पारंपरिक मछलियों को बचाएं, नही तो नदियां भी नहीं बचेंगी      Publish Date : 10/08/2026

पारंपरिक मछलियों को बचाएं, नही तो नदियां भी नहीं बचेंगी

                                                                                                          प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य

नदियों के प्रबन्धन को लेकर दुनियाभर में चल रही पारंपरिक बहसों के बीच एक ताजा अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन ने एक नई और चौंकाने वाली समस्या की ओर हम सब का ध्यान आकर्षित किया गया है। आमतौर पर हम बांधों, जल-विद्युत परियोजनाओं अथवा जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों की चर्चा करने के दौरान अक्सर हम नदियों में रहने वाले जीवों को एक मूक शिकार के रूप में देखते हैं। माना जाता है कि पानी का बहाव कम होने या उसके तापमान में परिवर्तन से मछलियों के अस्तित्व पर संकट मंड़रा रहा है, परन्तु इस बीच वाटर रिसोर्सेज रिसर्च नामक एक प्रतिष्ठित शोध पत्रिका में प्रकाशित किए गए एक ताजा अध्ययन ने इस स्थापित धारणा को चुनौति दी है।

नए शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि हमारी जल प्रणालियों के अन्तर्गत, मछलियां केवल अपना जीवन ही व्यतीत नहीं करती हैं, बल्कि वह अपने व्यवहार और शारीरिक परिवर्तनों के माध्यम से पूरी नदी की बनावट, नदी के पारिस्थितिकी-तंत्र, तलछट के प्रवाह और यहां तक कि बाढ़ के खतरे आदि को निर्धारित करने में एक सक्रिय भूमिका निभाती हैं। वैज्ञानिकों के द्वारा इस स्थिति को समझाने के लिए एक नए प्रकार का सैद्वान्तिक ढांचा तैयार किया गया है और इसे पारिस्थितिकी, क्रमिक विकास और जल-विज्ञान को एक अनूठा संगम भी कहा जा सकता है। यह नया अध्ययन नदियों को देखने वाले हमारे सम्पूर्ण दृष्टिकोण को ही बदल देता है। इस अध्ययन के प्रमुख सदस्य जियातोंग काई का मानना है कि मानव के द्वारा निर्मित किए गए बुनियादी ढाँचों के कारण नदियों में निरंतर पैदा हो रहे दबावों के चलते मछलियों की आबादी में अब बहुत तेजी से अनुवांशिक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं।

नए शोध के अन्तर्गत उदाहरण के तौर पर मुख्य रूप से नार्वे की अटलांटिक साल्मन मछली का विस्तृत अध्ययन किया गया है, जहाँ नदियों पर बनाए गए बिजलीघरों एवं बाँधों के कारण जल प्रवाह में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है। जिस समय बाँधों से पानी का निकास कम होता है, तो उस समय नदी का जल स्तर कम हो जाने से बड़े आकार की साल्मन मछलियों के लिए उनके पारंपरिक प्रजनन स्थलों तक पहुँचना बहुत कठिन हो जाता है। तो वहीं दूसरी ओर, छोटे आकार की मछलियां जल-स्तर में आयी इस कमी के उपरान्त भी संकरे मार्गों से गुजरकर वहाँ तक पहुँचने में सफल रहती हैं। इसका परिणाम यह रहा कि समय के साथ उस पूरी नदी प्रणाली में बड़ी मछलियों की संख्या भी अब कम होने लगी है और इसके साथ ही छोटे आकार की मछलियों की संख्या बढ़ती जा रही है।

हालिया शोध ऐसे पारंपरिक पर्यावरणविदों के दावों को भी सवालों कठघरे मेें खड़ा करता है, जो कि अक्सर नदियों को उनकी पुरानी ऐतिहासिक स्थ्तिि में लौटाए जाने की वकालत करते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि वर्तमान समय में दुनिया दुनिया की कोई ऐसी आदर्श स्थिति बची ही नहीं हैं, जहाँ वापस लौटा जा सके।

ऐसे में भारत की सबसे बड़ी और विश्व की पांचवीं सबसे लम्बी नदी गंगा, भारत के अस्तित्व, आस्था और जैव-विविधता की पहचान है। नदी केवल एक जल धारा मात्र ही नहीं होती, बल्कि उसका अपना का तंत्र होता है और नदी के इस तंत्र में उसके जलचर प्राणी सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। गंगा के जल की पवित्रता को बनाए रखने में उसके जल में लाखों वर्षों से पाये जाने वाली मछलियों और कुछओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। एक ओर हमारी सरकार जहाँ गंगा की जल-धारा को स्वच्छ बनाए रखने के लिए हजारों करोड़ रूपयों की परियोजना पर क्रियान्वयन कर रही है, वहीं यह एक बड़ी चेतावनी है कि गंगा नदी में मछलियों की विविधता को संकट का सामना करना पड़ रहा है और इसके चलते 29 से अधिक प्रजातियों को खतरे की श्रेणी अभिसूचित किया गया है। ज्ञात हो कि गंगा में 143 प्रकार की मछलियां पाई जाती हैं।

वर्तमान समय में यमुना और गंगा नदियों को स्वच्छ बनाने के लिए बहुत सी बड़ी परियोजनाएं तो संचालित की जा रही हैं, परन्तु इनमें पारंपरिक मछलियों के जीवन को बचाने के सम्बन्ध में कोई विशेष काम नहीं किया जा रहा है। इस नए संकट से निपटने के लिए एकमात्र मार्ग यही है कि भविष्य में जब भी नदियों पर कोइ बाँध या उसके पानी के रास्तों में कोई बदलाव किया जाए तो इस दौरान केवल पानी के बहाव के आंकडों को ही न देखा जाए, बल्कि इस बात का विशेषरूप से ध्यान रखा जाए कि वह रास्ता प्रत्येक आकार की मछलियों के लिए भी अनुकूल हो।

इस प्रकार से नियमित नदी प्रबन्धन के दौरान भी केवल पानी की गुणवत्ता और मछलियों की प्रजातियों की संख्या को गिनना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि मछलियों की प्रजातियों के भीतर आ रहे जेनेटिक परिवर्तनों पर भी करीबी और नियमित नजर रखनी होगी। ऐसे में अब नदियों को जीवंत और सुरक्षित बनाए रखने के फेर में इंजीनियरिंग के साथ ही साथ जीव विज्ञान की इस नई अंतर्दृष्टि को अपनाना भी समय की मांग बन चुका है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।