
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रमुख फसल और उसकी उत्पादकता Publish Date : 13/09/2026
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रमुख फसल और उसकी उत्पादकता
प्रो0 आर. एस. सेंगर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती पर काफ़ी अच्छे अच्छे विचार सुझाव दिए गए! वहाँ मेरे बारे में भी लिखा जो उनका बड़प्पन है! उनका खेती का अनुभव विशेषकर मिट्टी की देखभाल और उत्पादकता के लिए रखरखाव और उच्च कोटि के गन्ने की खेती उनकी अपनी विशेषता है जिसके लिए प्रसिद्ध हैं। समय समय पर आप अपने अनुभव साझा करके आप किसानों कि मदद करते हैं। यहाँ मैं अपनी राय भी रखना चाहता हूँ।
मेरी राय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खेती के विषय का सारांश यह है। आज के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को दो काम करने होंगें: (1) अपनी खेती की फसल की लागत कम करनी ही होगी जिससे कि शुद्ध लाभ में वृद्धि हो सकती है। और (2) अपने खेतों के कार्बनिक पदार्थ को बढ़ाना होगा जो अधिकांश खेतों में आजकल केवल 0.2-0.3% है।
इसके लिए अपनी प्राचीन व मध्यकालीन कृषि की विधियों को अपनाना ही होगा! इस विधि में फसल चक्र, बहु-फ़सली करण, सह-फ़सली करण, गोबर की खाद का प्रयोग, 1000 वर्ष पुरानी वृक्षायुर्वेद पुस्तक पर -आधारित द्रवित जैविक खादों जैसे एएएचएफ द्वारा बनाया गया हर्बल कुणपजल या जीवामृत का और हरी खाद का प्रयोग मुख्य हैं!
यह अत्यंत आवश्यक है कि अपने खेतों की मिट्टी का कार्बनिक पदार्थ १% या उससे अधिक रखें! क्योंकि हमारे खेतों में कार्बनिक पदार्थ बहुत कम हो गया है इसीलिए उनमें रोगों और कीटों का प्रकोप अधिक हो गया है। यह सर्व विदित है कि 1% से अधिक कार्बनिक पदार्थ वाले खेतों में फसल के रोग और कीटों का प्रकोप काफ़ी कम होता है और यदि यह 2% तक पहुँच जाये तो ऐसे खेतों की फसलों में रोग या कीट लगते ही नहीं।
इसका विस्तृत विवरण 1940 में सर अल्बर्ट हावर्ड (Sir Albert Howard) द्वारा लिखित पुस्तक “ऐन एग्रीकल्चरल टेस्टामेंट” (An Agricultural Testament) में दिया हुआ है। यह पुस्तक उत्तर और मध्य भारत की स्वतंत्रता-पूर्व हमारी खेती के ऊपर लिखी गई है जिसमें लेखक ने जो उस समय की भारतीय कृषि में देखा उसका उल्लेख किया हुआ है।
मैं रासायनिक खादों के प्रयोग के खिलाफ नहीं हूँ लेकिन उनका प्रयोग एक सीमित मात्र में ही करें! अब क्योंकि हमने गोबर की खाद (एफ वाईएम) का प्रयोग तो नगण्य सा ही कर दिया है जिसके कारणों से हम परिचित हैं और परिणाम स्वरूप कार्बनिक पदार्थ मिट्टी में काफ़ी कम हो गया है। हमारी कृषि के बारे में प्राचीन धारणा के अनुसार खेती की फसल के अवशेषों का 1/3 भाग खेत में जाना चाहिए जिससे कि हमारे खेतों में कार्बनिक पदार्थ की अच्छी मात्रा बनी रहे! इसका उल्लेख श्री कुलवीर सिंह जी अपने खेतों की गन्ने की पत्तियों को खेतों में ही मिला कर करते रहते हैं। उनके खेतों में लहलहाती हुई हरी खाद की फसलें आपने देखी ही हैं! परिणाम स्वरूप उनके खेतों में अधिक कार्बनिक पदार्थ और अधिक स्वस्थ फसलें दिखती हैं।
मैं अवश्य चाहूँगा कि किसान भाई बहन इस पर गौर करें! खेत भी हमारे है और खेती भी हमारी है जो कि हमारे जीविकोपार्जन का एक मात्र स्रोत है। प्रार्थना है कि वीसी पर आप सब गौर करें!
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।