
कदम्ब का पेड़ Publish Date : 08/11/2025
कदम्ब का पेड़
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
माँ यह कदम्ब का पेड़ अगर।
होता यमुना के तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैय्या
बनता धीरे-धीरे।
ले देती यदि तुम मुझे बांसुरी तुम
दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह
कदम्ब की डाली।
तुम्हे नहीं कुछ कहता पर मैं
चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा
ऊँचें पर चढ़ जाता।
वहीं बैठ फिर बड़े मजे से
मैं बाँसुरी बजाता।।
अम्मा-अम्मा कहेर वंशी के
स्वर में तुम्हें बुलाता।
बहुत बुलाने पर भी माँ जब
मैं नीचे उतर कर नहीं आता।
माँ, तब हृदय तुम्हारा
बहुत विकल हो जाता।
तुम आँचल फैला कर अम्मां
वहीं पेड़ के नीचे।
इसी तरह से कुछ खेला करते
हम तुम धीरे-धीरे।
यह कदम्ब का पेड़
अगर माँ होता युमना तीरे।

प्रस्तुतिः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
