अंगूर की खेती      Publish Date : 09/05/2026

                        अंगूर की खेती

                                                                                                                  प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य

अंगूर की खेती (विटीकल्चर) एक अत्यधिक लाभदायक बागवानी व्यवसाय है, जो एक एकड़ में प्रति वर्ष ₹5-7 लाख तक की कमाई दे सकती है। इसके लिए गर्म, शुष्क जलवायु और अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी (चभ् 6.5-8.5) उपयुक्त है। नासिक, महाराष्ट्र, भारत में अंगूर का प्रमुख केंद्र है। सही तकनीक और उचित देखभाल (छंटाई, सहारे का ढांचा) से 30 वर्षों तक अंगूर की अच्छी उपज ली जा सकती है।

खेती के मुख्य बिंदु:

                                    

उन्नत किस्में: थॉम्पसन सीडलेस (सबसे लोकप्रिय), शरद सीडलेस, पर्लेट, और बंगलौर ब्लू आदि अंगूर की उन्नत किस्में हैं।

मिट्टी और तैयारी: अच्छी जल निकासी वाली दोमट या रेतीली मिट्टी अंगूर की खेती के लिए उपयुक्त है । खेत की गहरी जुताई कर 2x2 फीट के गड्ढे खोदकर गोबर की खाद और उर्वरक देना चाहिए।

रोपण: पौधे 4 फीट की दूरी पर और कतारें 8-10 फीट की दूरी पर लगाएं।

जलवायु: 15°C से 40°C तापमान अंगूर की खेती के लिए उत्तम है।

सिंचाई और प्रबंधन: अंगूर की खेती के लिए पानी की कम आवश्यकता होती है, लेकिन ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) सबसे अच्छी है। बेलों को सहारे (मंडप या वायर सिस्टम) की जरूरत होती है।

कटाई: लगभग 120-160 दिनों में फसल तैयार हो जाती है।

फायदे और सब्सिडी:

                                      

एक बार लगाने पर 30 साल तक पैदावार और सरकारी योजनाओं के तहत 40% से 50% तक सब्सिडी।

पराग कणों की गड़बड़ी से बनते हैं बीज- रहित अंगूर

बीज-रहित अंगूरों के पतले छिलके, मीठे स्वाद और बेहतर बनावट के कारण इसकी मांग तेजी से बढ़ी है। लेकिन, बीज-रहित अंगूर बनने की जैविक प्रक्रिया अभी तक स्पष्ट नहीं थी। पुणे स्थित आघारकर अनुसंधान संस्थान और सावित्रीबाई फुले ने अब इसका खुलासा कर दिया है। उन्होंने पाया कि पराग कणों के सही से विकसित नहीं होने के कारण निषेचन में बाधा और अंगूर में कई अहम जीनों के कम सक्रिय होने से बीज-रहित अंगूर बनते हैं। एआरआई-516 नामक ज्यादा पैदावार वाली अंगूर की किस्म से बने बीज-रहित पौधों का अध्ययन करने के बाद शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं।

अंगूरों के बीज रहित होने के गुण को दुनिया भर के उपभोक्ताओं और उद्योग जगत द्वारा खूब सराहा जाता है। इस अध्ययन में, अंगूर में पराग बध्यता से जुड़े जीनों की पहचान की गई है। इससे भविष्य में बेहतर गुणवत्ता और अधिक उपज देने वाली अनुकूल किस्मों के बीज-रहित अंगूर विकसित किए जा सकेंगे। इससे किसानों और बागवानी क्षेत्र को काफी फायदा होगा।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।