कभी आईआईटी-आईआईएम नहीं गए, मात्र बीस हजार रुपये से लाए कूरियर जगत में क्रांति      Publish Date : 06/11/2025

कभी आईआईटी-आईआईएम नहीं गए, मात्र बीस हजार रुपये से लाए कूरियर जगत में क्रांति

                                                                                                                                                                                        प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

आपका हर प्रयास ही आपके लक्ष्य की ओर बढ़ता एक कदम होता है। लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी है अपनी मानसिकता को सकारात्मक बनाए रखना और अपनी असफलताओं का दृढ़ता के साथ सामना करना। कुछ ऐसी ही कहानी है मूल्यों के साझा रूप से सृजन करने में दृढ़ विश्वास रखने और भारतीय कूरियर उद्योग में पहली बार 'फ्रेंचाइजी अवधारणा' की शुरुआत करने वाले डीटीडीसी कूरियर कंपनी के संस्थापक सुभाशीष चक्रवर्ती की।

सुभाशीष चक्रवर्ती ने अपनी असफलताओं के आगे हार नहीं मानी, बल्कि उन्हें अपनी सफलता का सारथी बनाया। एक समय ऐसा था, जब सुभाशीष के पास अपने बिजनेस को शुरू करने के लिए बिल्कुल पैसे नहीं थे, लेकिन लगभग 2,000 करोड़ रुपये की नेटवर्थ वाली कंपनी डीटीडीसी खड़ी कर उन्होंने कड़ी मेहनत, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प का नायाब उदाहरण पेश किया है। जुनून और धीरज के साथ, उन्होंने एक आम धारणा बनाने की दिशा में काम किया कि लोग सीमित संसाधनों के साथ भी सफल हो सकते हैं।

नहीं की आईआईटी या आईआईएम से पढ़ाई

सुभाशीष चक्रवर्ती का जन्म कोलकाता के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। कभी आईआईटी या आईआईएम नहीं गए, बल्कि उन्होंने रामकृष्ण मिशन रेजिडेंशियल कॉलेज से केमिस्ट्री की पढ़ाई की है। उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। यही कारण है कि उन्होंने छात्रवृत्ति के जरिये अपनी पढ़ाई पूरी की है। वह केमिस्ट्री में गोल्ड मेडलिस्ट भी हैं।

मां के गहने तक बेचे

साल 1990 में सुभाशीष ने विश्वसनीय कूरियर सेवाओं की बढ़ती मांग को देखते हुए डीटीडीसी (डेस्क टू डेस्क कूरियर ऐंड कार्गो) कंपनी की स्थापना की। उन्होंने 20,000 रुपये के मामूली निवेश से अपना बिजनेस शुरू किया। उन्हें कई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती व्यापार को बढ़ाने के लिए वित्त को लेकर थी, क्योंकि बैंकों ने उनके व्यवसाय को लोन देने से मना कर दिया था। पैसों के लिए सुभाशीष को अपनी मां के गहने तक बेचने पड़े।

कॉलेज के दौरान नौकरी भी की

अपने कॉलेज के दिनों में, सुभाशीष ने एक प्रमुख बीमा कंपनी पीयरलेस में नौकरी भी की। उनके समर्पण और परिश्रम के कारण उन्हें 1981 में बंगलूरू में कंपनी के बीमा परिचालन के विस्तार का कार्यभार सौंपा गया। हालांकि, उसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इसके बाद साल 1987 में सुभाशीष ने एक साहसिक कदम उठाया और केमिकल डिस्ट्रीब्यूशन के व्यवसाय में कदम रखा।

डाक सेवा की अक्षमताओं के कारण उनका बिजनेस असफल रहा। उन्होंने डाक सेवाओं और ग्राहकों के बीच के अंतर की पहचान की। यही उनके लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसके बाद उन्होंने कूरियर सेवा क्षेत्र की जरूरत को देखते हुए इसमें किस्मत आजमाने का निश्चय किया।

फ्रेंचाइजी मॉडल ने दिलाई सफलता

                                                                 

1991 में, सुभाशीष ने एक गेम चेंजिंग फ्रेंचाइज मॉडल की अवधारणा पेश की। उनका यह नवाचार क्रांतिकारी साबित हुआ। इससे डीटीडीसी का तेजी से विस्तार हुआ। कंपनी ने न केवल खुदरा ग्राहकों को सेवाएं प्रदान कीं, बल्कि विप्रो, इंफोसिस और टाटा समूह जैसी दिग्गज कॉरपोरेट कंपनियों के साथ भी साझेदारी की। दक्षिण भारत से बिजनेस की शुरुआत करने वाली यह कंपनी फिलहाल भारत के लगभग 14,000 पिन कोड्स तक अपनी सेवाएं दे रही है।

स्वास्थ्य को मानते हैं सबसे बड़ी दौलत

सुभाशीष 'स्वास्थ्य ही धन है' में विश्वास करते हैं। उन्होंने डीटीडीसी में हजारों लोगों को पैदल चलने, योग और ध्यान आदि के माध्यम से फिटनेस बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया है। पैदल चलने के अलावा, वह अपनी टीम को जुम्बा और योग जैसी कुछ और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने वाली गतिविधियों का अभ्यास करने के लिए प्रेरित करते हैं।

उनकी जीवनी, ड्रीम, डेयर, डिलीवर एक प्रेरणादायक पुस्तक है, जो जीवनी श्रेणी के तहत अमेजन पर शीर्ष विक्रेताओं में से एक रही है।

युवाओं को सीख

  • इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितनी धीमी गति से चल रहे हैं, जब तक कि आप रुकते नहीं।
  • व्यक्ति का मन जो भी सोचता है और जिस पर विश्वास करता है, वह उसे प्राप्त कर सकता है।
  • कल्पना रहित इन्सान बिना पंख के पक्षी के समान होता है।
  • भविष्य उनका है, जो अपने सपनों की सुंदरता में विश्वास करते हैं।
  • वहां मत जाइए जहां रास्ता ले जाए वहां जाइए जहां कोई रास्ता ना ले जाए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।