यूरिया का धड़ाका और जमीन का कड़ाका      Publish Date : 04/05/2026

      यूरिया का धड़ाका और जमीन का कड़ाका

                                                                                                           प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 निधि सिंह

  • अभी भी समय है, अतः हमें सावधान हो जाना चाहिए।

आज हमारी खेती का पूरा गणित बिगड़ता जा रहा है। थोड़े ज्यादा पैसे और जल्दी हरियाली के लालच में हम फसल को यूरिया का जैसे “डोज नहीं, नशा” लगा रहे हैं। सिर्फ सस्ता मिलने के कारण हम बोरी पर बोरी यूरिया खेत में डालते जा रहे हैं, लेकिन क्या कभी सोचा है कि इसका हमारी काली मिट्टी पर क्या असर हो रहा है?

1. यूरिया का अधिक उपयोग यानी कि मिट्टी का नुकसान

                                       

यूरिया डालते ही फसल 2-3 दिन में गहरी हरी दिखने लगती है, यह सही है। लेकिन यह हरियाली केवल कुछ समय की होती है। अधिक यूरिया से मिट्टी की बनावट खराब होती है, मिट्टी सख्त होने लगती है और उसकी प्राकृतिक उर्वरता धीरे-धीरे खत्म हो जाती है।

अगर मिट्टी का ऑर्गेनिक कार्बन (Organic Carbon) घटने लगे, तो समझ लीजिए कि अब जमीन बंजर होने की राह पर अग्रसर है।

2. मिट्टी के मित्र जीवाणुओं का विनाश

  • प्रकृति ने हमारी मिट्टी में ऐसे लाभकारी जीवाणु दिए हैं जो हवा से नाइट्रोजन लेकर फसल को देते हैं।
  • अज़ोटोबैक्टर, अज़ोस्पिरिलम और राइजोबियम जैसे सूक्ष्मजीव यह काम मुफ्त में करते हैं।
  • लेकिन रासायनिक खादों और दवाओं के अत्यधिक उपयोग से ये मित्र जीवाणु नष्ट हो रहे हैं।
  • इससे मिट्टी अपनी खुद की पोषण शक्ति खो देती है।

3. नाइट्रोजन के टिकाऊ और जैविक विकल्प

  • रासायनिक यूरिया ही सब कुछ नहीं है।
  • नीम खली, सरसों खली, अरंडी खली का उपयोग करें।
  • अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर खाद डालें।
  • मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाएँ।
  • जैव उर्वरक और लाभकारी जीवाणुओं का उपयोग करें।

जब मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ते हैं, तो नाइट्रोजन स्थिर करने वाले जीवाणु भी तेजी से बढ़ते हैं और जमीन खुद खाद बनाने लगती है।

एक कड़वा सच

                                         

गेहूं और अन्य फसलों को अधिक नाइट्रोजन की जरूरत होती है। केवल जैव उर्वरक 12-20 किलो तक ही नाइट्रोजन दे पाते हैं, इसलिए गोबर खाद + जैव उर्वरक + जैविक खली का संतुलित उपयोग जरूरी है। मिट्टी बचेगी तभी खेती बचेगी, इसलिए अब समय है रासायनिक निर्भरता कम करने का।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।