दोनों ही श्रेणियों के लोगोंमें आम का सेवन करने से भी ब्रेड का सेवन करने जितना ही या उससे कम ग्लाइसेमिक रिस्पांस देखा गया।
कंटीन्युअस ग्लूकोज मानिटरिंग में पाया गया कि आम खाने के बाद भी मधुमेह से ग्रस्त प्रतिभागियों में तीन दिनों तक नुकसानदेह ग्लूकोज की परिवर्तनशीलता (मीन एम्प्लिट्यूड आफ ग्लाइसेमिक एक्सकर्जन) ब्रेड के सेवन के मुकाबले काफी कम रही।

शरीर का वजन हुआ कम, कमर की चौड़ाई भी घटी: जर्नल आफ डायबिटीज एंड मेटाबोलिक डिसआर्डर में प्रकाशित दूसरी स्टडी 'आठ सप्ताह तक रैंडमाइज्ड ट्रायल' में टाइप-2 डायबिटीज से ग्रसित 35 वयस्क शामिल किए गए। सभी को आठ सप्ताह तक प्रतिदिन नाश्ते में 250 ग्रामसफेदा या दशहरी आम या व्हाइट ब्रेड दिया गया। प्रतिभागियों में औसत ग्लूकोज का दीर्घकालिक माप फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज (एचबीएसी) कम हुआ। साथ ही इंसुलिन रेजिस्टेंस (एचओएमए आइआर तथा आंतरिक रूप से निर्मित होने वाले इंसुलिन के प्रभावी होने का संकेतक) में गिरावट महसूस की गई।
आम का सेवन करने से न केवल शरीर का वजन कम हुआ, बल्कि कमर की चौड़ाई भी घटी। यानी पेट और त्वचा पर जमा हुई चर्बी प्रभावी रूप से कम हुई। वहीं एचडीएल यानी गुड कोलेस्ट्राल लेवल में भी सुधार देखा गया।
सामान्य अवधारणा के उलट हैं परिणामः देश में टाइप-2 डायबिटीज वाले मरीजों का आंकड़ादुनिया के अन्य देशों की तुलना में अधिक है। आम देश में पसंद किया जाने वाला सबसे लोकप्रिय फल है, पर शुगर की मात्रा के चलते आमतौर पर इसे मधुमेह रोगियों की खुराक में शामिल नहीं किया जाता है। दोनों अध्ययनों के नतीजे चौंकाने वाले रहे। खान-पान को लेकर प्रचलित सामान्य अवधारणा से उलट ये शुगर मरीजों को भी आम खाने की सलाह देते हैं।
अब व्हाइट ब्रेड जैसे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स के स्थान पर इन्हें संतुलित, कैलोरी-रेस्ट्रिक्टेड मील प्लान में शामिल किए जाने योग्य माना जा सकता है। 'स्टडी विद कंटीन्युअस ग्लूकोज मानिटरिंग एंड ओरल टालरेंस टेस्ट' जहां यूरोपियन जर्नल आफ क्लीनिकल न्यूट्रिशन में प्रकाशन के लिए स्वीकृत हुआ है तो वहीं 'आठ सप्ताह तक रैंडमाइज्ड ट्रायल' जर्नल आफ डायबिटीज एंड मेटाबोलिक डिसआर्डर्स के छह अगस्त के अंक में प्रकाशित है।
क्लीनिकल ट्रायल के लिए मिली मंजूरी: अध्ययन का नेतृत्व फोर्टिस सी-डीओसी हास्पिटल फार डायबिटीज एंड एलायड साइंसेज के एक्जीक्यूटिव चेयरमैन व डायरेक्टर पद्मश्री डा. अनूप मिश्रा ने किया। वहीं फोर्टिस सी-डीओसी हास्पिटल की डा. सुगंधा केहर ने सहयोग किया। आर्थिक सहयोग इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च की तरफ से किया गया। दोनों अध्ययन फोर्टिस सी-डीओसी हास्पिटल व नेशनल डायबिटीज, ओबेसिटी एंड कोलेस्ट्राल फांउडेशन (एन-डीओसी), नई दिल्ली में कराए गए। इनके क्लीनिकल ट्रायल के लिए नैतिक मंजूरियां मिल चुकी हैं, जिन्हें Clinical Trials.gov पर रजिस्टर भी किया गया है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
