
उर्वरकों की बिक्री को लेकर एक बड़ा फैंसला Publish Date : 22/04/2026
उर्वरकों की बिक्री को लेकर एक बड़ा फैंसला
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
उर्वरक बिक्री को नियंत्रित करने की तैयारी, हरियाणा और तेलंगाना से होगी ’नेशनल फ्रेमवर्क’ की शुरुआत-
केंद्र सरकार सब्सिडी वाले उर्वरकों की बिक्री को नियंत्रित करने के लिए एक नेशनल फ्रेमवर्क तैयार करने जा रही है। प्रस्तावित व्यवस्था में उर्वरकों का वितरण जमीन और फसल की पोषक जरूरतों के सथ जोड़ा जाएगा, जिससे सीमित संसाधनों का प्रभावी तरीके से उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध के चलते देश में उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर सरकार की चिंता बढ़ गई है। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधित होने और कीमतों में उछाल के बीच केंद्र सरकार के लिए किसानों को उर्वरकों की आपूर्ति सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। इन मुश्किल हालात को देखते हुए केंद्र सरकार ने किसानों को सब्सिडी वाले उर्वरकों की बिक्री के लिए एक नई व्यवस्था तैयार करनी शुरू कर दी है।
अब ‘नेशनल फ्रेमवर्क फॉर सेल ऑफ सब्सिडाइज्ड फर्टिलाइजर’ के नामक यह नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी चल रही है। इस व्यवस्था के तहत किसानों को उर्वरकों की बिक्री जमीन और फसल के आधार पर तय मात्रा के अनुसार की जाएगी। यूरिया के मामले में यह सीमा शुरुआती तौर पर पांच-छह बैग प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है।
सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, सोमवार को एंपावर्ड ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई और फ्रेमवर्क तैयार करने की जिम्मेदारी कृषि मंत्रालय को सौंपी गई है। उर्वरक आपूर्ति की नई जरूरत आधारित व्यवस्था संभवतः एक माह के भीतर लागू की जा सकती है।

रूरल वॉयस को मिली जानकारी के अनुसार, हरियाणा और तेलंगाना समेत कुछ राज्यों में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा रहा है, जिसमें किसानों को जमीन और फसल के आधार पर उर्वरकों की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। सरकार का जोर है कि उर्वरकों की मात्रा फसल की न्यूट्रिएंट आवश्यकताओं के आधार पर तय की जानी चाहिए। किसानों को खाद की बिक्री का ब्यौरा इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (IFMS) पर दर्ज होगा। इससे एक ही किसान द्वारा बार-बार उर्वरक खरीद की निगरानी रखी जा सकेगी। इस प्रकार सब्सिडी वाले उर्वरकों जैसे यूरिया और डीएपी की बिक्री पर अंकुश बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं।
हरियाणा सरकार ने मेरी फसल, मेरा ब्यौरा (MFMB) पोर्टल को इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (IFMS) के साथ जोड़कर उर्वरक बिक्री को भूमि रिकॉर्ड और फसल विवरण से लिंक कर दिया गया है। इससे यूरिया खपत में 1.26 लाख टन और डीएपी में 23,500 टन की कमी आई और 700 करोड़ रुपये की सब्सिडी में भी बचत हुई।
नई व्यवस्था में किसानों को उर्वरकों का आवंटन एनपीके के मानक अनुपात के आधार पर किया जा सकता है। यूरिया के मामले में यह प्रति हेक्टेयर आवंटन पांच से छह बैग तक हो सकता है। सूत्रों के अनुसार, फ्रेमवर्क तैयार होने के बाद स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी। यह व्यवस्था खासतौर पर यूरिया और डीएपी जैसे सब्सिडी वाले उर्वरकों पर लागू हो सकती है।
दरअसल, वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की आपूर्ति पर गंभीर दबाव बना हुआ है। ईरान युद्ध के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक उर्वरक व्यापार का एक प्रमुख मार्ग है, लगभग ठप हो गया है। इस मार्ग से सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के करीब 30 प्रतिशत उर्वरकों का व्यापार होता है।
उर्वरकों की उपलब्धता के मामले में फिलहाल स्थिति सामान्य है, लेकिन यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा बनी रहती है, तो खरीफ सीजन के लिए आपूर्ति परेशानी खड़ी हो सकती है। भारत में यूरिया लेकर आ रहे आठ जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे हुए हैं। कतर, कुवैत और सऊदी अरब में पेट्रोलियम रिफाइनरियों को नुकसान होने से सल्फर की आपूर्ति प्रभावित हुई है। मोरक्को की कंपनी ओसीपी ने डीएपी का निर्यात रोक दिया है, क्योंकि रॉक फॉस्फेट के साथ सल्फर मिलाने के बाद ही फॉस्फोरिक एसिड बनता है। इस कारण वैश्विक स्तर पर डीएपी की उपलब्धता एक बड़ी समस्या बन गई है।
पश्चिमी एशिया संकट के कारण वैश्विक स्तर पर उर्वरक कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। यूरिया की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में करीब 800 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है। भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि देश उर्वरक जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है।
हालांकि सरकार का कहना है कि फिलहाल देश में पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। एक अप्रैल को देश में यूरिया का स्टॉक लगभग 62 लाख टन और डीएपी का स्टॉक 23 लाख टन के आसपास था। ईरान युद्ध की शुरुआत बाद से खाड़ी देशों से भारत में न तो यूरिया का आयात हुआ है और न ही एलएनजी का। इसका असर देश में यूरिया उत्पादन पर पड़ा है। क्योंकि नाइट्रोजन उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस एक प्रमुख कच्चा माल है।
उद्योग सूत्रों के अनुसार, मार्च महीने में देश में लगभग आठ लाख टन यूरिया उत्पादन घटा है और अप्रैल में भी कमी जारी रह सकती है। खरीफ सीजन में लगभग 200 लाख टन यूरिया की खपत होती है। ऐसे में आयात में देरी से उपलब्धता का संकट पैदा हो सकता है। इसी वजह से सरकार नेशनल फ्रेमवर्क लागू करने की दिशा में कदम उठा रही है। सरकार ने 25 लाख टन यूरिया के आयात के लिए टेंडर जारी किया है, जो बुधवार को खुल सकता है। इसके बाद कीमत और उपलब्धता की स्थिति और स्पष्ट होगी।
इन सभी स्थितियों को देखते हुए सरकार सब्सिडी वाले उर्वरकों के बेहतर प्रबंधन और लक्षित वितरण के लिए नेशनल फ्रेमवर्क लागू करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है, ताकि सीमित संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
